राष्ट्र व संस्कृति की रक्षा का संकल्प

Bharat Mata Picute

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी गोलवलकर के अनुसार, “राष्ट्र सांस्कृतिक ईकाई होती है। जब किसी जनसमूह की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों, तब तक वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” वहीं अन्त्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इस बात और स्पष्ट करते हुए कहा है, “जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक मिशन, विचार या आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” स्वामी विवेकानन्दजी के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र का अपना उद्देश्य है। स्वामीजी ने राष्ट्र के ध्येय के सम्बन्ध में कहा है, “व्यक्ति को मुक्तिमार्ग पर बढ़ने के लिए पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता, यही है हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य। तुम चाहे वैदिक, जैन या बौद्ध, चाहे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत अथवा द्वैत, किसी भी ‘मत’ को टटोल लो, ये सभी इस उद्देश्य पर एक हैं।” स्वामीजी ने कहा है“हमारा ‘धर्म’ ही हमारे तेज, हमारे बल,इतना ही नहीं तो हमारे राष्ट्रीय जीवन का भी मूलाधार है।”

संसार को अध्यात्म व योग का उपहार देनेवाला हमारा भारत देश ‘राष्ट्र’ ही है। हम भारतमाता कहकर अपने राष्ट्र की वंदना करते हैं। अपने राष्ट्र की वंदना करने के अनेक तरीके हैं। कोई भारतमाता की जय कहता है तो कोई अपने परिसर को स्वच्छ रखने में भूमिका निभाता है, कोई खेत में हल चलाता है तो कोई अनुसन्धान करता है, कोई गीत लिखकर तो कोई गीत गाकर मातृभूमि की अर्चना करता है। इसी तरह शिक्षक विद्यार्थियों को शिक्षित कर और सीमा पर जवान शत्रुओं से लड़कर राष्ट्र की वंदना करते हैं। सैनिक, शिक्षक, किसान, मजदूर, वैज्ञानिक और समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन न्योछावर करनेवाले समाजसेवी सब मिलकर राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा करते हैं। सेना की सुरक्षा, शिक्षकों के अध्यापन, किसान तथा मजदूरों के परिश्रम तथा वैज्ञानिकों के अनुसन्धान से प्राप्त सुविधाओं का लाभ लेनेवाला समाज यदि राष्ट्र की रक्षा का संकल्प लेता है तो राष्ट्र पूरी तरह सुरक्षित हो सकता है।  

रक्षाबंधन का पर्व हमें रक्षक होने का स्मरण दिलाता है। हिन्दी की महान कवयित्री महादेवी वर्मा ने खंडवा में अपने एक व्याख्यान में कहा था, “राखी सूत की है। लेकिन हम सबको कलाई वज्र की बनानी होगी। अगर कलाई वज्र की न हो तो इसे सम्भाल नहीं सकेंगे।” महादेवी वर्मा के इस कथन की आज प्रासंगिकता बढ़ गई है। एक तरफ पाकिस्तान पोषित आतंकवाद कश्मीर को लहूलुहान किए बैठा है, वहीं छत्तीसगढ़, झारखण्ड आदि राज्यों में नक्सलवाद अपनी जड़ें जमाये बैठा है। इसी तरह अपने समाज में अपने करिअर की चिन्ता में चूर युवा दिखाई देता है तो दूसरी ओर धनार्जन के लिए किसी भी हद को पार करनेवाले लोग दिखाई देते हैं। ऐसे में राष्ट्र की रक्षा के लिए स्वयं की कलाई को वज्र की तरह शक्तिशाली बनाने का व्रत कौन लेगा, यह हम सभी के समक्ष एक बड़ा प्रश्न है। इस प्रश्न के उत्तर की खोज में यह रक्षा विशेषांक है। वज्र की तरह शक्तिशाली वीर सैनिकों के पराक्रम के बल पर ही यह राष्ट्र सुरक्षित है। राष्ट्र के अंतर्बाह्य चुनौतियों का बड़ी प्रखरता से उत्तर देनेवाले हमारे राष्ट्रप्रहरी सैनिकों को शत-शत नमन।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

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