अब देश को पुनः प्रल्हाद चाहिए

bhakt-prahlad.jpg(होली पर्व पर विशेष लेख)  

होली का महापर्व आज मनोरंजन, नशा और मजाक बनकर रह गया है। डीजे की कर्कश आवाज पर थिरकने वाले तथा कटे-फटे कपड़े पहनकर, बेढ़ंग फैशन पर गर्व करनेवाला युवा समाज रंग से रंग तो जाता है परंतु होली के पर्व के मर्म को समझने की इच्छा उसके मन में कभी नहीं जगती।

होली का पर्व है और बाल-गोपाल सहित युवा तथा बुजुर्गों में भी होली को लेकर बहुत उत्साह है। एक ऐसा समय था जब लोग इस पर्व को अधिक उत्साह व उमंग से किस प्रकार मनाया जा सकता है, इसका नियोजन होली के एक माह पूर्व ही कर लेते थे। इस अवसर पर गांव में खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता था। इन प्रतियोगिताएं में लोग बड़े उत्साह से सहभागी होते थे। तरह-तरह के पकवान बनाये जाते थे, सारा गांव स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू से भर जाता था। रंग-गुलाल के रंगीन दृश्य से वातावरण मनोहारी हो जाता था, किन्तु आज आधुनिकता और फूहड़ता के प्रवाह में ये सभी आनंद देनेवाले क्षण धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं।

Okहोली का महापर्व आज मनोरंजन, नशा और मजाक बनकर रह गया है। होली के अवसर पर फाग गानेवाले लोग प्रायः लुप्त होते जा रहे हैं। डीजे की कर्कश आवाज पर थिरकने वाले तथा कटे-फटे कपड़े पहनकर, बेढ़ंग फैशन पर गर्व करनेवाला युवा समाज रंग से रंग तो जाता है परंतु होली के पर्व के मर्म को समझने की इच्छा उसके मन में कभी नहीं जगती। इस आधुनिक पीढ़ी में त्योहारों को लेकर उत्साह तो है और उसको वे अभिव्यक्त भी करते हैं, परंतु अभिव्यक्ति का माध्यम क्या है, उसकी दिशा कौन-सी हो सकती है? होली क्यों मनाते हैं और इसे कैसे मनाना चाहिए? कौन बताए? मस्ती की पाठशाला कहकर होली के रंग-गुलाल में रंगे लोगों के फूहड़ नाच-गानों को मीडिया में प्रदर्शित किया जाता है और होलिका दहन की कहानी बता दी जाती है। इससे क्या होगा? होली में लोग शराब आदि का नशा करना क्या छोड़ देंगे? क्या लोग नशे में धूत होकर गाली-गलौच करना बंद कर देंगे? ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिसका समाधान खोजने की नितांत आवश्यक है।Bhagwan_Narsingh

होली का त्योहार तो हरिभक्त प्रह्लाद को स्मरण करने का पर्व है। हिरण्यकश्यपु के घर जन्म लेनेवाले बालक प्रल्हाद की भक्ति को आत्मीयता से हम कितने भारतीय स्मरण करते हैं? हिरण्यकश्यपु द्वारा दिए गए भयंकर यातनाओं से तनिक भी भयभीत न होनेवाले बालक प्रह्लाद क्या हमारे आदर्श नहीं हो सकते? याद कीजिए भक्त प्रल्हाद की वह हरिभक्ति, जिसके कारण भगवान विष्णु को अपने इस परम बालभक्त से मिलने बैकुंठ से भारतभूमि पर अवतरित होना पड़ा। प्रल्हाद ऐसा महान भक्त, जो न आग में जला, न पानी में डूबा, न तलवार की धार ने उसे कुछ नुकसान पहुंचाया। भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में प्रगट होकर प्रल्हाद हो नष्ट करने का प्रयत्न करनेवाले हिरण्यकश्यपु का संहार किया और अपने अनन्य भक्त प्रल्हाद को अपनी गोद में बिठाकर स्नेह की वर्षा की। परन्तु हमने तो प्रल्हाद को ही भूला दिया।

आज हमारे देश में एक तरफ ईश्वर के अस्तित्व को नकारनेवाले अनगिनत विधर्मी मिलते हैं और वहीं दूसरी ओर अपने धार्मिक होने का दावा ठोकने वालों की भी कोई कमी नहीं है। कथा, प्रवचन और सत्संग-भागवत के आयोजन के अवसर पर भारी संख्या में लोगों की भीड़ भी दिखने लगी है। फिर भी धर्माधारित जीवन जीनेवाले लोग कम ही दिखाई देते हैं। एक तरफ धार्मिक कार्यक्रमों में लोगों की भारी भीड़ तो दूसरी ओर धर्माधारित जीवन जीनेवालों की कमी! बहुत विरोधाभासी स्थिति है। यह इसलिए कि हम अपने धर्म, कर्तव्य और दायित्व को पहचान नहीं पाए। भक्त प्रह्लाद का जीवन धर्म, कर्तव्य और दायित्व बोध का आदर्श प्रस्तुत करता है। वह प्रल्हाद जिसके पिता स्वयं राजा थे और जो श्री हरि विष्णु के प्रबल विरोधी थे। विष्णु का नाम लेनेवालों की वह प्राण हर लेते थे। इस भयानक और त्रासदी युक्त वातावरण में प्रल्हाद ने बड़ी हिम्मत दिखाई। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करनेवाले भक्त प्रल्हाद ने पूरी निर्भयता के साथ भगवान विष्णु के नाम का प्रचार किया और अपनी भक्ति के प्रभाव से भयभीत समाज में भगवान के प्रति आस्था और विश्वास जगाया, इसी की परिणति है कि युगों से आज तक होली का पर्व मनाने की परम्परा अक्षुण्ण है।

परंतु मात्र पर्व मनाने से कार्य पूर्ण नहीं हो जाता, हमें तो ऐसे प्रल्हादों को खोज निकालना होगा जो ईश्वरीय कार्य को अपना ध्येय बना ले। आज जिस तरह भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिवजी यहां तक की सनातन हिन्दू धर्म की देवियों को लेकर अनर्गल प्रचार करनेवालों की पूरी फ़ौज सक्रिय है, ऐसे में प्रल्हाद की भक्तिभाव का आदर्श समाज में ईश्वर के प्रति विश्वास को जगाता है। यदि हम प्रल्हाद के बीज बन पाएं तो निश्चय ही निर्भिक और आदर्श पीढ़ी का निर्माण कर सकेंगे। यह धर्म की पुन:स्थापना के लक्ष्य में यह सार्थक पहल होगा।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी 

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कपूतों को ‘भारतमाता की जय कहना’ अच्छा नहीं लगता

Asaduddin_Owaisiयह देश का दुर्भाग्य ही है कि आज हमारे बीच ऐसे नेता खुले आम कह रहे हैं कि “गर्दन पर छूरी रख दो, तब भी नहीं बोलूंगा भारत माता की जय”। आश्चर्य इस बात पर भी होता है कि ‘भारतमाता की जय’ नहीं बोलनेवाले के समर्थन में लोग तालियां बजाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इसका विरोध करनेवालों की संख्या कम है। सोशल मीडिया पर जागरूक देशवासी ‘भारतमाता की जय न बोलनेवाले’ को जमकर कोसते हैं। फिर भी हम देशवासियों के लिए यह चिंता का विषय है कि देश के भीतर बड़े-बड़े सियासतदार ‘संवैधानिक अधिकार’ की आड़ में देशविरोधी बोल आसानी से बोल लेते हैं।

गत माह जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में देशविरोधी नारों के चलते समूचे भारत में ‘देशभक्त बनाम देशविरोधी’ का वातावरण बन गया है। कांग्रेस और उसके तमाम समर्थक दल जेएनयू में देशविरोधी नारे लगानेवालों के समर्थन में खड़े हो गए हैं। देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसए) के सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत ने नागपुर की एक सभा में कहा था कि अफ़सोस की बात है कि देश की जय नहीं कहने की सीख देनेवालों की संख्या बढ़ रही है। भारतमाता की जय बोलनेवाले लोगों की कमी दिख रही है। इसके लिए नई पीढ़ी को सीख देने की जरुरत है। घर में मातृभूमि के सम्मान व जय-जयकार के लिए अलग से कुछ सिखाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, यह तो एक संस्कारित कर्म है। माता की जय-जयकार स्वाभाविक रूप से होना चाहिए।

सरसंघचालक द्वारा “भारतमाता की जय” सिखाने की सीख बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए किसी को भी इसपर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन हैदाराबाद के सांसद और मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुस्लिमीन (एमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी तो शुरू से ही आरएसएस के विरोधी हैं। यानी हिन्दू, हिंदुत्व, भारतीय संस्कृति के विरोधी हैं। यही कारण है कि सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत द्वारा “भारतमाता की जय” कहने की सीख के विरोध में उतर आए।

लातूर जिले के उदगीर तहसील में एक जनसभा में ओवैसी ने कहा, “मोहन भागवत ने नागपुर में कहा कि मुल्क में ऐसे लोग हैं जो नारे नहीं लगाते भारतमाता के जय का। उनको सिखाना पड़ेगा।” ओवैसी ने सरसंघचालक को चुनौती देते हुए आगे कहा,“मोहन भागवत साहब! मैं नहीं लगाता नारा, क्या करते आप? नहीं बोलता मैं। मेरे गले में छुरी भी रख देंगे तो नहीं बोलूंगा मैं। हमारे कॉन्स्टीट्यूशन में यह कहीं नहीं लिखा है कि सभी को भारतमाता की जय बोलना।”

ऐसा कहकर ओवैसी ने अपने समर्थकों को ‘भारतमाता की जय’ नहीं कहने के लिए उत्प्रेरित किया है। उसके समर्थक उनके इस वक्तव्य पर तालियां बजा रहे थे।

ओवैसी अपनी बात इस तरह रख रहे थे, जैसे- “वो संविधान की हर बात को मानते हैं, या जो संविधान में लिखा है बस वही बात कहते हैं और संविधान सम्मत काम करते हैं।” पर वास्तविकता इससे परे है। ओवैसी के वक्तव्य संविधान सम्मत नहीं होते हैं। यही कारण है ओवैसी द्वारा संविधान का हवाला देते हुए ‘भारतमाता की जय’ नहीं बोलने के वक्तव्य पर राज्यसभा सांसद और मशहूर गीतकार व शायर जावेद अख्तर ने राज्यसभा में असदुद्दीन ओवैसी के वक्तव्य की कठोर निंदा की। ओवैसी का नाम लिए बिना अख्तर ने कहा, “वो कहते हैं कि भारतमाता की जय नहीं बोलेंगे, क्योंकि संविधान में ऐसा करने को नहीं कहा गया। लेकिन उसी संविधान में उन्हें शेरवानी और टोपी पहनने के लिए भी नहीं कहा गया।” उन्होंने कहा कि भारतमाता की जय बोलने में हर्ज क्या है? यह हमारा फर्ज नहीं, बल्कि अधिकार है। ऐसा कहते हुए जावेद अख्तर ने सदन में तीन बार ‘भारतमाता की जय’ का उद्घोष किया।

असदुद्दीन ओवैसी हमेशा संविधान की आड़ में अपने दोषों को छुपाने की चाल चलते हैं। इतना ही नहीं “अभिव्यक्ति की आजादी” के नाम पर चालाकी भरा वक्तव्य देते हैं। वाक्पटुता में माहिर ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन ख़ुद कई भड़काऊ और अनर्गल भाषणों पर कई केस दर्ज हैं। इसपर कोई उनसे सवाल पूछे तो यह कहकर कि “केस अदालत में है, अदालत फैसला करेगा, अदालत पर मुझे भरोसा है” बड़ी चालाकी से सवाल को टाल जाते हैं। आम तौर पर अदालत के फैसलों पर भरोसे की बात करनेवाले असदुद्दीन ओवैसी गत वर्ष जुलाई में आतंकवादी याकूब मेनन के समर्थन में खड़े हो गए थे। ज्ञातव्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 के मुम्बई धमाकों के लिए याकूब मेनन को दोषी पाया था और उसे 30 जुलाई, 2015 को फांसी की सजा देने का आदेश दिया। इससे पहले याकूब मेनन की दयायाचिका को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ठुकरा दिया था। तब असदुद्दीन ओवैसी ने देश की सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति के इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा था कि याकूब को फांसी की सजा मजहब को आधार बनाकर दी जा रही है। देश पर हमले करनेवाले दोषियों को सजा दिलानेवाले निर्णयों के खिलाफ खड़े होनेवाले असदुद्दीन ओवैसी की वैचारिक सोच क्या कभी देशहित में हो सकती है? कभी नहीं।

ओवैसी का चिंतन हमेशा से हिन्दू विरोधी रही हैं। उनके भाषणों में आरएसएस और हिन्दू विरोध का जिक्र रहता ही है। वे बात करते हैं अल्पसंख्यकों के हित की। अल्पसंख्यकों की हित की बात करने में कोई बुराई नहीं है, पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों की आड़ में बहुसंख्यक हिन्दू समाज का विरोध करना कभी भी न्यायसंगत नहीं हो सकता। मुस्लिम तबकों को इस्लाम के नाम पर बरगलाने में माहिर ओवैसी अपनी राजनीति चमकाने के लिए किस हद तक जा सकते हैं, यह उनके हाल ही के वक्तव्य से स्पष्ट होता है। सरसंघचालक ने ‘भारतमाता की जय’ कहने की शिक्षा की बात कही तो वे कहने लगे कि वह कभी ‘भारतमाता की जय’ नहीं बोलेंगे। वैसे भी वे अनेकों बार कह चुके हैं कि वे अल्लाह के सिवा किसी के सामने सिर नहीं झुकायेंगे। ऐसा कहकर वह यह भी बताने से नहीं चुकते कि इस्लाम में खुदा के सिवा किसी और के आगे झुकने का रिवाज नहीं है। पर भारतीय इतिहास में हिन्दुओं के साथ ही मुस्लिम देशभक्तों ने भी हमेशा से ही ‘भारतमाता की जय’ का उद्घोष किया है। आज भी कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।महान क्रन्तिकारी अशफाक उल्ला खां ने तो यहां तक तक दिया था :-

“जाऊंगा खाली हाथ मगर, यह दर्द साथ ही जाएगा; जाने किस दिन हिन्दोस्तान, आजाद वतन कहलाएगा।।बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं, फिर आऊंगा-फिर आऊंगा; ले नया जन्म ऐ भारत माँ! तुझको आजाद कराऊंगा।। जी करता है मैं भी कह दूं, पर मजहब से बंध जाता हूं; मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाता हूं।। हां, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूंगा; औ’ जन्नत के बदले उससे, यक नया जन्म ही मांगूंगा।।”

हमारी परम्परा रही है कि हम भूमि और नदी को माता कहते हैं। हम अपनी जन्मभूमि को मातृभूमि और भाषा को मातृभाषा कहते हैं। रामायण में यह उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा था, – “अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते…जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी…”। जिसका अर्थ है कि “हे लक्ष्मण, भले ही लंका स्वर्णमंडित है, परंतु मुझे उसमें कोई रुचि नहीं है, क्योंकि जन्म देनेवाली मां तथा जन्मभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।”

वहीं विष्णुपुराण में कहा गया है कि, –

गायन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद – मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।         

अर्थात देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मर्गभूत भारत भूमि के भाग में जन्में लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है –

“हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।

हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥”  

‘भारतमाता की जय’ नहीं कहने की बात कहकर असदुद्दीन ओवैसी ने भारतभूमि को भारतमाता कहकर वन्दन करनेवाले ऋषियों और मनीषियों का, देश के लिए बलिदान होनेवाले अनगिनत देशभक्तों और सैनिकों का, देशभक्ति को जाग्रत करनेवाले कवियों, शायरों और साहित्यकारों का, और देश से अगाध प्रेम करनेवाले प्रत्येक भारतवासी की भारतभक्ति का अपमान किया है। लेकिन ओवैसी ने सबसे बड़ा अपमान तो “हमारी भारतमाता” का किया है। जिस भारतमाता की गोदी में वो पले, बढ़े, जहां उन्होंने अन्न खाया, पानी पिया, आज उसी भारतमाता की जय बोलने में उन्हें आपत्ति होती है। यह बेहद शर्मनाक है। अपनी मातृभूमि का जय कहने में जिसे कठिनाई होती है या जिसको शर्म आती है वह भारत का पुत्र या सुपुत्र नहीं हो सकता, वह तो कपूत ही कहलाएगा।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’  

मोदी द्वेष के कारण कांग्रेस पतन की ओर

 

Narendra Modi-soniya-rahul-gandhiसच है कि स्वार्थ की राजनीति, ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य को अंधा बना देती है। स्वार्थ का मद उसपर इतना हावी हो जाता है कि उसके सोचने और समझने की क्षमता क्षीण हो जाती है। देश की वर्तमान राजनीति में आज ऐसा ही वातावरण बन चुका है जहां भारत सरकार के विरुद्ध तमाम विपक्षी दलों में भारी बौखलाहट दिखाई दे रही है। ये बौखलाहट इसलिए नहीं है कि भारत सरकार देश पर निरंकुश शासन कर रही है या जनता पर अत्याचार कर रही है, बल्कि इसलिए है कि देश पर मोदी सरकार शासन कर रही है। मोदी द्वेष के चलते कांग्रेस और उसके समर्थक दल अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों को भूलाकर देशविरोधी नारे लगानेवालों के समर्थन में खड़े हो गए। आपातकाल के बाद भारतीय राजनीति में यह एक और काला धब्बा साबित हो रहा है।

जेएनयू की घटना और राहुल गांधी

सब जानते हैं कि 9 फरवरी, 2016 की रात जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में वामपंथी तथा कथित सेक्यूलरिज्म के नशे में चूर सैंकड़ों छात्र-छात्राएं आतंकवादी अफजल गुरु को शहीद के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे थे। ये वामपंथी और अलगाववादी छात्र भारत विरोधी नारे लगाकर देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का अपमान कर रहे थे। जेएनयू के अन्दर कश्मीर की आज़ादी और भारत की बर्बादी की कसमें खाई जा रही थीं, पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए जा रहे थे। देशद्रोही विद्यार्थियों के गो बैक इंडिया, कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी, भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जैसे नारों ने पूरे कैंपस में बवाल खड़ा कर दिया था। केन्द्र की मोदी सरकार ने इस घटना पर एक्शन लेना शुरू ही किया था कि अगले ही दिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जेएनयू पहुंच गए और देशद्रोही नारे लगानेवालों के समर्थन में खड़े हो गए। राहुल ने जेएनयू में कहा, “सबसे ज्यादा राष्ट्रविरोधी लोग वो हैं जो इस संस्थान में छात्रों की आवाज दबा रहे हैं।” राहुल गांधी के इस तुच्छ राजनीति के कारण भारतीय जनता के हृदय में कांग्रेसी खेमें के प्रति बेहद आक्रोश है जो आगामी चुनाव में कांग्रेस मुक्त भारत की ओर ले जाने का कारण बन सकता है। 24 फरवरी को कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लोकसभा में यह भी कह दिया कि,“देशविरोधी नारा लगाना देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आता।” ऐसा लग रहा है कि मोदी विरोध में कांग्रेस की विवेक की आंख बंद हो गई है इसलिए तो उसे “देशद्रोह” और “देशहित” के बीच के अंतर को समझ नहीं पा रहे हैं।

मोदी द्वेष का कारण

कांग्रेस पार्टी ने 60 वर्षों तक देश पर शासन किया। नेहरू-गांधी परिवार से पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनें, जबकि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी देश का शासन चला रही थीं। इस समय कांग्रेस की ओर से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का प्रमोशन शुरू है। कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी, हालांकि यह मंशा उन्होंने जगजाहिर नहीं की थी। परन्तु देश की जनता ने प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को चुनकर कांग्रेस और राहुल के सपनों को चुराचूर कर दिया। नरेन्द्र मोदी की यह सफलता कांग्रेस उपाध्यक्ष की विफलता साबित हुई क्योंकि कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा था जबकि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा था।

नेहरू-गांधी परिवार को देश की सत्ता परंपरागत रूप से हासिल होती रही। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि कांग्रेस पार्टी पर नेहरू-गांधी परिवार का एकाधिकार चलता है। राहुल गांधी के वक्तव्य और नासमझी देखते हुए तो यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस में विद्वता और योग्यता का कोई मूल्य नहीं। कांग्रेस में सर्वोत्तम पद वही पहुंच सकता है जिसके नाम के पीछे गांधी लिखा होगा, भले ही उसमें सहस्त्रों दोष क्यों न हो! चाहे वह देशद्रोही नारे लगानेवालों के समर्थन में खड़ा हो, फिर भी उसकी मान्यता रहेगी क्योंकि वह नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य है। जबकि नरेन्द्र मोदी के परिवार का राजनीतिक दलों से कभी नाता नहीं रहा। संन्यास की इच्छा लेकर नरेंद्र मोदी घर से निकले। रामकृष्ण मठ में दीक्षा लेकर देशाटन कर नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक बनें। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में लगभग 3 दशक कार्य करने के बाद वे प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचे हैं। पहले गुजरात की जनता ने 2001 से 2014 की अवधि में नरेन्द्र मोदी को चार बार मुख्यमंत्री के रूप में चुना। लगभग 14 वर्षों तक गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बेहतरीन कार्य किया। उत्तम प्रशासन और विकासवादी नीतियों के चलते उनकी लोकप्रियता गुजरात से निकलकर देश-विदेश में पहुंची। इसके बाद देश ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में चुना। जनता के समर्थन से बनी मोदी सरकार से द्वेष करने का कांग्रेसी खेमें का कोई करना नहीं है। बतौर भारत के प्रधानमंत्री वे देश की कीर्ति को दुनियाभर में पहुंचा रहे हैं। आज दुनिया के तमाम बड़े नेता, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, रूस के राष्ट्रपति वाल्दिमीर पुतिन, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबोट, ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन जैसे दिग्गज नेता प्रधानमंत्री मोदी का सम्मान करते हैं, और इन दिग्गजों के आपसी भेंट-वार्ता के दौरान यह स्पष्ट दिखाई देता है।

ये द्वेष पुराना है       

एक ओर दुनिया के तमाम बड़े नेता प्रधानमंत्री मोदी के कार्यों की सराहना करते हैं, उनसे अच्छे सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस और उसके खेमे के राजनीतिक दल अकारण प्रधानमंत्री मोदी को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कांग्रेस का यह मोदी विरोध नया नहीं है। सोनिया गांधी ने 10 वर्ष पूर्व मोदी को मौत का सौदागर कहा था। कांग्रेसी खेमा प्रधानमंत्री मोदी को हिटलर तक कहते हैं। गत वर्ष कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तान के ‘दुनिया टीवी’ को एक इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू में कांग्रेस नेता ने कहा था कि अगर पाकिस्तान को भारत से बाइलेट्रल टॉक करनी है तो उसे पहले नरेंद्र मोदी सरकार को हटाना होगा और हमें (कांग्रेस को) लाना होगा। मणिशंकर अय्यर ने यहां तक कहा, ‘‘हमें (कांग्रेस को) सत्ता में वापस लाइए और उन्हें हटाइए। (संबंध बेहतर बनाने के लिए) और कोई रास्ता नहीं है। हम उन्हें हटा देंगे लेकिन तबतक आपको (पाकिस्तान को) इंतजार करना होगा।’’

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के मन में नरेन्द्र मोदी के प्रति जब ऐसा द्वेष भरा है तो उनके नए नासमझ नेता राहुल गांधी के मन में कितनी ईर्ष्या होगी, यह हर कोई समझ सकता है। केवल 44 सीटों में सिमटी कांग्रेस सत्ता सुख के लिए तड़प रही है जिसका नेतृत्व सोनिया गांधी और राहुल गांधी कर रहे हैं। इस समय सत्ता हासिल करना संभव नहीं है। अपनी खोई हुई जमीन को पुनः प्राप्त करने के लिए कांग्रेस को समाज में पैठ बनाना जरुरी है। विडम्बना देखिए भाजपा को जनता ने पूर्ण बहुमत से विजयी बनाया है और कांग्रेस सहित उसके तमाम समर्थक दल की हालत पतली हो गई है। सारा कांग्रेसी कुनबा एक स्वर में मोदी के खिलाफ बोल रहे हैं। “शत्रु का शत्रु अपना मित्र है” इस कहावत की तर्ज अपर जो भी मोदी का विरोध कर रहा है वो कांग्रेस का मित्र बन गया। सामान्य जनता को भ्रमित करने के लिए कांग्रेसी खेमा नित्य नए उपाय और कारण ढूंढ लेते हैं। पहले भूमि अधिग्रहण, मोदी की सूट-बूट, ललित मोदी का मुद्दा, फिर महंगी दाल को लेकर भारी हंगामा मचाया। अब इस खेमें ने रोहित वेमुला की आत्महत्या को लेकर मोदी सरकार को दलित विरोध बताने का षड्यंत्र चला है। यहां तक कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के नाम पर भारतविरोधी नारे लगानेवालों को निर्दोष कहकर जनता को भ्रमित करने और मोदी का विरोध करने के लिए देशद्रोहियों और अलगाववादी ताकतों को भी इकठ्ठा करने का प्रपंच रच रहे हैं।

जनता देख रही है, अब सम्भल जाएं 

जनता देख रही है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का विवेकशक्ति धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। कभी भारत की स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन करनेवाली कांग्रेस आज देशद्रोही नारे लगानेवालों के समर्थन में कैसे खड़ी हो गई? जनता में कांग्रेसी खेमा के प्रति खूब गुस्सा है और वे अन्दर से पीड़ित हैं। जनता ने देश है कि दिल्ली में देशद्रोही नारे लगानेवालों के खिलाफ लगभग 5 लाख भारत के सेवानिवृत्त सैनिकों ने देश की रक्षा के लिए 21 फरवरी को राजघाट से संसद मार्ग तक “एकता रैली” निकाली थी जिसमें राहुल गांधी समेत कांग्रेसी कुनबा का कोई सदस्य शामिल नहीं हुआ, न ही आम आदमी पार्टी ने भाग लिया। वहीं 23 फरवरी को रोहित वेमुला की आत्महत्या की आड़ में जेएनयू के देशविरोधी नारे लगनेवाले छात्रों के समर्थन में निकाली गई रैली में कांग्रेस पार्टी की ओर से राहुल गांधी और उसके समर्थक दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), जनता दल युनाइटेड (जद-यू), बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी (आआपा) के नेता शामिल हुए। इससे स्पष्ट सन्देश जा रहा है कि कांग्रेसी कुनबा किस दिशा में जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि कहीं मोदी विद्वेष की चिंगारी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ कारण न बन जाए!

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’