क्या मौर्य खिलाएंगे उत्तरप्रदेश में कमल?

kp-maurya-लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 80 में से 73 सीटें भाजपा गठबंधन को मिली थी जबकि राज्य विधानसभा (2012) में उसके 403 विधानसभा सीटों में से केवल 47 विधायक हैं। भले ही 2014 में लोकसभा चुनावों के बाद 71 सांसदों के होने के बाद भी जितने उपचुनाव हुए उनमें अधिकांश में पराजय का मुंह देखना पड़ा है। ऐसी स्थिति में, फूलपुर में पहली बार कमल खिलानेवाले केशव प्रसाद मौर्य भाजपा को पुनः सत्ता में वापस ला सकेंगे, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

भारतीय नववर्ष विक्रम संवत 2073 के आते ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद के रूप में केशव प्रसाद मौर्य को नियुक्त कर सबको चौका दिया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इस निर्णय ने पार्टी के कार्यकर्ताओं सहित सपा, बसपा, कांग्रेस तथा मीडिया को भी अचम्भित कर दिया। यूं तो अमित शाह भाजपा के चाणक्य माने जाते हैं पर मौर्य की नियुक्ति कर क्या उत्तर प्रदेश में कमल खिलाने के लक्ष्य को साध पाएंगे? यह प्रश्न हर किसी के मन में उठना स्वाभाविक है, क्योंकि मीडिया और राजनितिक गलियारे में केशव प्रसाद मौर्य नाम की चर्चा नहीं के बराबर थी। कोई नहीं जानता था कि केशव प्रसाद देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश (यूपी) के भाजपा अध्यक्ष होंगे। अब जब उनकी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति हो चुकी है तो इसपर चर्चा करना प्रासंगिक भी है और महत्वपूर्ण भी, क्योंकि अगले वर्ष 2017 में यूपी में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं।

अबतक और आगे क्या?

अबतक कहा जा रहा था कि सपा और बसपा जातिगत समीकरण बनाने के काम में तेजी से जुटे हुए हैं और अधिकांश प्रत्याशियों का निर्णय भी हो चुका है और भाजपा अभी तक अपने प्रदेश अध्यक्ष का नाम भी घोषित नहीं कर पाई है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने केशव कुमार मौर्य को नया प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाकर सबको चौका दिया है। राज्य के सभी वर्गों में उत्सुकता जगी है कि आखिरकार यह केशव कौन है? भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने केशव की नियुक्ति करके बहुत सारे चुनावी समीकरणों को तोड़ने साहसिक निर्णय लिया। गहन विचार-विमर्श के बाद केशव प्रसाद मौर्य की नियुक्ति करके भाजपा अध्यक्ष ने वंशवाद, जातिवाद तथा समय-समय पर अपनी दावेदारी पेश करनेवालों को हैरानी में डाल दिया है। नए भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद पार्टी के आंतरिक गुटबाज परेशान हो गए हैं। मौर्य को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी की महिला नेता राजेश्वरी पटेल ने विरोध किया तो  पार्टी ने उसे तत्काल निष्कासित कर दिया और यह संकेत भी दे दिया गया कि अनावश्यक बयानबाजी करनेवाले नेताओं व कार्यकर्ताओं पर पार्टी कठोर कार्रवाई करेगी।

मौर्य का राजनीतिक जीवन

पूर्वी उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी में किसान परिवार में पैदा हुए केशव प्रसाद मौर्य के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने संघर्ष के दौर में पढ़ाई के लिए अखबार भी बेचे और चाय की दुकान भी चलाई। मौर्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिन्दू परिषद् (विहिप) और बजरंग दल में 12 वर्षों से सक्रियता से कार्यरत रहे हैं। मौर्य ने राम जन्मभूमि तथा गोरक्षा आंदोलन जैसे हिंदुत्व अभियानों में भाग लिया और इसके लिए वे जेल भी गए। इन सबके बावजूद उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पटल पर उनकी बड़ी पहचान नहीं रही है।

केशव प्रसाद मौर्य को भाजपा में बहुत काम लोग जानते हैं। भाजपा में उनका राजनीतिक जीवन सिर्फ 4 वर्षों का है। मौर्य का राजनीतिक जीवन 2012 में शुरू हुआ। 2012 में इलाहाबाद की सिराथू सीट से वे विधायक बने। 47 साल के केशव प्रसाद मौर्य जिस फूलपुर से पार्टी के सांसद हैं, वहीं से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तीन बार चुनाव जीते हैं। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में मौर्य ने तीन लाख वोटों से क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को हराकर पहली बार फूलपुर में भाजपा का कमल खिलाया। मौर्य 2016 में पार्टी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं। केशव प्रसाद भले ही प्रदेश की कमान संभालने वाले 12 वें भाजपा नेता हो, लेकिन पिछड़ा समाज से आकर प्रदेश की कमान संभालनेवाले नेताओं के क्रम में उनका स्थान चौथा है। इससे पूर्व कल्याण सिंह, ओम प्रकाश सिंह और विनय कटियार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं।

mayawati-akhilesh-yadav-keshavprasad-mauryaउत्तर प्रदेश : राजनीति में जातिगत समीकरण हावी  

उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जो दीर्घकाल से देश की राजनीतिक दशा व दिशा को तय करता आ रहा है। यहां की राजनीति में जातिगत और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल चलता रहता है। यही कारण है कि यह यूपी संप्रदाय और जाति आधारित राजनीति की प्रयोगशाला बनकर रह गया है। इस प्रदेश में 18 मंडल, 75 जनपद, 312 तहसील, 80 लोकसभा, 30 राज्यसभा के साथ 403 विधानसभा सीटें हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 20 करोड़ की आबादी है, जिसमें 79.73 प्रतिशत हिंदू, 19.26 प्रतिशत मुस्लिम, 0.18 प्रतिशत ईसाई तथा 0.32 प्रतिशत सिख हैं।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में जातिगत समीकरण को खूब महत्त्व दिया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहां के मतदाता अपना वोट नेता को नहीं, जाति को देते हैं। इसलिए ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि हमेशा की तरह इस बार भी मतदाता वोट तो जाति को ही देंगे। इसलिए सभी राजनीतिक दल अधिकाधिक जातियों को साधने में लगे हैं। उत्तर प्रदेश में जातिगत वोटबैंक की बात करें तो यहां अगड़ी जाति से 16 प्रतिशत और पिछड़ी जाति से 35 प्रतिशत वोट आते हैं, वहीं 25 प्रतिशत दलित, 18 प्रतिशत मुस्लिम, 5 प्रतिशत जाट और 1 प्रतिशत अन्य वोटर्स तय करते हैं कि राज्य में सर्कार किसकी बनेगी। अगड़ी जाति में 8 प्रतिशत ब्राह्मण, 5 प्रतिशत ठाकुर और 3 प्रतिशत अन्य हैं, वहीं पिछड़ी जातियों में 13 प्रतिशत यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी और 10 प्रतिशत अन्य हैं।

उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित के अध्ययन से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी को 30 प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसकी जीत पक्की है। 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने 25 प्रतिशत दलित, 8 प्रतिशत ब्राह्मण और 18 प्रतिशत मुस्लिम वोटों को अपनी पार्टी में जोड़ने में सफल रहीं थीं और यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी थी। इसी तरह 2012 में 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों सहित 18 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) को सफलता मिली और सपा की पूर्ण बहुमतवाली सरकार बनी। पर 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी लहर के चलते यूपी में भाजपा गठबंधन को 80 में से 73 सीटें मिली, जबकि बसपा सफा हो गई और सपा को केवल 5 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था।

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इसलिए मौर्य का चयन सटीक

केशव प्रसाद मौर्य कोइरी समाज के हैं और प्रदेश में कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा ओबीसी में आते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के साथ ही अन्य चुनावों में भी भाजपा को गैर यादव जातियों में इन जातियों का समर्थन मिलता रहा है। भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य का प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में चयन कर पिछड़ी जातियों को अपने समर्थन का संदेश भी दे दिया है।

उत्तर प्रदेश में सरकार बनने के लिए भाजपा को अगड़े-पिछड़े दोनों का समर्थन प्राप्त करना बेहद जरुरी है। केशव प्रसाद मौर्य की हिंदुत्व छवि जहां सवर्णों का विश्वास अर्जित करने में सक्षम है, वहीं उनकी पिछड़ी जाति होने के कारण वे प्रदेश की पिछड़ी जातियों और दलित वर्गों को अपनी ओर आकर्षित करने में कारगर साबित हो सकती है। इस दृष्टि से मौर्य एक उत्तर प्रदेश के लिए एक संतुलित चेहरा है और उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति बेहद सटीक निर्णय माना जा रहा है। भाजपा ने ज़िला और मंडल स्तर पर भी बड़ी संख्या में ओबीसी नेताओं को कमान दे दिया है। भाजपा के इस कदम से सामाजिक समीकरणों को दुरुस्त करने की कोशिश हो रही है, जिसने विरोधियों की बेचैनी को बढ़ा दिया है। यही कारण है कि यूपी की सियासत अब राजनीतिक माहौल रोमांचक होनेवाला है। अखिलेश यादव और मायावती जैसे बड़े चेहरों के सामने केशव प्रसाद मौर्य की चुनौती विधानसभा चुनाव को कितना प्रभावित करेगी, इसपर सब अपने-अपने तरीके से अलग-अलग विश्लेषण कर रहे हैं।

मौर्य की नियुक्ति और संभावनाएं   

केशव प्रसाद मौर्य की नियुक्ति करके भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश के जातिगत समीकरणों को साधने का प्रयास किया है। भाजपा के इस निर्णय का संघ परिवार में भी स्वागत हो रहा है। इस कारण प्रदेश के विरोधी दल सकपका गए हैं और कुछ हद तक उनकी प्रारम्भिक बैचेनी भी दिखाई दी। माना जा रहा है कि मौर्य जातिगत समीकरणों में 50 प्रतिशत फिट बैठ रहे हैं वह जिस पिछड़ी जाति से आते हैं उसके 50 प्रतिशत वोटर प्रदेश में हैं। मौर्य के अध्यक्ष बनने से पार्टी को सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि कल्याण सिंह, उमाभारती, संतोष गंगवार और विनय कटियार जैसे पिछड़े नेताओं के बाद भाजपा को एक और युवा पिछड़ा नेता मिल गया है।

मौर्य की नियुक्ति होने के बाद प्रदेश के विरोधी दलों ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि मौर्य दागी राजनेता हैं तथा उन पर कई प्रकार के आपराधिक मुकदमें चल रहे हैं। मौर्य ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उन पर लगे सभी केस दरअसल राजनीति से प्रेरित हैं और वे अधिकांश मामलों में बरी हो चुके हैं। उन्होंने 2017 के विधान सभा चुनाव में सपा-बसपा के सफाए के साथ ही भाजपा के लिए 265 प्लस का लक्ष्य भी निर्धारित कर दिया।   अपना काम संभालने के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मौर्य ने स्पष्ट कर दिया है कि भगवान राम और अयोध्या का राम मंदिर आस्था का मुद्दा है, राजनीति का नहीं। अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में विकास हमारा मुद्दा रहेगा। हम सपा-बसपा मुक्त उत्तर प्रदेश और कांग्रेस मुक्त भारत बनाएंगे।

चुनावी दृष्टि से उत्तर प्रदेश सबसे महत्वपूर्ण   

निश्चय ही मौर्य के सामने प्रधानमंत्री मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सपनों को पूरा करने की बड़ी भारी चुनौती है। उत्तर प्रदेश एक अतिमहत्वपूर्ण राज्य है। यदि यहां पर भारतीय जनता पार्टी सभी प्रकार के राजनीतिक समीकरणों को लोकसभा चुनावों की तर्ज पर ध्वस्त करते हुए चली गई तो केंद्र की सत्ता मजबूत हो जाएगी। राज्यसभा में अपना पूर्ण बहुमत हो जाएगा तथा फिर राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति का चयन अपनेनुसार हो सकेगा। हर जगह ही भाजपा का अपना पूर्ण बहुमत होने की स्थिति में ही राममंदिर का सपना पूरा हो सकेगा। यही कारण है कि भाजपा ने बहुत ही सधे हुए कदमों से फैसले लेने प्रारम्भ कर दिए हैं।

उत्तर प्रदेश में एक तरफ सपा सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी है, दूसरी तरफ बसपा भी सत्ता में वापसी के लिए जोर लगा रही है, वहीं भाजपा उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहराना चाहती है। विगत चार विधानसभा चुनावों से विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। भले ही 2014 में लोकसभा चुनावों के बाद 71 सांसदों के होने के बाद भी जितने उपचुनाव हुए उनमें अधिकांश में पराजय का मुंह देखना पड़ा है। ऐसी स्थिति में, फूलपुर में पहली बार कमल खिलानेवाले केशव प्रसाद मौर्य भाजपा को पुनः सत्ता में वापस ला सकेंगे, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

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क्रिकेट का बढ़ता रोमांच और हमारी भारतीय टीम  

indian-cricketफुटबॉल के बाद क्रिकेट ही ऐसा खेल है जो विश्व में दिन ब दिन अधिक लोकप्रिय होता जा रहा है। इसका कारण क्रिकेट में बेहतरीन बल्लेबाजी, गेंदबाजी, क्षेत्ररक्षण और विकेट कीपिंग का रोमांच है। टेस्ट और वन डे क्रिकेट मैचों ने लोगों के बीच खूब लोकप्रियता बटोरी। इसके बाद क्रिकेट प्रेमियों में धुआंधार क्रिकेट की इच्छा जगी और शुरू हुआ टी-20 मैचों का दौर! समयाभाव के दौर में शुरू हुए इस झटपट क्रिकेट ने हुनरमंद और शक्तिशाली बल्लेबाजों को अच्छा मंच प्रदान किया है।

माना जाता है कि सोलहवीं शताब्दी में क्रिकेट शुरू हुआ, परन्तु पहला अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट 18वीं शताब्दी में खेला गया। 19वीं शताब्दी में क्रिकेट का रंग दुनिया में छाने लगा था, लेकिन क्रिकेट का रोमांच 19वीं शताब्दी के अंतिम 3 दशकों में ज्यादा बढ़ने लगा जब 1975 को अन्तराष्ट्रीय विश्वकप क्रिकेट आयोजन किया गया।

49-percentक्रिकेट में रोमांच को बढ़ानेवालों में दुनिया के अनेक देशों के खिलाड़ियों ने योगदान दिया है, जिसमें सर डॉन ब्रेडमैन (ऑस्ट्रेलिया), सर विवियन रिचर्ड्स (वेस्ट इंडीज), सर रिचर्ड हेडली (न्यूजीलैंड), सर गैरी सोबर्स (वेस्ट इंडीज), कार्ल हूपर (वेस्ट इंडीज), कर्टनी हैब्रोस (वेस्ट इंडीज), कपिल देव (भारत), सुनील गावस्कर (भारत), फारूक इंजिनियर (भारत), दिलीप वेंगसरकर (भारत), इमरान खान (पाकिस्तान), जावेद मियांदाद (पाकिस्तान), ब्रायन लारा (वेस्ट इंडीज), सचिन तेंदुलकर (भारत), शेन वार्न (ऑस्ट्रेलिया), वसिम अकरम (पाकिस्तान), मुथैया मुरलीधरन (श्रीलंका), सनथ जयसूर्या (श्रीलंका) आदि क्रिकेटरों का नाम उल्लेखनीय है।

क्रिकेट के रोमांच में भारत का योगदान   

19वीं शताब्दी से अबतक क्रिकेट इतिहास में नजर डालें तो क्रिकेट के प्रति लोगों की रूचि बढ़ाने में भारत का बहुत बड़ा योगदान है। तकनीक के मास्टर खिलाड़ी सुनील गावस्कर, श्रेष्ठ गेंदबाज और आलराउंडर कपिल देव तथा क्रिकेट के भगवान के नाम से जग विख्यात मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर क्रिकेट जगत के लिए वरदान साबित हुए हैं। भारतीय क्रिकेट के वर्तमान नायक के रूप में विराट कोहली का डंका सारे विश्व में बज रहा है। इन खिलाड़ियों के बेहतरीन खेल के कारण भारत में क्रिकेट के प्रति लोगों की रूचि दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इसलिए भारत में होनेवाले मैचों में पूरा स्टेडियम खचाखच भरा रहता है और घर, ऑफिस, दुकान हर तरफ लोग जहां भी हो इस खेल का भरपूर लुफ्त उठाते हैं।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) शुरू कर दुनिया के धाकड़ बल्लेबाजों और श्रेष्ठ गेंदबाजों को अवसर दिया। भारत में शुरू हुए इस आईपीएल के आयोजनों ने क्रिकेट के खुमार को और बढ़ा दिया। आज दुनिया के खिलाड़ी भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता के चलते अपने चयन को अपना भाग्य मानते हैं, क्योंकि आईपीएल में खिलाड़ियों का चयन, उनका प्रदर्शन उनके देश की टीम में जगह पक्का कराने के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है और यह उस खिलाड़ी की लोकप्रियता के साथ उसके धनार्जन का महत्वपूर्ण साधन भी होता है।

no-bollअब नो बॉल भी बढ़ाता है रोमांच  

भारतीय क्रिकेट टीम दुनिया की बेहतरीन क्रिकेट टीमों में से एक है। 1983 और 2011 में विश्वकप जीतनेवाली भारतीय टीम ने 2007 में पहले टी-20 विश्वकप का ख़िताब अपने नाम किया है। खेल में हार-जीत चलती रहती है। क्रिकेट प्रेमियों द्वारा अपनी टीम की जीत पर ख़ुशी मनाना और हार पर मलाल जाहिर करना भी स्वाभाविक है। हाल ही में 31 मार्च हो हुए भारत-वेस्ट इंडीज टी-20 के सेमीफाइनल में भारत को हार का सामना करना पड़ा। इस मैच में आर. अश्विन और हार्दिक पंड्या द्वारा डाले गए दोनों नो बॉल में विकेट गए थे, पर नो बॉल के चलते भारत को इसका लाभ नहीं मिल सका। विश्लेषकों और खुद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी टीम की हार में इन 2 गेंदों को मुख्य कारण माना है। इस तरह की नो बॉल की गलतियां और इसके बदले विपक्षी टीम को मिलनेवाले 1 और गेंद व फ्री हित का मौका क्रिकेट को रोमांच प्रदान करते हैं। जो मौके को चौकों और छक्कों में भुनाए या फील्डिंग वाली टीम फील्डिंग से बल्लेबाज को रनआउट करे, सफलता उनकी ओर दौड़ती है। यही इस मैच में हुआ। वेस्टइंडीज की जीत के हीरो रहे लेंडल सिमंस 2 बार कैच आउट हुए पर नो बॉल ने उसे जीवनदान दिया और इस अवसर को भुनाते हुए उसने वेस्ट इंडीज को जीत दिलाया। इसके साथ भारतीय टीम टी-20 विश्वकप के ख़िताब से बाहर हो गई और अब उसे भावी टूर्नामेंट की तैयारी में लगना है।

sachin-and-sehwagभारतीय टीम की ओपनिंग जोड़ी  

इस दौर में भारतीय क्रिकेट टीम बेहतर खेल का प्रदर्शन कर रही है, चूंकि इसमें कुछ कमी दिखाई देती है। पहले सौरव गांगुली और सचिन तेंदुलकर भारतीय पारी की शुरुवात करते थे, इसके बाद सचिन के साथ विरेन्द्र सहवाग ओपनिंग बैटिंग करते थे। यह दुनिया की खतरनाक ओपनिंग जोड़ी मानी जाती थी, बड़े से बड़ा गेंदबाज इस जोड़ी के सामने नहीं टिकते थे। अब भारतीय पारी की शुरुवात रोहित शर्मा और शिखर धवन करते हैं, जो कभी चलता है कभी नहीं। इसमें नियमितता जरुरी है।

dravid-viratनंबर 3 का कमाल जारी  

भारतीय टीम में पहले नम्बर 3 पर बल्लेबाजी कर ‘दि-वाल’ के नाम से ख्यात राहुल द्रविड़ ने छाप छोड़ी, वहीं वीवीएस लक्ष्मण ने भी मध्यक्रम में अपने बल्लेबाजी का लोहा मनवाया था। अब विराट कोहली तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने आते हैं और वे इस क्रम में खेलनेवाले दुनिया के सबसे श्रेष्ठ बल्लेबाज हैं, यह उन्होंने अबतक साबित कर दिखाया है। 4 और 5 वे नंबर पर कभी सुरेश रैना, कभी युवराज सिंह या कभी अजिंक्य रहाणे आते हैं। इसके बाद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी बैटिंग करते हैं। क्रिकेट के मध्यक्रम बल्लेबाजी में चौथे और पांचवे क्रम का स्थान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। पर इस स्थान पर कौन बल्लेबाजी करेगा यह पक्का नहीं रहता है। इस दृष्टि से चार और पांच क्रमांक पर निश्चित खिलाड़ी रखना जरुरी है, तभी वह खिलाड़ी टीम में अपनी निश्चित भूमिका ठीक तरह निभा सकेगा।

dhoniyuvrajptilनम्बर 4 और 5 क्रम को बनाएं मजबूत       

सारी दुनिया युवराज सिंह और धोनी के विस्फोटक बल्लेबाजी से परिचित हैं और वे परिस्थिति के अनुरूप खेल सकने में सक्षम हैं, जबकि सुरेश रैना जरुरत के समय पार्टनरशिप करने में सफल नहीं हो पाते। बल्लेबाजी करते समय रैना की भूमिका पार्टनरशिप बनाने की जगह ताबड़तोड़ बल्लेबाजी की दिखाई देती है। पार्टनरशिप करने के लिए रूककर खेलना रैना के स्वभाव के विपरीत है। इसलिए क्रिकेटप्रेमियों का मानना है कि युवराज सिंह और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को नम्बर 4 और 5 पर बल्लेबाजी करनी चाहिए, ताकि मध्यक्रम मजबूत हो। इसके बाद रैना, रविन्द्र जडेजा, आर.अश्विन या हरभजन सिंह बल्लेबाजी करते हैं तो निचले क्रम को मजबूती मिलेगी।

indian-bowlersगेंदबाजों को मिले अनुभवी गेंदबाजों का साथ  

गेंदबाजी में कपिल देव, जवागल श्रीनाथ, वेंकटेश प्रसाद और अनिल कुंबले जैसे दिग्गजों का दौर समाप्त हो गया है। तेज गेंदबाज जाहिर खान संन्यास ले चुके हैं और भारतीय टीम में अब आशीष नेहरा और हरभजन सिंह सर्वाधिक अनुभवी गेंदबाज हैं। नए गेंदबाजों को समय रहते उनके अनुभवों का लाभ मिल सकता है। आर. अश्विन ने अपने स्पिन गेंदबाजी का लोहा मनवाया है, वहीं जसप्रीत बुमरा ने योर्कर और स्विंग गेंदबाजी करने में प्रशंसा बटोरी है। भारत को अच्छे तेज गेंदबाजों की जरुरत है। ऐसा नहीं कि सवा सौ करोड़ जनसंख्यावाले देश में खिलाड़ियों की कमी है। भारत की घरेलु क्रिकेट प्रतियोगिता, – रणजी ट्रॉफी, दिलीप ट्रॉफी, ईरानी ट्रॉफी और देवधर ट्रॉफी में बेहतर प्रदर्शन करनेवाले खिलाड़ियों का चयन भारतीय टीम के लिए किया जाता है। खिलाड़ियों का चयन, चयन के बाद उनके मेहनत और अभ्यास पर ही उम्मीद टिकी है। भारतीय टीम धोनी के नेतृत्व में अबतक अच्छा प्रदर्शन करती आई है। भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का उन्हें भरपूर समर्थन मिलता है। कामना करते हैं कि भारत को अच्छे गेंदबाज मिले, भारत की पूरी टीम हर फोर्मेट में अच्छा खेले और अपने श्रेष्ठ प्रदर्शन से विश्व पटल पर देश की कीर्ति बढ़ाए।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’