गुरु गोविन्द सिंह

guru_gobind_singh_jiभारतीय इतिहास अपने देश में जन्में महापुरुषों के गौरवमयी गाथा से परिपूर्ण है। यहाँ समय-समय पर ऐसे वीरों ने जन्म लिया जिनकी वीरता व साहस को  देखकर शत्रु सेना दंग रह जाती थी। श्री गुरु तेगबहादुर के कालखंड में औरंगजेब के अत्याचार चरम सीमा पर थे। दिल्ली का शासक हिन्दू धर्म तथा संस्कृति को समाप्त कर देना चाहता था। हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया साथ ही हिन्दुओं को शस्त्र धारण करने पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया था। ऐसे समय में कश्मीर प्रांत से पाँच सौ ब्राह्मणों का एक जत्था गुरु तेगबहादुरजी के पास पहुँचा। पंडित कृपाराम इस दल के मुखिया थे। कश्मीर में हिन्दुओं पर जो अत्याचार हो रहे थे, उनसे मुक्ति पाने के लिए वे गुरुजी की सहानुभूति व मार्गदर्शन प्राप्ति के उद्देश्य से आये थे। गुरु तेगबहादुर उन दु:खीजनों की समस्या सुन चिंतित हुए। सभागार में उपस्थित सभी गंभीर थे। मौन का वातावरण छाया हुआ था। अपने पिता को विचार मग्न देखकर बालक गोविन्दराय (बाद में गुरु गोविन्द सिंहजी) से नहीं रहा गया। उन्होंने अपने पिता से उनकी गंभीर्यता का कारण पूछा – गुरुजी तेगबहादुरजी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी महापुरुष के बलिदान से ही इनका कष्ट दूर हो सकता है। बालक गोविन्द सिंह ने सहज भाव से कहा, ‘‘पिताजी आप से महान भला और कौन हो सकता है जो इस कार्य को पूर्ण कर सके ?” अपने पुत्र के निर्भीक व स्पष्ट वचनों को सुनकर गुरु तेगबहादुर का हृदय गदगद हो गया। उन्हें इस समस्या का समाधान मिल गया। उन्होंने कश्मीरी पंडितों से कहा-

‘‘आप औरंगजेब को संदेश भिजवा दें कि यदि गुरु तेगबहादुर इस्लाम स्वीकार लेंगे, तो हम सभी इस्लाम स्वीकार कर लेंगे” और फिर दिल्ली में गुरुजी का अमर बलिदान हुआ जो हिन्दू धर्म की रक्षा के महान अध्याय के रूप में भारतीय इतिहास में अंकित हो गया। 

ऐसे निर्भीक व तत्परता के गुणों से युक्त श्री गुरु गोविन्द सिंहजी का जन्म संवत् 1723 विक्रमी की पौष सुदी सप्तमी अर्थात 22 दिसम्बर सन् 1666 में हुआ। उनके पिता गुरु तेगबहादुर उस समय अपनी पत्नी गुजरी तथा कुछ शिष्यों के साथ पूर्वी भारत की यात्रा पर थे। अपनी गर्भवती पत्नी और कुछ शिष्यों को पटना छोड़कर वे असम रवाना हो गये थे। वहीं उन्हें पुत्र प्राप्ति का शुभ समाचार मिला। बालक गोविन्द सिंह के जीवन के प्रारंभिक 6 वर्ष पटना में ही बीते। 

अपने पिता के बलिदान के समय गुरु गोविन्द सिंह की आयु मात्र 9 वर्ष की थी। इतने कम उम्र में गुरु पद पर आसीन होकर उन्होंने गुरु पद को अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से और भी गौरवान्वित किया। उनके जीवन के प्रथम पाँच-छह वर्ष पटना में ही व्यतीत हुए। वे बचपन से ही बहुत पराक्रमी व प्रसन्नचित व्यक्तित्व के धनी थे। उन्हें सिपाहियों का खेल खेलना बहुत पसंद था। उनके मित्र उनकी सेना थी। वे उन्हें दो दलों में बाँट देते थे। उनमें से एक दल के वे स्वयं नेता बन जाते थे, तो दूसरे दल में से किसी को नेता बना देते थे। उनके खेल में साहस, योग्यता और धैर्य का गुण विकसित करने की अद्भुत शक्ति थी। 

एक दिन वे शहर में अपने मित्रों के साथ खेल रहे थे तभी पटना के नवाब वहाँ से गुजरे। उनके एक सेवक ने बालकों से नवाब को सलाम करने को कहा। किन्तु गुरु गोविन्द सिंह ने अपने साथियों को ऐसा करने से मना कर दिया और उन पर हँसने की योजना बनाई। जैसे ही नवाब वहाँ पहुँचे वे सभी उनका मजाक उड़ाते हुए हँसते और चिल्लाते वहाँ से भाग गये। बालक गोविन्द बचपन में ही जितने बुद्धिमान थे उतने ही अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए किसी से भी लोहा लेने में पीछे नहीं हटते थे। वे एक कुशल संगठक थे। दूर-दूर तक फैले हुए सिख समुदाय को ‘हुक्मनामे’ भेजकर, उनसे धन और अस्त्र-शस्त्र का संग्रह उन्होंने किया था। एक छोटी-सी सेना एकत्र की और युद्ध नीति में उन्हें कुशल बनाया। उन्होंने सुदूर प्रदेशों से आये कवियों को अपने यहाँ आश्रय दिया। इस प्रकार गुरु गोविन्द सिंह के महान व्यक्तित्व से सिख पंथ की नवचेतना का जागरण होने लगा था। 

यद्यपि बालक गोविन्द सिंह को बचपन में अपने पिता श्री गुरु तेगबहादुरजी से दूर ही रहना पड़ा था, तथापि श्री गुरु तेगबहादुरजी ने उनकी शिक्षा का सुव्यवस्थित प्रबंध किया था। साहेबचंद खत्रीजी से उन्होंने संस्कृत एवं हिन्दी भाषा सीखी और काजी पीर मुहम्मदजी से उन्होंने फारसी भाषा की शिक्षा ली। कश्मीरी पंडित कृपारामजी ने उन्हें संस्कृत भाषा तथा गुरुमुखी लिपि में लेखन, इतिहास आदि विषयों के ज्ञान के साथ उन्हें तलवार, बंदूक तथा अन्य शस्त्र चलाने व घुड़सवारी की भी शिक्षा दी थी। श्री गोविन्द सिंहजी के हस्ताक्षर अत्यंत सुन्दर थे। वे चित्रकला के भी अच्छे जानकार थे। सिराद, (एक प्रकार का तंतुवाद्य) मृदंग और छोटा तबला बजाने में वे अत्यंत कुशल थे। उनके काव्य में ध्वनि नाद और ताल का सुंदर संगम हुआ है। 

विवाह – 

लाहौर के श्री भिकिया (सुभिकीजी) खत्री की कन्या सुश्री जितो के साथ श्री गोविन्द सिंहजी का विवाह सन् 1677 ई. में सम्पन्न हुआ। श्री रामसरणजी की कन्या सुश्री सुन्दरीजी के साथ उनका द्वितीय विवाह 1684 ई. में हुआ। 

उनका तीसरा विवाह रोहटास के सिख श्री हर भगवानजी की कन्या सुश्री साहिब दीवान के साथ सम्पन्न हुआ। 

श्री गुरु गोविन्द सिंहजी के चार पुत्र थे, बड़े पुत्र अजीत सिंहजी (माता सुन्दरी जी) का जन्म 26 जनवरी, 1687 के दिन हुआ था। जुझार सिंहजी (माता जितोजी) का जन्म 14 मार्च, सन् 1691 ई. में, जोरावर सिंहजी (माता जितोजी) का जन्म 17 नवम्बर, सन् 1696 ई. में और सबसे छोटे पुत्र फतेह सिंह (माता जितोजी) जन्म 25 फरवरी, सन् 1699 ई. में हुआ।    

रणजीत नगाड़ा 

श्री गुरु गोविन्द सिंहजी ने एक नगाड़ा बनवाया था और उसका नाम रणजीत नगाड़ा रखा था। यह नगाड़ा प्रात: व सायंकाल बजाया जाता था। श्री गुरु गोविन्द सिंहजी ने धीरे-धीरे सेना एकत्रित करना प्रारंभ कर दिया। उनकी सेना में स्वामी भक्त सिखों के साथ-साथ कुछ लोग धनार्जन के लिए भी सेना में भरती हुए, उन्होंने लाहौर से तीक्ष्ण बाण मंगवाये और धनुर्विद्या का अभ्यास प्रारंभ कर दिया। 

इस प्रकार श्री गुरु गोविन्द सिंहजी का बढ़ता हुआ संगठन, पहाड़ी राजाओं में डर पैदा कर रहा था। वे उन पर नियंत्रण रखना चाहते थे। पुन: निम्न कही जाने वाली जातियों को ऊपर उठाने के गुरु गोविन्द सिंह के प्रयासों से, परम्परागत जाति-अभिमानी ये राजा रुष्ट हो गये थे और ऐसी स्थिति में उन्होंने गुरुजी के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया।

सिख इतिहास के अनुसार कलिहूर के राजा भीमचन्द (जिसके क्षेत्र में, गुरु गोविन्द सिंह अपने शक्ति केन्द्र आनन्दपुर की स्थापना कर रहे थे।) के पुत्र अजमेरचन्द का विवाह गढ़वाल के राजा फतेशाह की पुत्री से निश्चित हुआ था। गुरु गोविन्द सिंहजी इस समय पांवटा नामक स्थान पर थे। इस विवाह के अवसर पर अनेक पहाड़ी राजा ससैन्य उपस्थित हुए। योजना थी कि विवाह के बाद गुरु गोविन्द सिंहजी पर आक्रमण किया जाये। गुरुजी को इस योजना की जानकारी जैसे ही हुई, उन्होंने पांवटा से 6 मील के अंतर पर, युद्ध की दृष्टि से उपयुक्त स्थान भंगाणी में मोर्चे बांध लिये। इस युद्ध में गुरु गोविन्द सिंहजी ने स्वयं नेतृत्व किया। 

पहाड़ी राजाओं की सेना भाग गई और विजय प्राप्त कर गुरु गोविन्द सिंह आनन्दपुर लौट गये। अप्रैल सन् 1689 में यह गुरुजी के जीवन का प्रथम युद्ध था। इसके बाद उन्होंने लोहगढ़, आनन्दगढ़, केशगढ़ और फतेहगढ़ दुर्ग बनवाये। 

पराजित राजाओं ने गुरु गोविन्द सिंह से संधि कर ली और उनका साथ देना स्वीकार किया। उन्होंने औरंगजेब को कर देना रोक दिया। इस पर मुगल सेना ने आक्रमण कर दिया पर गुरु गोविन्द सिंहजी की सहायता से इस आक्रमणकारी सेना को उन्होंने परास्त कर दिया। पर राजाओं ने पुन: कमजोरी दिखाकर, मुगलों से संधि की तैयारी की। औरंगजेब के निर्देश पर लाहौर के सूबेदार दिलावरखान की सेना उनके पुत्र रुस्तमखान के नेतृत्व में गुरु गोविन्द सिंह पर आक्रमण हेतु बढ़ी। दोनों ओर से युद्ध की तैयारी हुई, पर इसी बीच नदी में भारी बाढ़ आ जाने से, मुगल सेना को परेशान होकर लौटना पड़ा। इसके बाद हुसैन खां नामक सेनापति राजाओं को लूटने लगा। गुरु गोविन्द सिंह की सेना ने हुसैन खां को भी पराजित किया। औरंगजेब इस समय दक्षिण में था। पंजाब के समाचार उसे चिन्तित करने लगे। उसने अपने पुत्र मुअज्जम को भेजा। मुगल सेना ने पहाड़ी राजाओं को बुरी तरह कुचल डाला परंतु आनन्दपुर फिर भी सुरक्षित रहा। 

गुरु गोविन्द सिंहजी यह जानते थे कि मुगल सत्ता से संघर्ष टल नहीं सकता। अत: वे अपनी स्थिति दृढ़ करने में लग गये। 

भारत में फैली दहशत कमजोर दिली और जनता का हारा हुआ मनोबल देखकर गुरुजी ने कहा – ‘‘मैं एक ऐसे पंथ का सृजन करूँगा जो सारे विश्व में विलक्षण होगा। मैं ऐसे नये पंथ का सृजन करूँगा जिससे कि मेरे शिष्य संसार के हजारों-लाखों लोगों में भी पहली नजर में ही पहचाने जा सकें। जैसे हिरनों के झुंड में शेर और बगुलों के झुंड में हंस। वह केवल बाहर से अलग न दिखे बल्कि आंतरिक रूप में भी ऊँचे और सच्चे विचारों वाला हो।

इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर गुरु गोविन्द सिंहजी ने सन् 1699 की बैसाखी वाले दिन जो दृश्य आनंदपुर साहिब की धरती पर दिखाया, उसका अंदाजा कोई भी नहीं लगा सकता था। अपने आदर्शों और सिद्धांतों को अंतिम और सम्पूर्ण स्वरूप देने के लिये गुरुजी ने एक बहुत बड़ा दीवान सजाया। सम्पूर्ण देश से हजारों लोग इकट्ठे हुये। चारों तरफ खुशी का वातावरण था। 

gurugobindsinghaskingforaheadऐसी होती है गुरुभक्ति !

बैसाखी का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। औरंगजेब के अत्याचारों को इस एक दिन के लिए भूलकर लोग खुशी से झूम रहे थे, नाच रहे थे, गा रहे थे। परंतु श्री गुरुगोविन्द सिंह इस पर्व के अवसर को गुरु भक्ति की परीक्षा के सुअवसर के रूप में बदल देना चाहते थे। वे जानते थे कि मुगल सत्ता से संघर्ष किये बिना भारतीय समाज स्वाभिमान से जी नहीं सकता। वे यह भी जानते थे कि शक्ति और भक्ति दोनों ही धर्म की संस्थापना के लिए परमावश्यक हैं। अत: उन्होंने बैसाखी के मेले में एक बड़ा अखाड़ा बनाया, जहाँ पर देश भर से अनेक लोग आए। गुरुगोविन्द सिंह के चेहरे का तेज और उनका प्रभावी व्यक्तित्व आज कुछ महान व्यक्तियों की शोध के लिए बड़ी तेजस्विता से प्रगट हो रहा था। उन्होंने हजारों भक्तों से आह्वान किया कि ‘आज धर्म पर संकट आया है, लाखों लोग मुगलों के अत्याचार से त्रस्त हैं, कौन ऐसा वीर है जो धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तत्पर है।’ गुरुगोविन्द सिंह के हाथों में नंगी तलवार देखकर उनके इस प्रश्न से लोग भयभीत हो गए और बहुतों को इस प्रश्न पर आश्चर्य भी हुआ। कुछ सोच रहे थे कि आज गुरुजी क्यों अपने शिष्यों को अपना बलिदान करने का आह्वान कर रहे हैं।

सम्पूर्ण जनसमुदाय स्तब्ध हो गया था। लोग एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे। गुरुजी ने पुन: प्रश्न किया कि ‘क्या इस भारतवर्ष में कोई ऐसा वीर नहीं जो धर्म के लिए अपना बलिदान दे सके।’ जब किसी ने उत्तर नहीं दिया। तब उन्होंने कहा, ‘क्या इसी दिन के लिए तुमने जन्म लिया है कि जब महान कार्य के लिए तुम्हारी आवश्यकता पड़े, तो तुम सिर झुकाये खड़े रहो। कोई है ऐसा भक्त जो धर्म-भक्ति की बलिवेदी पर अपने आप को समर्पित कर दे।’ तभी लाहौर का एक दयाराम खत्री उठा और उसने कहा, ‘‘मैं प्रस्तुत हूँ।” गुरु उसे अपने साथ कक्ष के भीतर ले गए। वहाँ पहले से कुछ बकरे बांधकर रखे गये थे। गुरु ने एक बकरे का सिर काटकर रक्तरंजित तलवार थामे पुन: सभा में प्रवेश किया। पुन: वही सवाल ! ‘एक के बलिदान से कार्य नहीं चलेगा, है कोई और जो धर्म के लिए अपने प्राण दे दे?’  इस बार दिल्ली का एक जाट ‘धर्मदास’ आगे बढ़ा। गुरु उसे भी अन्दर ले गए। पुन: बाहर आकर वही प्रश्न। इस प्रकार तीन और व्यक्ति अंदर ले जाये गये और वे थे द्वारिका का एक धोबी मोहकमचंद, जगन्नाथपुरी का रसोइया हिम्मत और बीदर का नाई साहबचन्द।

pbe065_guru_and_panj_pyareगुरु ने इन पांचों को सुन्दर वस्त्र पहनाये। उन्हें ‘पंज प्यारे’ कहकर सम्बोधित किया। उन पांचों को लेकर वे बाहर आये तो सभा स्तब्ध रह गई। बैठे हुए सभी लज्जित हुए। इन पंज प्यारों में केवल एक खत्री था। शेष चारों उस वर्ग के थे, जिन्हें निचला वर्ग कहा जाता था। गुरु ने उन्हें सर्वप्रथम दीक्षित किया और आश्चर्य – स्वयं भी उनसे दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने ‘खालसा’ को ‘गुरु’ का स्थान दिया और ‘गुरु’ को ‘खालसा’ का। गुरु ने उनके साथ बैठकर भोजन किया। उन पांचों को जो अधिकार उन्होंने दिये, उनसे अधिक कोई भी अधिकार अपने लिए नहीं रखे। जो प्रतिज्ञाएं उनसे कराईं, वे स्वयं भी की। इस प्रकार गुरुगोविन्द सिंह ने अपने पूर्व की नौ पीढ़ियों के सिख समुदाय को ‘खालसा’ में परिवर्तित किया। ईश्वर के प्रति निश्चल प्रेम ही सर्वोपरि है, अत: तीर्थ, दान, दया, तप और संयम का गुण जिसमें है, जिसके हृदय में पूर्ण ज्योति का प्रकाश है वह पवित्र व्यक्ति ही ‘खालसा’ है। ऊंच, नीच, जात-पात का भेद नष्ट कर, सबके प्रति उन्होंने समानता की दृष्टि लाने की घोषणा की। उन्होंने सभी को आज्ञा दी कि अपने नाम के साथ ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग करें। इसी समय वे स्वयं, गुरुगोविन्द राय से गुरुगोविन्द सिंह बने। 

वे पवित्र हैं

गुरु महाराज ने उन पांचों वीरों की ओर इंगित करते हुए कहा कि ये खालिस हैं यानि पवित्र हैं-

जे आरज (आर्य) तू खालिस होवे। 

हँस-हँस शीश धर्म हित खोवे।।

गुरु महाराज ने एक बड़ा कडाह मंगवाया और उसमें पानी, दूध व बताशा मिलाकर उस घोल को अपनी दुधारी तलवार से चलाया और इस अमृत को उन्होंने उन पंज प्यारों को चखाकर सिंह बनाया। फिर स्वयं उन पंज प्यारों के सामने घुटनों के बल बैठकर उन्होंने उनसे प्रार्थना कि वे उन्हें अमृत चखायें। दुनिया के इतिहास में यह बेजोड़ उदाहरण है जब गुरु ने अपने शिष्यों से दीक्षा लेकर सबकी समानता का प्रभावी उद्घोष किया हो। अमृत चखकर वे गोविन्दराय से गोविन्द सिंह बन गये। बाद में गुरु महाराज ने आह्वान किया कि जो-जो धर्म की रक्षा में अपने शीश कटाने को प्रस्तुत हों वे अमृत चखने के लिए आगे आयें और देखते-ही-देखते सिंहों की विशाल वाहिनी खड़ी हो गयी। 

उन्होंने पंच ‘क’ – ‘केश’, ‘कड़ा’, ‘कंघा’, ‘कच्छ’ और ‘कृपाल’ – धारण करने का निर्देश प्रत्येक सिख के लिये दिया। ‘समर्पण’, ‘शुचित्व’, ‘दैवभक्ति’, ‘शील’ और ‘शौर्य’ का भाव इसके पीछे था। 

‘खालसा’ निर्माण की तीव्र प्रतिक्रिया होनी ही थी। ‘पहुल’ में दीक्षित सिख जब अपने-अपने घरों को लौटे तो इस नये पंथ का प्रचार करने लगे। कहिलूर के राजा बुरी तरह घबरा गये। एक धार्मिक सम्प्रदाय को गुरु गोविन्द सिंह ने पूर्णत: राजनीतिक बना दिया था। कहिलूर के राजा ने एक पत्र लिखकर गुरुजी से कहा कि वे आनन्दपुर छोड़कर कहीं और चले जायें। पर उन्होंने साफ शब्दों में इंकार कर दिया। 

पहाड़ी राजा पुन: एकत्र हुए। बीस हजार की सेना को लेकर उन्होंने आक्रमण कर दिया। गुरु गोविन्द सिंहजी के पास केवल आठ हजार सैनिक थे। पर खालसा सेना विजयी हुई। 

इधर पहाड़ी राजाओं की बेचैनी बढ़ रही थी। वे कभी गुरु से सुलह करते, तो मौका देखकर आक्रमण भी करते। परंतु प्रत्येक युद्ध में वे पराजित ही होते रहे। 

पहाड़ी राजाओं और अपने नामी सरदारों की पराजय से औरंगजेब बहुत चिंतित हो उठा। उसने एक विशाल सेना भेजी। इस सेना में सरहिंद, लाहौर और जम्मू के सूबेदारों की सेनाएं भी सम्मिलित हुईं। 22 पहाड़ी राजा भी अपनी सेना के साथ उसमें आ मिले। गुरु गोविंद सिंहजी अपनी शक्ति के अनुसार तैयारी कर चुके थे। प्रारंभिक झड़पों में मुगल सैनिक और पहाड़ी राजा खालसा सेना के आगे टिक नहीं पाये। पर शीघ्र ही उस विशाल मुगल सेना ने आनंदपुर के चारों और कड़ा घेरा डाल दिया। आनंदपुर का बाहर से संबंध टूट गया। अनाज और पानी की भारी कमी होने लगी। भूख-प्यास से सैनिक तड़पने लगे। मुगल सेनापति कुरान और पहाड़ी राजा गीता की सौगंध के साथ सन्देश भेजने लगे कि दुर्ग छोड़ दें तो उन्हें सुरक्षित जाने दिया जायेगा। सैनिक आग्रह करने लगे तो गुरुजी ने कहा, वे जा सकते हैं परंतु लिखकर दे दें कि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध तोड़ रहे हैं। 40 सिखों ने यह ‘बे-दावा’ लिख दिया और दुर्ग छोड़कर चले गये। बाद में सिखों से सलाह कर दुर्ग का घेरा छोड़ गुरु गोविन्द सिंह अपनी माता, पत्नियों और चारों पुत्रों अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह तथा बचे हुए साथियों के साथ निकल गये।  

यह काल रात्रि 

imagesइस बात का पता चलते ही शत्रु सेना उन पर टूट पड़ी। सरसा नदी के तट पर वर्षा और शीत में ही युद्ध छिड़ गया। अजीत सिंह (19 वर्ष) और जुझार सिंह (14 वर्ष) सहित 40 सिखों को लेकर गुरु गोविन्द सिंहजी चमकौर की गढ़ी तक पहुंच गये, परंतु परिवार के शेष लोग बिछड़ गये। उनके दोनों छोटे पुत्र जोरावर सिंह और फतेह सिंह दादी गुजरी सहित किसी भांति उनके पुराने रसोईये गंगाराम के गांव पहुंचे। पर गंगाराम ने विश्वासघात कर बच्चों को सर हिंद के सूबेदार वजीर खान को सौंप दिया। वजीर खान ने उन्हें जीवित दीवार (27 दिसंबर, 1704)  में चुनवा दिया। माता गुजरी यह दु:ख सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने प्राण त्याग दिये। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र गद्दी के लिये लड़ पड़े। इसी संघर्ष में शहजादा मुअज्जम गुरु का आशीर्वाद पाने के लिये उनके पास पहुंचा। बाद में मुअज्जम बहादुरशाह के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। बहादुरशाह गुरुजी को ‘दरवेश’ (संत) के रूप में देखता था वे एक मित्र के रूप में उसकी सेना के साथ दक्षिण गये। बहादुरशाह की सेना कामबख्श (बहादुरशाह के भाई) के विद्रोह को दबाने के लिए आगे बढ़ी, परंतु गुरुजी गोदावरी के किनारे नांदेड़ में रुक गये।

बन्दा बैरागी

जब गुरुजी की भेंट उज्जैन में दाऊदपंथी गुरु नारायणदास से हुई, तब उन्होंने बताया कि नांदेड़ में एक बैरागी महन्त हैं जो अद्वितीय हैं। यह पुरुष देखने योग्य है।

उसी बैरागी माधोदास से गुरु गोविन्द सिंह की भेंट नांदेड़ में हुई। वे उसके डेरे पर गये। माधोदास उस समय डेरे में नहीं थे। गुरुजी उसकी गद्दी पर बैठ गये। कहते हैं, गुरु को अपनी गद्दी से उतारने के लिये माधोदास ने मंत्रशक्ति का प्रयोग किया फिर भी सफलता नहीं मिली। 

अंत में वह गुरु के पास जाकर बोला,

माधोदास : आप कौन हैं ?

गुरु गोविन्द सिंहजी : वही जिसे तुम जानते हो। 

माधोदास : मैं क्या जानता हूँ ?

गुरु गोविन्द सिंहजी : मैं तुम्हें अपना शिष्य बनाने आया हूँ। 

माधोदास : र्मै मानता हूँ। मैं आपका बंदा हूँ।

 ऐसा कहकर वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा और गुरुजी ने उसे सिख धर्म की दीक्षा दी एवं अमृत प्रदान कर उसे बंदा सिंह नाम दिया। 

सिख इतिहास में वह बंदा बहादुर के नाम से जाना जाता है। बाद में गुरुजी ने उसे खालसा का नेतृत्व करने पंजाब भेज दिया।

सर हिंद का नवाब वजीर खान गुरुजी और बादशाह बहादुरशाह की बढ़ती हुई मित्रता से चिंतित था। गुरुजी ने वजीर खान को सबक सिखाने के लिए ही बहादुरशाह की सहायता की थी। क्योंकि वजीर खान ने गुरु के पुत्रों की हत्या की थी। बहादुर शाह ने वजीर खान के नाम एक फरमान जारी किया कि वह प्रतिदिन तीन सौ रुपये गुरुजी को दे। वजीर खान को गुरु से अत्यंत ईर्ष्या और भय था, अत: उसने उन्हें मारने का प्रण किया। इसके लिए उसने दो पठानों को किराए पर दक्षिण में गुरुजी को मारने भेजा। वे नाँदेड़ पहुँचे और समय-समय पर गुरुजी से मिलते रहे। इस प्रकार वे गुरुजी और उनके शिष्यों के विश्वासपात्र बन गए। एक दिन उनमें से एक गुरु के विस्तार के पास जाकर बैठ गया। गुरु ने उसे प्रसाद दिया और वे सो गए। कुछ समय बाद गुरुजी का सेवक भी सो गया। तब पठान ने मौका पाकर गुरुजी की बायीं ओर तलवार से वार किया जब तक वह दूसरा वार कर पाता गुरुजी ने अपनी तलवार से उसका सिर काट डाला। फिर गुरुजी ने अपने सिखों को बुलाया। उन्होंने उस पठान के साथी को पकड़कर मार डाला। गुरुजी के घाव कुछ दिनों की दवा-मरहम से धीरे-धीरे ठीक हो गए। किन्तु एक दिन जब वे एक धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास कर रहे थे, उनका घाव फट गया और बहुत खून बहने लगा। गुरुजी समझ गए कि उनका अंत निकट है। चमकौर साहिब में उन्होंने गुरु पद खालसा को प्रदान कर दिया था। वही धार्मिक कार्यों की देखभाल करेंगे। उनके बाद कोई व्यक्ति विशेष गुरु नहीं होगा। उन्होंने पवित्र ग्रंथ के सामने पाँच पैसे और नारियल रखा और उसके तीन चक्कर लगाकर प्रणाम किया। 

फिर उन्होंने सिखों को विदाई संदेश दिया। वे बोले- “किसी व्यक्ति विशेष को मेरे बाद गुरु नहीं बनाया जाएगा – ऐसा पिताजी का आदेश था। गुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार पंथ मार्गदर्शन की आवश्यकता हो, तो गुरु ग्रंथ साहिब के पास एकत्र होकर सच्चे और पवित्र मन से मुझे याद करना। पंथ की सेवा और प्रेम करना। खालसा वस्त्रों, सिद्धातों और खालसा की पहचान की रक्षा करना।”

इसके बाद वे परलोक सिधार गए। यह 7 अक्टूबर, 1708 का दिन था। 

– लखेश्वर चंद्रवंशी 

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गुरुपुत्र फतेहसिंह, जोरावरसिंह

          भारतीय इतिहास में सिख गुरुओं के त्याग, तपस्या व बलिदान का एक महत्वपूर्ण अध्याय है । घटना उस काल की है जब भारत पर मुगल साम्राज्य था । औरंगजेब एक कट्टर मुसलमान था । इस्लाम स्वीकार कराने के लिए उसने हिन्दुओं को अनेक प्रकार के कष्ट दिये । वह सम्पूर्ण भारत को इस्लाम का अनुयायी बनाना चाहता था । अनेकों स्थानों पर मंदिरों को तोडकर मस्जिदें बनायी जा रही थीं । हिन्दुओं पर नाना प्रकार के कर लगाये गये । कोई भी हिन्दू शस्त्र धारण नहीं कर सकता था । घोडे पर सवारी करना भी हिन्दुओं के लिए वर्जित था । मुगल शासन भारतीय संस्कृति तथा धर्म को समाप्त कर देना चाहता था । गुरुगोविन्दसिंह जी के चार पुत्र थे- अजीत सिंह, जुझारसिंह, जोरावरसिंह और फतेहसिंह ।

          एक बार गुरु गोविन्दसिंह जी आनंदपुर में थे । मुगलों ने पहाडी नरेशों की सहायता से किले को चारों ओर से घेर लिया । मुगल सेना अनेक प्रयत्नों के बाद भी किले पर विजय पाने में असफल रही । हताश होकर औरंगजेब ने गुरुजी को संदेश भेजा । औरंगजेब ने कुरान की शपथ लेकर कहा कि यदि गुरुगोविन्द सिंह आनंदपुर का किला छोडकर चले जाते हैं तो उनसे युद्ध नहीं किया जायेगा । गुरुजी को औरंगजेब के कथन पर विश्वास नहीं था । फिर भी सिखों से सलाहकर गुरुजी घोडे से सिखों (सिख-सैनिकों) के साथ बाहर निकले । बाहर निकलते ही मुगल सेना ने उन पर आक्रमण कर दिया । सरसा नदी के किनारे भयंकर युद्ध हुआ । सिख सैनिक बहुत कम संख्या में थे । फिर भी उन्होंने मुगलों से डटकर मुकाबला किया और मुगल-सेना के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया । गुरुजी युद्ध करते हुए चमकौर की ओर से बढने लगे । उस समय गुरुजी के दोनों बडे पुत्र अजीतसिंह तथा जुझारसिंह उनके साथ थे । दूसरे दिन मुगलों के साथ सिखों का भयंकर युद्ध हुआ । इस युद्ध में वीरता के साथ लडते हुए १८ वर्षीय अजीतसिंह और १५ वर्षीय जुझारसिंह वीरगति को प्राप्त हुए ।

         आनंदपुर छोडते समय ही गुरुगोविन्दसिंह जी का परिवार बिखर गया था । गुरुजी के दोनों छोटे पुत्र जोरावरसिंह तथा फतेहसिंह अपनी दादी, माता गुजरी के साथ आनंदपुर छोडकर आगे बढे । जंगलों, पहाडों को पार करते हुए वे एक नगर में पहुँचे । वहाँ कम्मो नामक पानी ढोने वाले एक गरीब मजदूर ने गुरुपुत्रों व माता गुजरी की प्रेमपूर्वक सेवा की । उसी कस्बे में गंगू नामक एक ब्राम्हण, जो कि गुरु गोविन्दसिंह के पास २२ वर्षों तक रसोइए का काम करता था, किसी कार्यवश आया था । गंगू जो कि मुगलों से मिला था । धन के लालच में उसने गुरुमाता व बालकों से विश्वासघात किया । एक कमरे में बाहर से दरवाजा बंद कर उन्हें कैद कर लिया तथा मुगल सैनिकों को इसकी उसने सूचना दे दी । मुगलों ने तुरंत आकर गुरुमाता तथा गुरु पुत्रों को पकडकर कारावास में डाल दिया । कारावास में रातभर माता गुजरी बालकों को सिख गुरुओं के त्याग तथा बलिदान की कथाएं सुनाती रहीं । दोनों बालकों ने दादी को आश्वासन दिया कि वे अपने पिता के नाम को ऊँचा करेंगे और किसी भी कीमत पर अपना धर्म नहीं छोडेंगे ।
         प्रात: ही सैनिक बच्चों को लेने आ पहुँचे । निर्भीक बालक तुरन्त खडे हो गये । दोनों बालकों ने दादी के चरण स्पर्श किये। दादी ने बालकों को सफलता का आशीर्वाद दिया। बालक मस्तक ऊँचा किये सीना तानकर सिपाहियों के साथ चल पडे । लोग बालकों की कोमलता तथा साहस को देखकर उनकी प्रशंसा करने लगे । गंगू आगे-आगे चल रहा था। अनेक स्त्रियां घरों से बाहर निकलकर गंगू को कोसने लगीं । बालकों के चेहरे पर एक विशेष प्रकार का तेज था, जो नगरवासियों को बरबस अपनी ओर सहज ही आकर्षित कर लेता था। बालक निर्भीकता से नवाब वजीर खान के दरबार में पहुँचे । दीवान के सामने बालकों ने सशक्त स्वर में जय घोष किया – जो बोले सो निहाल – सत श्री आकाल । वाहि गुरुजी का खालसा – वाहि गुरुजी की फतह ।।
         दरबार में उपस्थित सभी लोग इन साहसी बालकों की ओर देखने लगे । बालकों के शरीर पर केसरी वस्त्र, पगडी तथा कृपाण सुन्दर दिख रही थी । उनका नन्हा वीरवेश तथा सुन्दर चमकता चेहरा देखकर नवाब वजीर खान ने चतुरता से कहा – ‘‘बच्चों तुम बहुत सुन्दर दिखाई दे रहे हो । हम तुम्हें नवाबों के बच्चों जैसा रखना चाहते हैं । शर्त यह है कि तुम अपना धर्म त्यागकर इस्लाम कबूलकर लो । तुम्हें हमारी शर्त मंजूर है ?”

          दोनों बालक एक साथ बोल उठे – ‘हमें अपना धर्म प्राणों से भी प्यारा है । हम, उसे अंतिम सांस तक नहीं छोड सकते ।’
          नवाब ने बालकों को फिर समझाना चाहा – ‘‘बच्चों अभी भी समय है, अपनी जिन्दगी बर्बाद मत करो । यदि तुम इस्लाम कबूल कर लोगे तो तुम्हें मुँह माँगा इनाम दिया जायेगा । हमारी शर्त मान लो और शाही जिंदगी बसर करो ।”

          बालक निर्भयता से ऊँचे स्वर में बोले- ‘हम गुरुगोविन्दसिंह के पुत्र हैं । हमारे दादा गुरु तेगबहादुरजी धर्म रक्षा के लिए कुर्बान हो गये थे । हम उन्हीं के वंशज हैं । हम अपना धर्म कभी नहीं छोडेंगे । हमें अपना धर्म प्राणों से भी प्यारा है ।’
          उसी समय दीवान सुच्चानन्द उठे और बालकों से इस प्रकार पूछने लगे । ‘अच्छा बच्चों, यह बताओ कि यदि तुम्हें छोड दिया जाये तो तुम क्या करोगे ?’
          बालक जोरावरसिंह बोले -‘‘हम सैनिक एकत्र करेंगे और आपके अत्याचारों को समाप्त करने के लिए युद्ध करेंगे ।”
          ‘यदि तुम हार गये तो ?’ – दीवान ने कहा । ‘हार हमारे जीवन में नहीं है । हम सेना के साथ उस समय तक युद्ध करते रहेंगे । जब तक अत्याचार करने वाला शासन समाप्त नहीं हो जाता या हम युद्ध में वीरगति को प्राप्त नहीं हो जाते ।’ – जोरावरसिंह ने दृढता से उत्तर दिया, साहसपूर्ण उत्तर सुनकर नवाब वजीर खान बौखला गया । दूसरी ओर दरबार में उपस्थित सभी व्यक्ति बालकों की वीरता की सराहना करने लगे । नवाब ने क्रुद्ध होकर कहा ‘‘इन शैतानों को फौरन दीवार में चुनवा दिया जाये।”
          दिल्ली के सरकारी जल्लाद शिशाल बेग तथा विशाल बेग उस समय दरबार में ही उपस्थित थे । दोनों बालकों को उनके हवाले कर दिया गया । कारीगरों ने बालकों को बीच में खडा कर दीवार बनानी आरम्भ कर दी । नगरवासी चारों ओर से उमड पडे । काजी पास ही में खडे थे । उन्होंने एक बार फिर बच्चों को इस्लाम स्वीकार करने को कहा।
बालकों ने फिर साहसपूर्ण उत्तर दिया – ‘‘हम इस्लाम स्वीकार नहीं कर सकते । संसार की कोई भी शक्ति हमें अपने धर्म से नहीं डिगा सकती ।”
          दीवार शीघ्रता से ऊंची होती जा रही थी । नगरवासी नन्हें बालकों की वीरता देखकर आश्चर्य कर रहे थे । धीरे-धीरे दीवार बालकों के कान तक ऊंची हो गयी । बडे भाई जोरावरसिंह ने अंतिम बार अपने छोटे भाई फतेहसिंह की ओर देखा । जोरावर की आंखें भर आयीं । फतेहसिंह भाई की आंखों में आंसू देखकर विचलित हो उठा ।
‘‘क्यों वीरजी, आपकी आँखों में ये आंसू ? क्या आप बलिदान से डर रहे हैं ?”
           बडे भाई जोरावरसिंह के हृदय में यह वाक्य तीर की तरह लगा । फिर भी वे खिलखिलाकर हँस दिये और फिर कहा  ‘फतेह सिंह तू बहुत भोला है । मौत से मैं नहीं डरता बल्कि मौत मुझसे डरती है । इसी कारण तो वह पहले तेरी ओर बढ रही है । मुझे दुख केवल इस बात का है कि तू मेरे पश्चात संसार में आया और मुझसे पहले तुझे बलिदान होने का अवसर मिल रहा है । भाई मैं तो अपनी हार पर पछता रहा हूँ ।” बडे भाई के वीरतापूर्ण वचन सुनकर फतेहसिंह की चिंता जाती रही ।  

          दीवार तेजी से ऊँची होती जा रही थी । उधर सूर्य अस्त होने का समय भी समीप था । राजा-मिस्त्री जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगे । दोनों बालक आँख मूंदकर अपने आराध्य का स्मरण करने लगे । धीरे-धीरे दीवार बालकों की अपूर्व धर्मनिष्ठा को देखकर अपनी कायरता को कोसने लगी । अंत में दीवार ने उन महान वीर बालकों को अपने भीतर समा लिया । कुछ समय पश्चात दीवार गिरा दी गई । दोनों वीर बालक बेहोश हो चुके थे उस अत्याचारी शासन के आदेशानुसार उन बेहोश बालकों  की हत्या कर दी गई । जब दोनों बालकों  की हत्या हुई  तब बालक जोरावरसिंह की आयु मात्र ७ वर्ष, ११ महीने तथा फतेह सिंह की आयु ५ वर्ष, १० महीने थी। विश्व के इतिहास में छोटे बालकों की इस प्रकार निर्दयतापूर्वक हत्या की कोई दूसरी मिसाल नहीं है। दूसरी ओर बालकों द्वारा दिखाया गया अपूर्व साहस संसार के किसी भी देश के इतिहास में नहीं मिलता । धन्य है गुरुगोविन्दसिंह, धन्य गुरुगद्दी परम्परा, धन्य माता गुजरी, धन्य गुरु पुत्र और धन्य है हमारी पुण्यधरा। हमारे भीतर भी ऐसी ही धर्म के प्रति निष्ठा व राष्ट्र के प्रति समर्पण हो, तो गौरवशाली भारत निर्माण का स्वप्न दूर नहीं।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी ‘लखेश’

महापराक्रमी श्री गुरु हरगोविंदसिंह जी

  5 जुलाई, 1595 में, अमृतसर में जन्मे सिक्खों के छठवें गुरु श्री हरगोविंदजी जब 11 वर्ष के थे। तब मुगल बादशाह द्वारा गुरु अर्जनदेवजी को केवल इसलिए यातनाएं दी गईं  कि उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया और धर्मांधता के समक्ष झुके नहीं एवं इस्लाम के पैगम्बर की प्रशंसा में कुछ तथ्य पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल करने से इंकार कर दिया। इन सभी हृदय विदारक घटनाओं ने बालक गुरु हरगोविंद के मन पर बहुत गहरा असर किया। उन्होंने निश्चय किया कि इन अत्याचारी और अन्यायी मुगल शासकों को सबक सिखाना ही पड़ेगा।

 पिता के बलिदान के बाद जब गुरु हरगोविंदसिंहजी को गुरु गद्दी पर आसीन होना था, तब वे कमर में दो तलवारें लटकाकर आए और उन्होंने कहा कि हृदय में भक्ति और हाथ में तलवार होनी चाहिए, तभी हम इन अत्याचारियों का मुकाबला कर इनका सिर कुचल सकते हैं। उन्होंने दोनों तलवारें प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए धारण की। वे सभी को संबोधित करते हुए यही कहते थे कि हृदय में अपने धर्म के प्रति भक्ति और उसकी रक्षार्थ हाथ में तलवार होनी चाहिए। सभी को उन्होंने शस्त्र धारण करने के लिए कहा।

गुरुजी ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए यदि तुम्हें अपने प्राणों की बलि भी देनी पड़े तो कदापि न डरें। क्योंकि धर्म की रक्षा करते हुए जो मारा जाता है वह हमेशा के लिए अमर हो जाता है। जब भी आप किसी को भेंट स्वरूप कुछ धन देते हैं तो वह न दें, उसकी बजाय घोड़ों और शस्त्रों को भेंट स्वरूप दें, क्योंकि यह भेंट महत्वपूर्ण मानी जाएगी। क्योंकि इन भेंट स्वरूप वस्तुओं से हम और अधिक ताकतवर बन शत्रुओं का विनाश कर उन्हें जड़ से मिटा पायेंगे। उनके इन शब्दों से सभी के हृदय में धर्म की रक्षार्थ एक लहर दौड़ गई। भक्ति और शक्ति का संचार होने लगा। अश्व एवं शस्त्र संग्रह और युद्ध अभ्यास नित्य प्रतिदिन होने लगे। इतना सब होने के पश्चात गुरुजी ने एक दिन पूर्व गुरुओं के परंपरागत फकीरी लिबास का त्यागकर राजसी वस्त्र धारण कर लिये।

उन्होंने अमृतसर में एक किले ‘लोहगढ़’ का निर्माण करवाया। गुरुजी ने हरिमंदिर के समक्ष एक बहुत बड़े चबूतरे का निर्माण करवाया और उस चबूतरे का नाम ‘अकाल तख्त’ रखा। गुरु हरगोविंदसिंहजी यहां पर सुबह एवं शाम को दरबार लगाने लगे। इस दरबार में धार्मिक प्रवचनों के स्थान पर वीरता के राग गाये जाते थे। इस वीर रस राग के कारण शिष्य समुदाय में निर्भयता के भाव उत्पन्न होने लगे थे। इससे गुरुजी की लोकप्रियता और शक्ति में प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही थी। जन समुदाय में वे ‘सच्चे पातशाह’ के नाम से विख्यात होने लगे। जिससे एक ही अर्थ निकलता है कि दिल्ली का बादशाह झूठा और गुरुजीही सच्चे बादशाह हैं।

धीरे-धीरे अनेक वीर युवा उनकी सेवा के लिए जुटने लगे और दोआबा तथा पटियाला, नाभा, जींद, फरीदकोट, फिरोजपुर तथा लुधियाना जिले से करीब 500 युवाओं ने गुरुजी की सेवा में आकर उनसे निवेदन किया, कि हमारे पास आपकी सेवा में भेंट करने के लिए इस शरीर रूपी जीवन के अलावा और कुछ भी शेष नहीं है। युवाओं ने गुरुजी से कहा कि वेतन के रूप में हमें आपके धर्मोपदेश व आपका आशीर्वाद चाहिए। आपके आशीर्वाद से क्रूर और अत्याचारी शासकों के विरुद्ध संघर्ष में हम अपने प्राणों तक को न्यौछावर कर देंगे, लेकिन पीछे कभी नहीं हटेंगे। युवाओं की गुरुभक्ति देख हरगोविंदसिंहजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपनी सेना में भर्ती कर लिया। उन युवाओं को एक-एक घोड़ा और शस्त्र प्रदान किये। गुरुजी ने उनमें से 52 युवाओं को अपने अंगरक्षक के रूप में अंगीकृत किया। इनमें से बिधीचन्द, पिराना, जेठा, पेरा तथा लंगाहा को एक-एक सौ घुड़सवारों का प्रमुख नियुक्त किया।

गुरुजी के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता की खबरें बादशाह जहांगीर तक पहुंच रही थीं। इन खबरों के कारण बादशाह गुरुजी के प्रति बहुत अधिक आक्रोशित हो उठा। बादशाह ने हरगोविंदजी के बढ़ते यश और प्रभाव का दमन करने के लिए कुछ योजनाएं बनाने की ओर कदम बढ़ाए और अपने दरबार के दो अधिकारियों बेग तथा वजीर खान को गुरुजी को गिरफ्तार कर लाने का आदेश दिया।

दोनों अधिकारी बादशाह का आदेश मानकर अमृतसर गुरुजी को गिरफ्तार करने के लिए पहुंचे। दोनों अधिकारी गुरुजी का सम्मान करते थे, इसलिए उन्होंने गुरुजी से प्रार्थनापूर्वक कहा कि बादशाह जहांगीर ने आपको दिल्ली बुलाया है। आप स्वयं दिल्ली चलें।

गुरुजी उनके मन की बात समझ गए थे। जब गुरुजी बादशाह के समक्ष उसके दरबार में पहुंचे तो जहांगीर ने उनके विरुद्ध आरोपों की झड़ियाँ लगा दीं। गुरुजी ने उसके आरोपों को बड़े ही शांति से सुना और बाद में उन आरोपों का खंडन भी किया। फिर दोनों (गुरुजी और बादशाह) में धर्म संबंधी बहुत-सी चर्चाएं हुईं। इन चर्चाओं के बाद बादशाह ने सभी आरोपों को वापस ले लिया। किन्तु इसके बाद भी बादशाह के दिमाग में कुछ न कुछ चल ही रहा था। बाद में बादशाह को शिकार पर जाने की सूझी। बादशाह जहांगीर को मालूम था कि गुरुजी को शिकार पर जाना बहुत पसंद है। इसलिए जहांगीर ने गुरुजी को शिकार पर चलने का निमंत्रण दिया। गुरुजी ने बादशाह का निमंत्रण स्वीकार किया और शिकार के लिए चल पड़े। जब वे शिकार पर निकले तभी एक शेर से उनका सामना हो गया। वह शेर बादशाह की तरफ ही लपका। बादशाह के साथ आए हुए सैनिकों ने शेर पर गोलियां और तीर चलाये किन्तु वे सारे तीर और गोलियां व्यर्थ ही गईं, वे सब शेर के आजू-बाजू   से निकल गए। यह सब देख बादशाह बहुत भयभीत हो गया। उसने दयापूर्ण दृष्टि से गुरुजी की ओर देखा। गुरुजी उसकी दयापूर्ण दृष्टि देख तुरंत अपने घोड़े से उतरे और अपनी तलवार और ढाल लेकर शेर के सामने आ गए और एक ही झटके में उन्होंने शेर को मार गिराया। उस वक्त बादशाह की किस्मत अच्छी थी कि उसके साथ गुरु हरगोविंदजी थे, जिन्होंने उसके प्राणों की रक्षा की, नहीं तो शेर बादशाह को मार डालता और उसके सैनिक कुछ कर भी नहीं पाते। बादशाह ने गुरुजी की वीरता अब तक सुन ही रखी थी, लेकिन अब उसने साक्षात देख भी ली। बादशाह सोचता ही रह गया कि इतनी कम उम्र में गुरुजी इतने बलशाली हैं। वह उनके वीरतापूर्ण साहस को निहारता ही रह गया।

गुरुजी में इतना बल और सामर्थ्य देख बादशाह झल्ला उठा। वह गुरुजी के प्रतिदिन बढ़ते बल और शक्ति से घबरा गया। उसने विचार किया कि और अधिक शक्ति अर्जित करने से पूर्व गुरुजी का कुछ न कुछ बंदोबस्त करना पड़ेगा।

बादशाह ने गुरुजी के पिता अर्जुनदेवजी को तो मार ही डाला था। लेकिन फिर भी उनकी (अर्जनदेवजी) हत्या से वह संतुष्ट नहीं हुआ था। उसने पिता (अर्जनदेवजी) के जुर्माने की 2  लाख की राशि अब बेटे (हरगोविंदजी) से वसूलने के आदेश अपने सैनिकों को दिये और इसी आदेश के चलते उसने गुरुजी को गिरफ्तार कर लिया एवं दूर ग्वालियर के किले में कैद कर लिया। समय को अपने पक्ष में न देखते हुए गुरुजी ने उस समय कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया। इसमें एक बड़ा कारण यह भी था कि उस समय गुरुजी की आयु मात्र चौदह वर्ष ही थी । हरगोविंद को कैद करने के बाद बादशाह को लगा कि अब उनका प्रभाव और यश कम हो जायेगा, लेकिन हुआ उसके विपरीत ही। बादशाह ने जिस किले में गुरुजी को कैद कर रखा था वहां का माहौल पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया। उस किले के चारों तरफ का वातावरण गुरुमय हो गया था। एक प्रकार से यह कह सकते हैं कि वह किला एक तीर्थस्थल के रूप में जाना जाने लगा । गुरुजी को बादशाह ने जिस किले में बंदी बनाया था, उसी किले में उसने अलग-अलग राज्यों के करीबन 52 राजाओं को भी गिरफ्तार कर रखा था। उन राजाओं को जहांगीर ने इसलिए बंदी बना रखा था, क्योंकि उन्होंने बादशाह की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। उन बंदियों की समान भावनाएं एवं उद्देश्य एक होने के कारण गुरुजी को भी उनसे मिलने का एक अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। इन सभी से मिलने के बाद गुरुजी को बादशाह से टक्कर लेने की उनकी संकल्पना को और अधिक बल मिला। किले में कैद सभी राजा गुरुजी को अपने बीच देख बहुत प्रसन्न थे। गुरुजी के ज्ञान और आध्यात्मिक जीवन से वे बहुत ही प्रभावित थे। हर रोज हरगोविंदजी की दिनचर्या प्रभु कीर्तन से ही प्रारंभ होती थी और किले में प्रात: एवं सायं हरिकीर्तन होते थे।

          हरिकीर्तन से किले का कोना-कोना गूंजता था। हर क्षण गुरु हरगोविंदजी का यश और प्रभाव बढ़ता जा रहा था। किले के अंदर तो उनके प्रति श्रद्धा थी, साथ ही साथ किले के बाहर भी पूरे समाज में उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा में वृद्धि होती जा रही थी। किले में कैद होने के कारण लोगों के जत्थे पैदल ही पंजाब से ग्वालियर उनके दर्शन की आस लेकर आते थे। लेकिन उन जत्थों को किले में प्रवेश नहीं था। किला जंगलों के बीच लगभग 300 फुट ऊँची पहाड़ियों पर बनाया गया था। किले की दीवार ही इतनी अधिक विशाल थी कि किसी को भी किले के अंदर का दृश्य दिखाई ही नहीं देता था और किले के चारों और सैनिकों का हमेशा कड़ा पहरा रहता था। गुरुजी के भक्त इस कारण उनके दर्शन तो नहीं कर पाते थे, लेकिन उसी विशाल दीवार को नमस्कार करके लौट जाते थे। उसी में वे अपने आपको धन्य समझ लेते थे। इस तरह लोगों का आना तब तक जारी रहा जब तक गुरुजी 1611 ई. में मुक्त नहीं हुए। फिर एक दिन ऐसा आया कि जब 52 कलीवाला चोला पहनकर गुरु हरगोविंदजी ने अपने साथ 52 राजाओं को भी रिहा करवाया। जब वे रिहा होकर अमृतसर गए, तो संयोगवश वह दिन दीपावली के त्यौहार का दिन था। लोगों ने गुरुजी के रिहा होने की खुशी में सभी तरफ दीपक प्रज्वलित किये और जमकर दीपावली का पर्व मनाया। लोगों को इस बात की भी प्रसन्नता थी कि अब नित्य ही उन्हें गुरुजी के दर्शन और उनके उपदेश सुनने को मिलेंगे। धीरे-धीरे समय के साथ-साथ गुरुजी ने अपनी सैनिक गतिविधियां बढ़ानी भी शुरू कर दीं।

 गुरुजी के पास करीब 800 घोड़े और बहुत अधिक संख्या में घुड़सवार भी एकत्र हो गये थे। अस्त्र-शस्त्र से लैस 60 जवान उनकी सेवा में हमेशा तत्पर रहते थे। जहांगीर की कैद से आजाद होने के बाद उन्होंने अपने आध्यात्मिक तथा राजसी प्रभुत्व को और अधिक बढ़ाया। उन्होंने बादशाहों के समान कलगी भी धारण करनी प्रारंभ कर दी। वे अपने प्रवास में पंजाब के साथ अलग-अलग प्रांतों में प्रचारार्थ गए। उन्होंने इस प्रवास के दौरान अलग-अलग जगह पर बहुत से गुरुद्वारों का निर्माण भी करवाया। बहुत से युवा भक्ति एवं शक्ति के मार्ग पर चलकर गुरुजी के संगठन से जुड़ने लगे। अमृतसर से वापसी के दौरान बिलासपुर के राजा ने हिमालय की तराई में स्थित एक भूखंड गुरुजी को भेंट किया। गुरुजी ने यहीं कीरतपुर नाम से अपने कार्य केंद्र का निर्माण करवाया। गुरुजी की पूरी जीवन-यात्रा विशेषतापूर्ण और सम्माननीय रही। उन्हें हर युद्ध में विजय ही प्राप्त हुई, पराजय की ओर उन्होंने कभी भी देखा ही नहीं। वे हमेशा सत्य का साथ देते थे और जहां अन्याय होता था उसका हमेशा दमन करते थे। जन साधारण में उनका नाम ‘सच्चा पातशाह’ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।

 उनके इसी स्वरूप को देखते हुए उनके भाई गुरुदासजी ने यह कहकर उनका वर्णन किया-

 ‘अरजन काहया पलटि कै मूरती हरगोविंद सवारी। 

दल भंजन गुर सूरमा वह जोधा बहू परोपकारी ।।’

 (इसका अर्थ यह है कि गुरु अर्जनदेवजी ने ही अपना शरीर बदलकर गुरु हरगोविंदजी के स्वरूप को संवारा। श्री हरगोविंदजी शत्रुओं के दल का विनाश करने वाले शूरवीर गुरु थे। वे एक महान योद्धा एवं प्रभावशाली परोपकारी महान महामानव थे। )   

गुरुजी ने बाद में कीरतपुर को अपना केंद्र स्थान बना लिया। अपने उत्तराधिकारी की खोज में उन्होंने हर जगह अपनी दृष्टि घुमानी प्रारंभ की तो उन्हें अपने दिवंगत पुत्र बाबा गुरदित्ताजी के छोटे पुत्र हरिरायजी उत्तराधिकारी के योग्य दिखे। सारी सिख संगत के समक्ष उन्होंने हरिरायजी को संबोधित करते हुए कहा कि बेटा अब हमारा अंतिम समय निकट आ गया है। अत: हम तुम्हें यह गुरुनानक देवजी की पवित्र गद्दी सौंपते हैं। तुम इसे ग्रहण कर सभी का नेतृत्व करो और साथ ही दुखी लोगों के दुख दूर करो और सभी को सत्य का रास्ता दिखाओ।

सन 1644 ई. में कीरतपुर में गुरु हरगोविंदजी अपनी जीवन लीला पूर्ण कर प्रभु ज्योति में समा गए। उन्होंने अपने शिष्यों को बहुत-सी ज्ञानपूर्ण बातें सिखाई। शिष्यों को नित्य भजन-पाठ के साथ-साथ धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राण तक न्यौछावर करने की शिक्षा दी। गुरुजी ने शिष्यों के जीवन में एक प्रकार से नई क्रांति ला दी। गुरुजी लोक संग्रह शास्त्र के बड़े ज्ञाता थे। उनके प्रभावी और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण सभी सम्मोहित हो जाया करता था। उनके सान्निध्य में एक विशेष प्रकार का जादू था, इस कारण जो भी उनके पास बैठता या बात करता वह उनसे प्रभावित हुए बिन न रहता। यही कारण है कि सम्पूर्ण भारतीय समाज ने उन्हें एक परोपकारी और महामानव की संज्ञा दी।

 – लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश” 

समर्थ गुरु रामदास

       प्रत्येक माता-पिता की कामना रहती है कि उसका पुत्र बडा होगा तो उसका विवाह होगा । घर खुशहाली से भर जाएगा । एक बार विवाह की चर्चा छिडने पर नारायण घर से जंगल भाग गए । उनके बडे भाई गंगाधर ने उन्हें बहुत समझाया और घर ले आए । गंगाधर को छोटे भाई की विरक्ति का पता था अतः मां को समझाते कि नारायण पर विवाह के लिए दबाव न डाले । किन्तु आखिर मां का हृदय तो मां का ही होता है । एक दिन मां नारायण को एकान्त में ले जाकर बोली – पुत्र ! मेरी हर बात मानता है या नहीं ? बालक नारायण ने कहा- मां, यदि तेरी बात नहीं मानूँगा तो किसकी बात मानूँगा । मां बोली तो अच्छा बता जब मैं विवाह की बात करती हूँ तो क्यों मना करता है ? कुछ देर नारायण ने विचार किया और बोले कि अच्छा अन्तरपट पकडने तक मैं मना नहीं करूँगा । मां समझी नारायण विवाह के लिए मान गया ।

       नारायण विवाह के लिए तैयार है ऐसा मानकर सबकी सम्मति से एक कुलीन ब्राह्मण कुल की कन्या के साथ उनका विवाह निश्चित हो गया । विवाह के दिन बारात लेकर वरपक्ष के लोग कन्या पक्ष के यहां पहुँच गए । लग्न समय में जब अन्तरपट पकडने का अवसर आया और सभी ब्राह्मण एक साथ ‘सावधान’ बोले तो नारायण सचेत होकर कहने लगे, अपना वचन पूरा हुआ और एकाएक लग्न मण्डप से उठरकर भाग गए । कुछ लोग उनके पीछे भागे भी, पर कौन हवा को पकड सकता है ? कभी समय (काल) पकडा जा सकता है ? ब्राह्मणों ने लडकी के लिए तुरन्त दूसरा वर ढूँढकर उसका विवाह कर दिया ।

       समर्थ रामदास के विषय में कहा जाता है कि वह हनुमान के अवतार थे । एक बार वे फिर रामराज्य की कल्पना को साकार करने आए थे । भविष्य पुराण में लिखा भी है –

       कृतेहु मारुता ख्याश्र्च त्रेतायां पवनात्मजः ।
        द्वापरे भीम संज्ञश्च रामदासः कलौयुगे ॥

       यानि सतयुग में हनुमान, त्रेता में पवनात्मज, द्वापर में भीम तथा कलियुग में रामदास के नाम से प्रसिद्ध होंगे ।

       भारत के दक्षिण में जब पठानों का पतन हो गया और हिन्दू राजाओं ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए, तब वे राजा बहुत से लोगों को जमीन और धन देकर अपने राज्य में बसाते थे । अनेकों लोग निजामशाही छोडकर गोदावरी के किनारे बस गए । उन लोगों में कृष्ण जी पन्त नाम के ब्राह्मण भी सन्‌ ९६२ ईस्वी में उत्तर गोदावरी के तट बीड प्रान्त में हिबरा नामक गांव में परिवार सहित रहने लगे । इनके बडे पुत्र का नाम दशरथ पन्त था । अपने पिता की सम्पत्ति लिए बिना वह हिबरा से १२ किलोमीटर दूरी पर बडगाँव में गए । यहाँ वह पुरोहित का काम करने लगे । इनके बडे पुत्र का नाम रामजी पन्त था । पिता की मृत्यु के पश्चात रामजी पन्त को ङङ्गजांब’ क्षेत्र मिला । रामजी पन्त के पुत्र सूर्याजी पन्त हुए जो प्रसिद्ध भगवद्‌भक्त तथा एक प्रबुद्ध व्यक्ति थे । इनकी पत्नी का नाम रणूबाई था । यही समर्थ रामदास के माता-पिता थे ।
       सन्‌ १६०८ ईस्वी को ठीक रामजन्म के समय रणूबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया । इस बच्चे के जन्म के पश्चात परिवार की सुख समृद्धि में वृद्धि होने लगी । बच्चे का नामकरण हुआ । नाम रखा गया नारायण जो कालान्तर में समर्थ रामदास के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

        पांच वर्ष के हो जाने के बाद नारायण का उपनयन संस्कार हो गया । उसी वर्ष पाठशाला में उन्हें भेजा गया । नारायण को जो पढाया जाता वह तुरन्त याद कर लेते । उन दिनों ब्राह्मण बालक के लिए पुरुष सूक्त, रुद्र, वैश्वदेव, ब्रह्मयज्ञ और कुछ जमा खर्च का शिक्षण यह अनिवार्य विषय थे । कोई भी बालक इनको पूरा किए बिना छूट नहीं सकता था । नारायण ने बहुत जल्दी ही यह सब काम पूरा कर लिया । उनका शब्दों का उच्चारण बहुत ही स्पष्ट और शुद्ध होता था । जब वह रुद्री जपा करते तो सारे गांव के लोग उनकी ओर एकटक देखा करते थे ।
       बाल्यकाल से ही निरोगी एवं बलिष्ठ शरीर का धनी नारायण गाँव में ङङ्गबागी’ नाम से प्रसिद्ध था । अपनी अवस्था के बालकों का वह नेतृत्व करता था । तैरना, पेडों पर चढने के खेलों को खेलना इनके स्वभाव में था । कभी-कभी खेलते-खेलते वह लडकों को छोडकर अकेले ही एकान्त में जाकर यों ही बैठ जाया करते थे ।
       एक दिन मां ने नारायण से कहा – ”ओ रे नारायण, कैसा लडका है तू ? दिन भर इधर-उधर घूमा करता है, कुछ काम नहीं करता । अरे तू पुरुष है ! पुरुष को जरा घर बाहर की चिन्ता करनी चाहिए ।” नारायण ने यह सुनकर मां से कहा- अच्छा, माँ, अब की बार देख लेना । अब से मैं चिन्तन किया करूँगा और एक दिन घर से गायब हो गए । घर के लोग चिन्तित हुए, बहुत ढूँढा । जंगल, नदी तट इत्यादि सब स्थानों पर देख लिया पर नारायण नहीं मिला । माँ तो रोने लगी । पिता घबरा गए । रात हो गई सभी चिन्ता से व्याकुल थे । मां इधर-उधर दौड रही थी पर वह करे तो क्या करे ? तभी एक घर की अंधेरी कोठरी में वह गईं तो उनका पैर किसी से टकराया । चौंककर उन्होंने पूछा- ”कौन हो ?”
       नारायण ने कहा ‘मैं हूँ माँ – क्या बात है ?’     

”क्या कर रहा है यहाँ ?”,  मां ने कहा |

”अरे तूने जो कहा था कि पुरुष को घर की चिंता करनी चाहिए ? मैं तो घर की ही नहीं विश्व की चिंता करने बैठा था ।” सूर्याजी पन्त ने जब सुना तो उन्हें विश्वास हो गया कि अपने को मिला वरदान यथार्थ है ।
       नारायण की एकान्त प्रियता बढती जा रही थी । प्रतिदिन उठकर स्नान के पश्चात बारह सौ सूर्यनमस्कार कर लेना, इसके बाद मित्रों के साथ तैरने जाना उनका नियम बन गया । तत्पश्चात एकान्त स्थान में जाकर ध्यान में बैठ जाते थे ।
उन्होंने स्वयं को अत्यन्त कठोर नियमों में बांध लिया । तेरह करोड बार ‘राम, जय राम, जय जय राम’ उन्हें बोलना था । ”त्रयोदशाक्षरी” मंत्र का इतना जप करना अपने आप में कठिन कार्य था । सूर्योदय से पूर्व उठकर दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के पश्चात गोदावरी में छाती तक पानी में खडे होकर उन्होंने साधना की । मछलियाँ काटती रहती थीं पर वे अविचलित भाव से साधना रत रहते ।
       उन्होंने दासबोध नामक अति उत्कृष्ट ग्रंथ लिखा । उस ग्रंथ में ब्रह्मसूत्र, संहिता, उपनिषद, भागवत, रामायण, गीता के वचन उद्‌धृत किए गए हैं ।
       अध्ययन के पश्चात सायं पुनः गोदावरी के तट पर जाते और शान्त चित्त से समाज चिन्तन में लग जाते । वहाँ वह घण्टों बैठते । उनके चिन्तन का विषय रहता- ”यह मेरा विशाल समाज और यह उस समाज की मातृभूमि । अत्यन्त विशाल होने के बाद भी यह मातृभूमि परवशता के चंगुल में फँसी है । हमारी संस्कृति इतनी जीर्ण क्यों हो गई है ? हमारे यहाँ किस चीज की कमी है ? क्या हम दूसरों से कम वीर हैं ? क्या अपनी संस्कृति की नींव कमजोर है ? आखिर इसका कारण क्या है ? जिसके फलस्वरूप हमारे समाज की यह दशा हुई है।” ऐसे प्रश्न और उनके निराकरण के लिए वह घण्टों विचार किया करते थे ।
       तेरह करोड जप साधना पूर्ण करने के पश्चात जब वे ध्यानवस्था में बैठे थे तो भगवान श्रीराम ने उन्हें दर्शन देकर कहा, बस अब परमार्थ साधना पूर्ण हुई । समाज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है । जाओ, उसे आतताइयों से मुक्त करवाओ ।
भगवान श्रीराम से आज्ञा लेकर नासिक छोडकर तीर्थ यात्रा को निकल गए । नर्मदा नदी पार कर वे उत्तर दिशा में जाने लगे तो रास्ते में कई दुःखद प्रसंग देखे और सुने । कहीं गाँव जलाए गए थे, कहीं किसानों के खलिहान लूट लिए गए थे, किसी गाँव की बहू-बेटियों को दुष्ट लोग उठाकर ले गए थे । किसी गाँव के सभी लोगों को बिना पारिश्रमिक दिए जबरन काम करवाया जाता था । इस प्रकार चारों तरफ मुस्लिम शासकों के सिपाहियों की मनमानी चल रही थी । जब किसी धर्मशाला या किसान की झोपडी में समर्थ रामदास जी रुकते थे, वहाँ के सैकडों लोग अपनी व्यथाकथा उनसे आकर कहते थे । वे उन्हें समझाते, ढाँढस बँधाते थे । जब वे एकान्त में बैठकर चिन्तन करते तो समाज की व्यथा देखकर अत्यन्त कष्ट होता था । समाज की इस दुर्दशा को देखकर वे अनेकों बार रोए भी । जैसे-जैसे वे उत्तर दिशा में बढते जाते उनके सम्मुख अनेक दर्दनाक चित्र उभरते जाते । जब वे अयोध्या पहुँचे तो दुःख का ठिकाना ही न रहा । प्रत्यक्ष राम जन्मभूमि में आतताइयों ने अपना कब्जा जमा लिया था । वे जब काशी पहुंचे तो वहाँ भी वही भयानक दृश्य ! विश्वनाथ महादेव जी को अपनी जगह छोडनी पडी । मथुरा-वृन्दावन में भी वही दशा । अब तो अनका हृदय अत्यन्त व्यथित हो गया । वे चिंतानिमग्न हो गए । बारह वर्ष तक पूरे भारत में वे घूमते रहे । सब जगह एक जैसा ही हाल था ।
         समर्थ रामदासजी ने विचार किया कि हमारे समाज में इतनी कायरता आ गई है । पहले तो समाज से कायरता दूर करनी होगी । इस प्रकार समर्थ रामदास स्वामी ने समाज में स्वतंत्रता के विषय में वैचारिक क्रान्ति का अलख जगाने का कार्य प्रारंभ कर दिया । जब शिवाजी को इस बात की जानकारी मिली तो वे स्वामीजी के दर्शन के लिए लालायित हो उठे । एक दिन छत्रपति शिवाजी स्वयं स्वामीजी के दर्शन के लिए निकल पडे । बडी कठिनाई के पश्चात शिवाजी को समर्थ रामदासजी के दर्शन हुए । वहीं शिवाजी ने मंत्रोपदेश लिया । अब अध्यात्म और शक्ति के योग से जनक्रांति उत्पन्न होने लगीं ।

        शिवाजी समर्थ स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे । दोनों की आयु में २२ वर्षों का अन्तर था । जब भी शिवाजी को राज्य कार्य से कुछ समय निकलता वह स्वामी जी के दर्शन के लिए आते । 

         एक बार शिवाजी एक दुर्ग को नए ढंग से बनवा रहे थे । वहाँ पर हजारों श्रमिक काम कर रहे थे । शिवाजी को कदाचित विचार आया कि, इन सबको मैं पल रहा हूँ । उसी समय चिरपरिचित पवित्र घोष हुआ ”जय जय जय रघुवीर समर्थ” ।
         मेंढक को देख स्वामीजी ने कहा कि मेरे राम की भी अनोखी लीला है । इस मेंढक को उसका दाना पानी कौन दे रहा होगा ?
शिवाजी को अपनी भूल का स्मरण हो आया ! और स्वामीजी के चरणों को पकडते हुए कहा कि मुझे क्षमा करें, मेरे अन्दर कुछ समय के लिए दम्भ आ गया था । आपकी कृपा से मेरा अहंकार दूर हो गया है ।
          एक बार शिवाजी के मन में विरक्ति उत्पन्न हो गई । उसी समय वहां स्वामी समर्थ रामदासजी ने दरवाजे पर आकर भिक्षा के लिए आवाज लगाई – ”जय जय जय रघुवीर समर्थ !” शिवाजी स्वयं भिक्षा देने आए । भिक्षापात्र में एक पर्ची डाल दी । स्वामीजी ने कहा यह क्या है भाई ? न चावल, न दाल, कागज की भी भिक्षा दी जाती है क्या ?
           स्वामीजी ने कागज निकाला और पढा । उस पर लिखा था, मेरा सब राज्य आपके चरणों में अर्पित है । कागज पढकर वे जोर से हँसे और बोले- ”मैं तुम्हारी भिक्षा स्वीकारता हूँ और अपने राज्य को सँभालने के लिए तुम्हें ही नियुक्त करता हूँ ।” यह श्री रामजी का राज्य है, ऐसा समझकर उसे ठीक ढंग से सँभालो । राज्य का ध्वज भगवा रखना । राज्य में मुनादी करवा दो कि जब कभी दो लोग मिलें तो राम राम ही कहें क्योंकि यह रामजी का राज्य है ।
           भारत में आज प्रत्येक छोटे-बडे गांव, नगर की बस्तियों और कॉलोनियों में हमें श्री हनुमानजी के मंदिर देखने को मिलते हैं । आज भी व्यक्ति एक-दूसरे से मिलते समय राम राम करते हैं । समाज में भक्ति और शक्ति का अद्‌भुत समन्वय को स्थापित करने के लिए समर्थ गुरु रामदासजी ने आश्रम व व्यायाम शाला के निर्माण की योजना बनाई और उसका क्रियान्वयन भी किया । उन्होंने १२ हजार मठों व मंदिरों की स्थापना की थी, जिसके माध्यम से स्वराज्य की स्थापना एवं उसके संचालन के लिए लोगों को प्रशिक्षित कर उन्हें सामर्थ्यशाली बनाने का कार्य चलता था । आज समाज बहुत सारी विकृतियों ने घिरा है । समाज में शक्ति और भक्ति का अभाव दिखता है । अतः समर्थ रामदासजी की इस जयंती के अवसर पर हम भी सज्जनों को सामर्थ्यशाली बनाने का कार्य करने का संकल्प लें ।
                                                                                                                       – लखेश्वर चंद्रवन्शी

राम की शक्तिपूजा


                     जब श्रीराम की सेना के सम्मुख रावण खडा था तो रावण की मायावी शक्ति के आगे राम की सेना टिक नहीं पायी । वानर सेना मारे डर के तितर-बितर भागने लगी । हजारों वानर सैनिक रावण के घातक प्रहार से मारे गये । सूर्यास्त के समय जब दोनों की सेना अपने-अपने शिविरों में लौटे, तब विजय के दंभ के कारण चलते हुए राक्षस अपने भारी पगों से पृथ्वी को कंपा रहे थे । उनके विजय हर्ष के कोलाहल से जैसे सारा आकाश गूँज रहा था । इसके विपरीत वानर-सेना के मन में घोर निराशा थी । अपनी सेना के मुख-मंडल पर व्याप्त निरुत्साह को देखकर राम का हृदय व्याकुल हो गया । उन्हें लगने लगा कि रावण की शक्ति और पराक्रम के बल के आगे अपनी सेना टिक नहीं पायेगी और सीता को रावण की कैद से छुडाना असंभव है । इस चिंता में डूबे श्रीराम के शिथिल चरण-चिन्हों को देखती वानर-सेना अपने शिविर की ओर बिखरी-सी चल रही थी । मुरझाकर झुक जानेवाले कमलों के समान मुँह लटकाये लक्ष्मण के पीछे सारी वानर-सेना चल रही थी । उनके आगे अपने माखन जैसे कोमल पग टेकते राम चल रहे थे । उनके धनुष की डोरी इस समय ढीली पड रही थी । तरकश को धारण करनेवाला कमरबंध भी एकदम ढीला-ढाला हो गया था । राम इस समय ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे किसी कठिन पर्वत पर रात्रि का अंधकार उतर आया हो ।
                    वे सब लोग चलते हुए पहाड की चोटी पर बसे अपने शिविर में पहुँचे । सुग्रीव, विभीषण, जांबवान आदि वानर; विशेष दलों के सेनापति; हनुमान, अंगद, नल, नील, गवाक्ष आदि अपनी सेनाओं को विश्राम शिविरों में लौटाकर अगली सुबह होनेवाले युद्ध के लिए विचार-विमर्श करने हेतु बडे ही मंद कदमों से अर्थात पराजय की चिंता में डूबे हुए वहाँ पहुँचे ।
                       रघुकुल भूषण श्रीराम एक श्वेत पत्थर के आसन पर बैठ गए । उसी क्षण स्वभाव से चतुर हनुमान उनके हाथ-पांव धोने के लिए स्वच्छ पानी ले आए । बाकी के सभी वीर योद्धा संध्याकालीन पूजा-पाठ आदि करने के लिए पास वाले सरोवर के किनारे चले गये । अपने संध्या-पूजा से शीघ्र निवृत्त होकर जब वे सभी वापस लौटे, तो राम की आज्ञा को तत्परता से सुनने के लिए सभी लोग उन्हें घेरकर बैठ गए । लक्ष्मण राम के पीछे बैठे थे । मित्र-भाव से विभीषण और स्वभाव से धैर्यवान, जाम्बवन्त भी उनके समीप ही बैठे थे । राम के एक तरफ सुग्रीव थे और चरण-कमलों के पास महावीर हनुमान विराजमान थे । बाकी सभी सेनानायक अपने-अपने उचित और योग्य स्थानों पर बैठकर रात के नीले कमल के विकास और शोभा को भी जीत लेनेवाले श्याम-मुख को देख रहे हैं । इधर राम के मन में हार-जीत का संशय भाव रह-रहकर उद्वेलित हो रहा था । राम का जो हृदय शत्रुओं का नाश करते समय आज-तक कभी भी थका या भयभीत नहीं हुआ था, राम का जो हृदय अकेलेपन में भी कभी विचलित नहीं हुआ था, वही इस समय रावण से युद्ध करने के लिए व्याकुल होकर भी, प्रस्तुत रह कर भी बार-बार अपनी असमर्थता और पराजय को स्वीकार कर रहा था । श्री राम के चेहरे में उमटी इस चिन्ता की रेखा को देखकर जाम्बवन्त ने इसका कारण पूछा । तब श्रीराम ने कहा, ” रावण के पास मायावी शक्ति है और युद्धकला में वह निपुण है । जिस तरह उसने हमारी सेना का संहार किया उससे तो ऐसा लगता है कि उसपर विजय प्राप्त करना असम्भव है । हमारी सेना में उसके मायावी शक्ति का कोई तोड नहीं है ।”
                          राम की बातें सुनने के बाद वृद्ध जाम्बवन्त ने राम को महाशक्ति की आराधना करने की सलाह दी और कहा कि, ” हे राम ! यदि रावण शक्ति के प्रभाव से हमें डरा सकता है तो निश्चय ही आप महाशक्ति की पूर्ण सिद्धि प्राप्त करके उसे नष्ट कर पाने में समर्थं होंगे । अतः आप भी शक्ति की नव्य कल्पना करके उसकी पूजा करो । आपके साधना की सिद्धि जब तक प्राप्त नहीं हो पाती, तब तक युद्ध करना छोड दीजिए । तब तक विशाल सेना के नेता बनकर लक्ष्मण जी सबके बीच में रहेंगे, हनुमान, अंगद, नल-नील और स्वयं मैं भी उनके साथ रहूँगा । इसके अतिरिक्त जहाँ कहीं भी हमारी सेना के लिए भय का कोई कारण उपस्थित होगा; वहाँ सुग्रीव, विभीषण आदि अन्य पहुँच कर सहायता करेंगे ।’जाम्बवन्त की सलाह सुनकर सभा खिल गई।”
                             जाम्बवन्त के परामर्शानुसार श्रीराम ने हनुमानजी को १०८ सहस्त्रदल कमल लाने का आदेश दिया । हनुमानजी ने वैसा ही किया । सारी वानर सेना देवी आराधना के लिए आवश्यक साधन जुटाने तथा उसकी व्यवस्था करने में व्यस्त हो गये । सभी के मन में माँ दुर्गा के दर्शन की अपार लालसा थी । आठ दिन प्रभु श्रीराम युद्ध के मैदान से दूर माँ भगवती की पूजा में लीन हो गए । राम द्वारा महाशक्ति की आराधना के पाँच दिन क्रम से बीत गए । उनका मन भी उसी क्रम से विभिन्न साधना-चक्रों को पार करते हुए ऊपर ही ऊपर उठता गया । प्रत्येक मंत्रोच्चार के साथ एक कमल महाशक्ति को वे अर्पित कर देते । इस प्रकार वे अपनी साधनाहित किया जानेवाला मंत्र-जाप और स्तोत्र पाठ पूरा कर रहे थे । राम की साधना का जब आठवाँ दिन आया तो ऐसा लगने लगा जैसे उन्होंने सारे ब्रम्हांड को जीत लिया । यह देखकर देवता भी स्तब्ध-से होकर रह गए। परिणामस्वरूप राम के जीवन की समस्त कठिन परिस्थितियों के परिणाम नष्ट हो करके रह गए । अब पूजा का एक ही कमल महाशक्ति को अर्पित करने के लिए बाकी रह गया था । राम का मन सहस्रार देवी दुर्गा को भी पार कर जाने के लिए निरंतर देख रहा था । रात का दूसरा पहर बीत रहा था । तभी देवी दुर्गा गुप्त रूप से वहाँ स्वयं प्रकट हो गई और उन्होंने पात्र में रखे एक शेष कमल पुष्प को उठा लिया । देवी-साधना का अंतिम जाप करते हुए, राम ने जैसे ही अंतिम नील कमल लेने के लिए अपना हाथ बढाया, उनके हाथ कुछ भी न लगा । परिणामस्वरूप उनका साधना में स्थिर मन घबराहट के कारण चंचल हो उठा । वे अपनी निर्मल आँखें खोलकर ध्यान की स्थिति त्याग वास्तविक संसार में आए और देखा कि पूजा का पात्र रिक्त पडा है। यह जाप की पूर्णता का समय था, आसन को छोडने का अर्थ साधना को भंग करना था । अतः राम के दोनों नयन निराशा के आँसुओं से एक बार फिर भर गए ।
                            अपने जीवन को धिक्कारते हुए, राम कहने लगे,- ” मेरे इस जीवन को धिक्कार है जो कि प्रत्येक कदम पर अनेक प्रकार के विरोध ही पाता आ रहा है । उन साधनों को भी धिक्कार है कि जिनकी खोज में यह जीवन सदा ही भटकता रहा। हाय जानकी ! अब साधना पूरी न हो पाने की स्थिति में प्रिय जानकी का उद्धार संभव नहीं हो सकेगा ।” इसके अतिरिक्त राम का एक और मन भी था, जो कभी थकता न था और न ही अनुत्साह का अनुभव ही किया करता था । जो न तो दीनता प्रकट करना जानता था और न विपत्तियों के आगे कभी झुकना ही जानता था । राम का वह स्थिर मन माया के समस्त आवरणों को पार कर बडी तेज गति से बुद्धि के दुर्ग तक जा पहुँचा । अर्थात्‌ इस निराशाजनक स्थिति में भी राम ने बुद्धि-बल का आश्रय नहीं छोडा था । राम की अतीत की स्मृतियाँ जाग उठीं । उनमें विशेष भाव पाकर उनका मन प्रसन्न हो गया । ‘ बस, अब यही उपाय है ‘, राम ने बादलों की गंभीर गर्जना के स्वर में स्वयं से कहा- ” मेरी माता तुझे सदा ही कमलनयन कहकर पुकारा करती थीं । इस दृष्टि से मेरी आँख के रूप में दो नीले कमल अभी भी बाकी हैं । अतः हे माँ दुर्गे ! अपनी आँख रूपी एक कमल देकर मैं अपना यह मंत्र या स्तोत्र-पाठ करता हूँ।” ऐसा कहकर राम ने अपने तरकश की तरफ देखा, जिसमें एक ब्रह्म बाण झलक रहा था । राम ने लक-लक करते उस लंबे फल वाले बाण को अपने हाथ में ले लिया । अस्त्र अर्थात्‌ बाण को बाएँ हाथ में लेकर राम ने दाएँ हाथ से अपनी दायाँ नेत्र पकडा । वे उस नयन को कमल के स्थान पर अर्पित करने के लिए तैयार हो गए । जिस समय अपना नेत्र बेंधने का राम का पक्का निश्चय हो गया, सारा ब्रह्मांड भय से काँप उठा । उसी क्षण बडी शीघ्र गति से देवी दुर्गा भी प्रकट हो गई।”
                      महाशक्ति दुर्गा ने यह कहते हुए राम का हाथ थाम लिया कि धन्य हो । धैर्यपूर्वक साधना करनेवाले राम, तुम्हारा धर्म भी धन्य-धन्य है । तब राम ने पलकें उठाकर सामने देखा- अपने परमोज्ज्वल और तेजस्वी रूप में साक्षात्‌ दुर्गा देवी खडी थीं । उनका स्वरूप साकार ज्योति के समान था । दस हाथों में अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्र सजे हुए थे । मुख पर मंद मुस्कान झिलमिला रही थी । उस मुस्कान को देखकर सारे संसार की शोभा जैसे लज्जित होकर रह जाती थी । उसके दाईं ओर लक्ष्मी और बायीं ओर युद्ध की वेश-भूषा में सजे हुए देव-सेनापति कार्तिकेय जी थे । मस्तक पर स्वयं भगवान शिव विराजमान थे । देवी के इस अद्‌भुत रूप को निहार मंद स्वरों में वंदना करते हुए राम प्रणाम करने के लिए उनके चरण-कमलों में झुक गए।
                 अपने सामने नतमस्तक राम को देखकर देवी ने आशीर्वाद और वरदान देते हुए कहा – ” हे नवीन पुरुषोत्तम राम ! निश्चय ही तुम्हारी जय होगी।” इतना कहकर वह महाशक्ति राम में विलीन हो गई । उन्हीं में अंतर्हित होकर रह गई ।
                  माँ के आशीर्वाद से ही राम की सेना में महाशक्ति का अविर्भाव हुआ और श्रीराम ने रावण का वध करके माता जानकी को उसके चंगुल से मुक्त किया । हमारे देश में प्रभु श्रीराम के इस समर्पित भक्ति के आदर्श को धारण करने वालों का अभाव दिखता है । भले ही आज माँ की पूजा में बडे-बडे देवियों की मूर्ति की स्थापना की जाती है, बडे-बडे पेंडाल लगाए जाते हैं परंतु माँ तो राम के भक्ति से ही प्रगट होती है । राम का आदर्श लिए बिना शक्ति की आराधना अधुरी है । शक्ति को धारण करने के लिए रामवत हृदय की आवश्यकता है । आइए, इस नवरात्री पर्व के इस पावन अवसर पर हम शक्ति साधना के व्रत को समाज में जागृत करने का संकल्प लें,…पर शुरुवात तो स्वयं से ही करनी होगी ।
                                                              !! जय मां शक्ति….जय श्री राम…जय हनुमान !!
                                                                                                                                                         – लखेश्वर चंद्रवंशी