सेवा के लिए समर्पण की नित्य साधना करनी होगी : मा. पी.परमेश्वरन

कन्याकुमारी में विवेकानन्द केन्द्र द्वारा आयोजित “सार्थक युवा समर्थ भारत शिविर” में देशभर से कुल 680 युवक-युवतियां शामिल हुईं। गत माह 25,26 और 27 दिसम्बर, 2015 को संपन्न हुए इस शिविर में विवेकानन्द केन्द्र के जीवनव्रती कार्यकर्ताओं का उद्भोधन हुआ। केन्द्र के अखिल भारतीय अध्यक्ष श्री पी.परमेश्वरनजी का सन्देश, तथा उपाध्यक्ष द्वय श्री ए.बालकृष्णन तथा सुश्री निवेदिता भिड़े, एवं महासचिव श्री भानुदास धाक्रस के व्याख्यान ने युवाओं के हृदय को राष्ट्रसेवा की प्रेरणा से अभिभूत कर दिया। राष्ट्र के प्रति अपनी भूमिका, राष्ट्रीय कर्तव्य, त्याग और सेवा की अवधारणा तथा मन-वाचा-कर्म से सदैव एकरूप रहने की प्रेरणा देनेवाले व्याख्यानों का हम सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं।        

सन्देश  

P-PARMESHWARAN-VIVEKANAND-KENDRA.JPGसेवा के लिए समर्पण की नित्य साधना करनी होगी : मा. पी.परमेश्वरन

अभावग्रस्त लोगों की सेवा करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना जीवन समर्पित करना है। ऐसे समर्पण की नित्य साधना करनी होगी। ऐसे समर्पण का भाव अपने भीतर विद्यमान दिव्यत्व की अनुभूति से प्रगट होता है। सारे समर्पित कार्य का स्रोत अपने हृदय की प्रेरणा होती है। स्वामी विवेकानन्दजी के आदर्शों के अनुरूप माननीय एकनाथजी ने विवेकानन्द केन्द्र की सम्पूर्ण रचना की। चाहे वह योग हो या शिक्षा, ग्रामीण विकास हो या प्राकृतिक संसाधनों का संवर्धन अथवा स्वास्थ्य सेवा, इन सभी में आध्यात्मिक प्रेरणा अनिवार्य है।

इस शिविर में सम्मिलित प्रत्येक शिविरार्थी से यह अपेक्षा है कि वह अपनेआप को लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप उन्नत करें और स्वयं को भारतमाता के कार्य के लिए समर्पित कर दें।  उनके सामूहिक समर्पण पर ही भारत माँ का भविष्य निर्भर है, जो कि अंततोगत्वा विश्व का ही भविष्य है।

भारतमाता जगद्गुरु है और हमेशा से ही रही है। अब हम सभी अपने समर्पित सेवाओं के द्वारा अपने आँखों से, भारतमाता को जगतगुरु के सिंहासन पर, जो कि पहले से अधिक गौरवशाली है, विराजमान होता हुआ देखें।

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