आम्बेडकर के कथनानुसार – “मार्क्स नहीं, बुद्ध ही सही”

सामान्य

bhagwan-buddha-dr-babasaheb-ambedkar-karl-marksभगवान विष्णु के नवम अवतार माने-जानेवाले भगवान बुद्ध के विचार व सिद्धांत आधुनिक युग में सबसे अधिक प्रासंगिक माने जा रहे हैं। सारी दुनिया में बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता पर बड़े-बड़े विमर्श के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भारत में भी भगवान बुद्ध की बृहद मान्यता है। स्वतंत्र भारत के संविधान के सूत्रधार डॉ.भीमराव आम्बेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 में बौद्ध धम्म स्वीकार कर बुद्ध मत के अनुयायी बनें। डॉ.आम्बेडकर के साथ महार जाति के अनगिनत लोगों ने भी अपने को बौद्ध धम्म का अनुयायी मान लिया। आज लाखों की संख्या में भारत में जातिगत दलित समाज हैं और बहुतांश दलित समाज स्वयं को बौद्ध मतावलंबी कहता है। विशेषकर महाराष्ट्र में इनकी संख्या अधिक है।

भगवान बुद्ध का जीवन और सन्देश जितना सहज है, उसका अनुकरण उतना ही कठिन। समाज में फैले हिंसाचार और अनैतिकता को समाप्त कर आदर्श व शांति का पथ दिखानेवाले भगवान बुद्ध की प्रासंगिकता को क्या हम समझ रहे हैं? क्या बौद्ध धम्म के अनुयायी और भारतीय समाज क्या उनके सिद्धांतों का अनुसरण कर रहे हैं? यह चिंतन का विषय है। क्योंकि वर्तमान भारत में बाबासाहेब आम्बेडकर की फोटो को सामने रखकर मार्क्सवाद का ढोल पिटा जा रहा है। स्वयं को आम्बेडकर के अनुयायी माननेवाले लोग आज राजनीतिक षड्यंत्रों की भेंट चढ़ रहे हैं। दलित समाज की जातिगत राजनीति में भगवान बुद्ध का सन्देश कहीं धूमिल होता दिख रहा है। इसलिए डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर की बहुत याद आती है। डॉ.बाबासाहब आम्बेडकर ने अक्टूबर,1956 में बौद्ध धम्म स्वीकार किया और इसके लगभग 2 महीने बाद उनका निधन हो गया। बाबासाहब कुछ और वर्ष जीते तो गरीब, अनपढ़, वंचित, शोषित व पीड़ित दलित समाज को भगवान बुद्ध के संदेशों को सहजता से पहुंचा सकते थे। पर देश का दुर्भाग्य ही है कि बाबासाहब बौद्ध धम्म स्वीकारने के 2 माह के भीतर हो गया। फिर भी बाबासाहब का एक भाषण जो उनके अनुयायी और भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ा सन्देश दे गया, उसे समझना बेहद जरुरी है।

29 नवम्बर, 1956 काठमांडू (नेपाल) के वर्ल्ड बुद्धिष्ट कोंफेरेंस में डॉ.भीमराव आम्बेडकर ने “बुद्ध या कार्ल मार्क्स नामक ऐतिहासिक भाषण दिया। इस भाषण में बाबासाहब ने भगवान बुद्ध के पंचशील, अष्टांग मार्ग और अहिंसा व न्याय के संबंध में संकल्पना को स्पष्ट किया। यही नहीं तो उन्होंने सारी दुनिया को बता दिया कि कार्ल मार्क्स के सिद्धांत विश्व का कल्याण नहीं कर सकते।

“बाबासाहब ने भगवान बुद्ध के समतावादी आदर्श के सामने मार्क्स के साम्यवाद का तुलनात्मक विश्लेषण किया और बता दिया कि भगवान बुद्ध के विचार समाज का उत्थान और विश्व का कल्याण कर सकता है, न कि मार्क्स के सिद्धांत।”

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पाने इस भाषण में कहा, “मार्क्स बहुत आधुनिक और बुद्ध बहुत पुरातन हैं। मार्क्सवादी यह कह सकते हैं कि उनके गुण की तुलना में बुद्ध केवल आदिम व अपरिष्कृत ही ठहर सकते हैं। फिर, दो व्यक्तियों के बीच क्या समानता या तुलना हो सकती है? एक मार्क्सवादी बुद्ध से क्या सीख सकता है? बुद्ध एक मार्क्सवादी को क्या शिक्षा दे सकते हैं? फिर भी इन दोनों के बीच तुलना आकर्षक तथा शिक्षाप्रद है। इन दोनों के अध्ययन तथा इन दोनों की विचारधारा व सिद्धांत में मेरी भी रूचि है। इस कारण इन दोनों के बीच तुलना करने का विचार मेरे मन में आया। यदि मार्क्सवादी अपने पूर्वाग्रहों को पीछे रखकर बुद्ध का अध्ययन करें और उन बातों को समझें जो उन्होंने कही हैं और जिनके लिए उन्होंने संघर्ष किया, तो मुझे यकीन है उनका दृष्टिकोण बदल जाएगा। वास्तव में उनसे (मार्क्सवादी) यह आशा नहीं की जा सकती कि बुद्ध की हंसी व मजाक उड़ाने का निश्चय करने के बाद वे उनकी प्रार्थना करेंगे, परंतु इतना कहा जा सकता है कि उनको यह महसूस होगा कि बुद्ध की शिक्षाओं व उपदेशों में कुछ ऐसी बात है, जो ध्यान में रखने के योग्य और बहुत लाभप्रद है।”

डॉ.आम्बेडकर ने कहा, “बुद्ध का नाम सामान्यतः अहिंसा के सिद्धांत के साथ जोड़ा जाता है। अहिंसा को ही उनकी शिक्षाओं व उपदेशों का समस्त सार माना जाता है। उसे ही उनका प्रारंभ व अंत समझा जाता है। बहुत कम व्यक्ति इस बात को जानते हैं कि बुद्ध ने जो उपदेश दिए, वे बहुत ही व्यापक है, अहिंसा से बहुत बढ़कर हैं।”

भगवान बुद्ध का सिद्धांत

बौद्ध धम्म के मुख्य ग्रन्थ “त्रिपिटक” का अध्ययन करनेवाले डॉ.आम्बेडकर ने इस भाषण में भगवान बुद्ध के सिद्धांतों को विस्तापूर्वक प्रस्तुत किया। भगवान बुद्ध के सिद्धांतों की चर्चा करते हुए आम्बेडकर ने कहा, “ मुक्त समाज के लिए पंथ (Religion) आवश्यक है। प्रत्येक पंथ अंगीकार करने योग्य नहीं होता। ईश्वर को पंथ (Religion) का केंद्र बनाना अनुचित है। आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को पंथ (Religion) का केंद्र बनाना अनुचित है। पशुबलि को पंथ का केंद्र बनाना अनुचित है। वास्तविक पंथ का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं। पंथ (Religion) का केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो पंथ (Religion) एक क्रूर अंधविश्वास है।” उन्होंने कहा, “पंथ का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी उत्पत्ति या उसके अंत की व्याख्या करना नहीं। संसार में दुःख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है और इसके समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है।”

भगवान बुद्ध के सिद्धांतीं में मानवीय गुणों के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए आम्बेडकर ने कहा, “सभी मानव प्राणी समान हैं। मनुष्य का मापदंड उसका गुण होता है, जन्म नहीं। जो चीज महत्त्वपूर्ण है, वह है उच्च आदर्श, न कि उच्च कुल में जन्म। सबके प्रति मैत्री का साहचर्य व भाईचारे का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को विद्या प्राप्त करने का अधिकार है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए ज्ञान विद्या की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भोजन की। अच्छा आचारणविहीन ज्ञान खतरनाक होता है। युद्ध यदि सत्य तथा न्याय के लिए न हो, तो वह अनुचित है। पराजित के प्रति विजेता के कर्तव्य होते हैं।”

बाबासाहब कहते हैं कि भगवान बुद्ध का सिद्धांत जितना प्राचीन है उतना ही नवीन भी। उनके उपदेश बहुत व्यापक तथा गंभीर हैं।

मार्क्स का सिद्धांत

कार्ल मार्क्स के मूल सिद्धांत का विवेचन करते हुए बाबासाहब आम्बेडकर ने कहा, “इसमें संदेह नहीं कि मार्क्स आधुनिक समाजवाद या साम्यवाद का जनक है। मार्क्स का सिद्धांत जितना पूंजीपतियों के विरुद्ध था, उतना ही उन लोगों के विरुद्ध भी था, जिन्हें वह स्वप्नदर्शी या अव्यावहारिक समाजवादी कहता था। वह उन दोनों को ही पसंद नहीं करता था।”

आम्बेडकर के अनुसार, मार्क्स का सिद्धांत कहता है कि एक वर्ग का दूसरे वर्ग के साथ स्वार्थ व हित का टकराव व उनमें संघर्ष का होना है। संपत्ति के व्यक्तिगत स्वामित्व से एक वर्ग को शक्ति प्राप्त होती है और दूसरे वर्ग को शोषण के द्वारा दुःख पहुंचाया जाता है। समाज की भलाई के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन करके, दुःख का निराकरण किया जाए।

आम्बेडकर ने कहा, “मार्क्सवादी सिद्धांत को उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जिस समय प्रस्तुत किया गया था, उसी समय से इसकी काफी आलोचना होती रही है। इस आलोचना के फलस्वरूप कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत विचारधारा का काफी बड़ा ढांचा ध्वस्त हो चुका है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मार्क्स का यह दावा कि उसका समाजवाद अपरिहार्य है, पूर्णतया असत्य सिद्ध हो चुका है। सर्वहारा वर्ग की तानाशाही सर्वप्रथम 1917 में, उसकी पुस्तक दास कैपिटल, समाजवाद का सिद्धांत के प्रकाशित होने के लगभग सत्तर वर्ष के बाद सिर्फ एक देश में स्थापित हुई थी। यहां तक कि साम्यवाद, जो कि सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का दूसरा नाम है, रूस में आया तो यह किसी प्रकार के मानवीय प्रयास के बिना किसी अपरिहार्य वस्तु के रूप में नहीं आया था। वहां एक क्रांति हुई थी और इसके रूस में आने से पहले भारी रक्तपात हुआ था तथा अत्यधिक हिंसा के साथ वहां सोद्देश्य योजना करनी पड़ी थी। शेष विश्व में अब भी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के आने की प्रतीक्षा की जा रही है।”

बुद्ध तथा मार्क्स के साधनों की तुलना

“भगवान बुद्ध ने साध्य की प्राप्ति के लिए जो साधन बताए हैं, वह है पंचशील और आर्य अष्टांग मार्ग। जबकि मार्क्स के साम्यवाद के लक्ष्य का साधन हिंसाचार है।”

बाबासाहब ने दुःख के निराकरण के लिए पंचशील के आचरण को महत्वपूर्ण बताया। भगवान बुद्ध के पंचशील में निम्नलिखित बातें आती हैं :- 1. किसी जीवित वस्तु को न ही नष्ट करना और न ही कष्ट पहुंचाना। 2. चोरी अर्थात दूसरे की संपत्ति की धोखाधड़ी या हिंसा द्वारा न हथियाना और न उस पर कब्जा करना। 3. झूठ न बोलना। 4. तृष्णा न करना। 5. मादक पदार्थों का सेवन न करना।

आम्बेडकर के अनुसार, “बुद्ध का मत है कि संसार में कुछ कष्ट व दुःख मनुष्य का मनुष्य के प्रति पक्षपात है। इस पक्षपात का निराकरण किस प्रकार किया जाए? मनुष्य के प्रति मनुष्य के पक्षपात का निराकरण करने के लिए बुद्ध ने आर्य अष्टांग मार्ग निर्धारित किया। इस अष्टांग मार्ग के तत्व इस प्रकार हैं : – 1. सम्यक दृष्टि, 2. सम्यक संकल्प, 3. सम्यक वचन, 4. सम्यक आचरण, 5. सम्यक आजीविका, 6. सम्यक परिरक्षण (प्रयत्न), 7. सम्यक स्मृति, 8. सम्यक समाधि।

आम्बेडकर ने कहा कि “इस आर्य अष्टांग मार्ग का उद्देश्य पृथ्वी पर धर्मपरायणता तथा न्यायसंगत राज्य की स्थापना करना तथा उसके द्वारा संसार के दुःख तथा विषाद को मिटाना है। प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह इन गुणों को अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ अपने व्यवहार में अपनाए। इन पर आचरण करे। यही कारण है कि इन्हें परिमिता (पूर्णता की स्थिति) कहा जाता है। यही वह सिद्धांत है, जिसे बुद्ध ने संसार में दुःख तथा क्लेश की समाप्ति के लिए अपने बोध व ज्ञान के परिणामस्वरूप प्रतिपादित किया है।”

बाबासाहब आम्बेडकर ने कहा, “बुद्ध ने जो साधन अपनाए, वे स्वेच्छापूर्वक अनुसरण करके मनुष्य की नैतिक मनोवृत्ति को परिवर्तित करने के लिए थे। जबकि साम्यवादी कहते हैं कि साम्यवाद को स्थापित करने के केवल दो साधन हैं, पहला है हिंसा। वर्तमान व्यवस्था को भंग करने व तोड़ने के लिए इससे कम कोई भी कार्य या योजना पर्याप्त नहीं होगी। दूसरा साधन है, सर्वहारा वर्ग की तानाशाही। नई व्यवस्था को जारी रखने के लिए उससे कम कोई चीज पर्याप्त नहीं होगी।”

बाबासाहब ने कहा कि समता की बातें बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स दोनों ही करते थे, यह दोनों में समानताएं हैं। पर दोनों के साधनों में बहुत अंतर व विषमताएं हैं। साध्य दोनों में समान हैं।

बुद्ध और मार्क्स के साधनों का मूल्यांकन

डॉ.आम्बेडकर अपने इस भाषण में बुद्ध और मार्क्स के साधनों के मूल्यांकन का विवेचन करते हैं। वे कहते हैं कि हमें इस बात को देखना चाहिए कि किसके साधन श्रेष्ठ तथा दीर्घ काल तक ठहरने व स्थाई बने रहने वाले हैं। आम्बेडकर सवाल पूछते हुए कहते हैं, “साधनों का मूल्य क्या है? किसके साधन अंततः श्रेष्ठ तथा स्थाई हैं? क्या साम्यवादी यह कह सकते हैं कि अपने मूल्यवान साध्य को प्राप्त करने में उन्होंने अन्य मूल्यवान साध्यों को नष्ट नहीं किया है? उन्होंने निजी व्यक्तिगत संपत्ति को नष्ट किया है।”

आम्बेडकर ने जोर देते हुए कहा, “साम्यवादियों ने अपने साध्य व लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए न जाने कितने लोगों की हत्या की है? क्या मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं है? क्या वे संपत्ति को उसके स्वामी का जीवन लिए बिना उससे नहीं ले सकते? तानाशाही का साध्य व लक्ष्य क्रांति को एक स्थाई क्रांति बनाना होता है। यह एक मूल्यवान साध्य है, परंतु क्या साम्यवादी यह कह सकते हैं कि इस साध्य को उपलब्ध करने के लिए उन्होंने अन्य मूल्यवान साध्यों को नष्ट नहीं किया है? तानाशाही में आपका केवल कर्तव्य होता है कि आप कानून का पालन करें, परंतु आपको उसकी आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं होता है। जबकि बुद्ध यह चाहते थे कि प्रत्येक व्यक्ति नैतिक रूप में इतना प्रशिक्षित होना चाहिए कि वह स्वयं ही धर्मपरायणता व न्यायसंगतता का प्रहरी हो जाए।

आम्बेडकर कहते हैं, “जहां तक हिंसा का संबंध है, हिंसा का नाम सुनते ही, उसके विचार से बहुत से लोगों को कंपकंपा आ जाएगी, परंतु यह केवल भावुकता है। हिंसा का पूर्णतया त्याग नहीं किया जा सकता। यहां तक कि गैर-साम्यवादी देशों में भी हत्यारे को फांसी पर लटकाया जाता है। क्या फांसी पर लटकाना हिंसा नहीं है? गैर-साम्यवादी देश एक-दूसरे के साथ युद्ध करते हैं। युद्ध में लाखों लोग मारे जाते हैं। क्या यह हिंसा नहीं है? यदि एक हत्यारे को इसलिए मारा जा सकता है, क्योंकि उसने एक नागरिक को मारा है, उसकी हत्या की है, यदि एक सिपाही को युद्ध में इसलिए मारा जा सकता है, क्योंकि वह शत्रु राष्ट्र से संबंधित है, तो यदि संपत्ति का स्वामी स्वामित्व के कारण शेष मानव जाति को दुःख पहुंचाता है, तो उसे क्यों नहीं मारा जा सकता? ”

आम्बेडकर भगवन बुद्ध के अहिंसा की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि, “बुद्ध हिंसा के विरुद्ध थे, परंतु वह न्याय के पक्ष में भी थे और जहां पर न्याय के लिए बल प्रयोग अपेक्षित होता है, वहां उन्होंने बल प्रयोग करने की अनुमति दी है।”

भगवान बुद्ध और वैशाली सेनाध्यक्ष संवाद

आम्बेडकर ने अपने भाषण में वैशाली के सेनाध्यक्ष सिंहा सेनापति के साथ भगवान बुद्ध के वार्तालाप का उल्लेख किया। सिंहा ने बुद्ध से पूछा, “भगवन, अहिंसा का उपदेश देते व प्रचार करते हैं। क्या भगवन, एक दोषी को दंड से मुक्त करने व स्वतंत्रता देने का उपदेश देते व प्रचार करते हैं? क्या भगवन यह उपदेश देते हैं कि हमें अपनी पत्नियों, अपने बच्चों तथा अपनी संपत्ति को बचाने के लिए, उनकी रक्षा करने के लिए युद्ध नहीं करना चाहिए? क्या अहिंसा के नाम पर हमें अपराधियों के हाथों कष्ट झेलते रहना चाहिए। क्या तथागत उस समय भी युद्ध का निषेध करते हैं, जब वह सत्य तथा न्याय के हित में हो?”

बुद्ध ने उत्तर दिया, – “मैं जिस बात का प्रचार करता हूं व उपदेश देता हूं, आपने उसे गलत ढंग से समझा है। एक अपराधी व दोषी को दंड अवश्य दिया जाना चाहिए और एक निर्दोष व्यक्ति को मुक्त व स्वतंत्र कर दिया जाना चाहिए। यदि एक दंडाधिकारी एक-एक अपराधी को दंड देता है, तो यह दंडाधिकारी का दोष नहीं है। दंड का कारण अपराधी का दोष व अपराध होता है। जो दंडाधिकारी दंड देता है, वह न्याय का ही पालन कर रहा होता है। उस पर अहिंसा का कलंक नहीं लगता। जो व्यक्ति न्याय तथा सुरक्षा के लिए लड़ता है, उसे अहिंसा का दोषी नहीं बनाया जा सकता। यदि शांति बनाए रखने के सभी साधन असफल हो गए हों, तो हिंसा का उत्तरदायित्व उस व्यक्ति पर आ जाता है, जो युद्ध को शुरू करता है। व्यक्ति को दुष्ट शक्तियों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। यहां युद्ध हो सकता है, परंतु यह स्वार्थ की या स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की शर्तों के लिए नहीं होना चाहिए।”

आम्बेडकर कहते हैं कि बुद्ध तानाशाही का बिलकुल समर्थन नहीं करते। वे कहते हैं, “बुद्ध लोकतंत्रवादी के रूप में पैदा हुए थे और लोकतंत्रवादी के रूप में ही मरे। उनके समय में चौदह राजतंत्रीय राज्य थे और चार गणराज्य थे। वह शाक्य थे और शाक्यों का राज्य एक गणराज्य था। उन्हें वैशाली से अत्यंत अनुराग था, जो उनका द्वितीय घर था, क्योंकि वह एक गणराज्य था। उन्होंने महानिर्वाण से पूर्व अपना वर्षावास वैशाली में व्यतीत किया था। अपने वर्षावास के पूरा हो जाने के बाद उन्होंने वैशाली को छोड़कर कहीं और जाने का निश्चय किया, जैसी उनकी आदत थी। कुछ दूर जाने के बाद, उन्होंने मुड़कर वैशाली की ओर देखा और फिर आनंद से कहा, ‘तथागत वैशाली के अंतिम बार दर्शन कर रहे हैं।’ उससे पता चलता है कि इस गणराज्य के प्रति उनका कितना लगाव व प्रेम था।”

भगवान बुद्ध पूर्णतः समतावादी

आम्बेडकर कहते हैं कि भगवान बुद्ध पूर्णतः समतावादी थे। वे बताते हैं कि एक बार बुद्ध की मां महाप्रजापति गौतमी ने, जो भिक्षुणी संघ में शामिल हो गई थी, सुना कि बुद्ध को सर्दी लग गई है। उन्होंने उनके लिए एक गुलूबंद तैयार करना तुरंत शुरू कर दिया। इसे पूरा करने के बाद वह उसे बुद्ध के पास ले गईं और उसे पहनने के लिए कहा, परंतु उन्होंने यह कहकर इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया कि यदि यह एक उपहार है, तो उपहार समूचे संघ के लिए होना चाहिए, संघ के एक सदस्य के लिए नहीं। उन्होंने बहुत अनुनय-विनय की, परंतु उन्होंने (बुद्ध ने) उसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया, वह बिल्कुल नहीं माने।

आम्बेडकर कहते हैं कि भिक्षु संघ का संविधान सबसे अधिक लोकतंत्रात्मक संविधान था। बुद्ध संघ के भिक्षुओं में से केवल भिक्षु थे। वह तानाशाह कभी नहीं थे। उनकी मृत्यु से पहले उनको दो बार कहा गया कि वह संघ पर नियंत्रण रखने के लिए किसी व्यक्ति को संघ का प्रमुख नियुक्त कर दें, परंतु हर बार उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया कि धम्म संघ का सर्वोच्च सेनापति है। उन्होंने तानाशाह बनने और तानाशाह नियुक्त करने से इंकार कर दिया।

आम्बेडकर कहते हैं कि बुद्ध ने (बौद्ध) संघ में तानाशाही-विहीन साम्यवाद की स्थापना की थी। यह हो सकता है कि वह साम्यवाद बहुत छोटे पैमाने पर था, परंतु वह तानाशाही-विहीन साम्यवाद था, वह एक चमत्कार था।

बुद्ध का तरीका साम्यवादियों से बिलकुल अलग

बुद्ध का तरीका अलग था। उनका तरीका मनुष्य के मन को परिवर्तित करना, उसकी प्रवृत्ति व स्वभाव को परिवर्तित करना था, ताकि मनुष्य जो भी करे, उसे स्वेच्छा से बल-प्रयोग या बाध्यता के बिना करे। मनुष्य की चित्तवृत्ति व स्वभाव को परिवर्तित करने का उनका मुख्य साधन उनका धम्म (धर्म) था तथा धम्म के विषय में उनके सतत उपदेश थे। बुद्ध का तरीका लोगों को उस कार्य करने के लिए, वे जिसे पसंद नहीं करते थे, बाध्य करना नहीं था, चाहे वह उनके लिए अच्छा ही हो। उनकी पद्धति मनुष्यों की चित्तवृत्ति व स्वभाव को बदलने की थी, ताकि वे उस कार्य को स्वेच्छा से करें, जिसको वे अन्यथा न करते।

आम्बेडकर कहते हैं कि साम्यवादियों की दृष्टि में धर्म (धम्म) अभिशाप है। धर्म के प्रति उनमें घृणा इतनी गहरी बैठी है कि वे साम्यवादियों के लिए सहायक धर्मों तथा जो उनके लिए सहायक नहीं हैं, उन धर्मों के बीच भी भेद नहीं करेंगे। साम्यवादी ईसाई मत के प्रति अपनी घृणा को बौद्ध धर्म तक ले गए हैं।”

आम्बेडकर कहते हैं, “मानवता के लिए केवल आर्थिक मूल्यों की ही आवश्यकता नहीं होती, उसके लिए आध्यात्मिक मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता भी होती है। स्थाई तानाशाही ने आध्यात्मिक मूल्यों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और वह उनकी ओर ध्यान देने की इच्छुक भी नहीं है। मनुष्य का विकास भौतिक रूप के साथ-साथ आध्यात्मिक रूप से भी होना चाहिए।” आम्बेडकर कहते हैं कि भ्रातृत्व, स्वतंत्रता तथा समानता, ये तीनों तभी विद्यमान रह सकती हैं, जब व्यक्ति बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करे।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’  

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