जीवन एक डोर 

जीवन

उलझी हुई एक डोर है।

एक तरफ बंधन, मुक्ति दूसरी ओर है।

उलझना

उसका स्वभाव है।

असमंझस का प्रभाव है।

इस उलझी अवस्था का

क्या परिणाम है?

बनेगा या बिगड़ेगा,

इसका कुछ अनुमान है?

निश्चय ही

शुभ संकल्पों से दूरी है।

इसलिए सार्थक जीवन पर

चिन्तन जरुरी है।

संकल्प की पूर्णता में ही

जीवन की सार्थकता निहित है।

संकल्प का जो विकल्प न खोजे,

उसी के जीवन में जीत है।।

 – लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

नागपुर

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अरुणाचल में अरुण-ज्योति

Along the road from Mechuka to Along

कहीं धूप कहीं छांव, चांग घरों से सुसज्जित गांव
हृदय में अपनत्व लिए हुए, मृदुगान कंठ में लिए हुए
हरियाली से अभिभूत माँ का आंचल देखा है।
देश का ऐसा ममतामयी अरुणाचल देखा है।।

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अनेक देव, अनेक बोली, गिरि अम्बर से करे ठिठोली
स्वच्छंद हृदय उन्मुक्त मुस्कान, है उनकी बस यही पहचान
आधुनिकता के इस होड़ में, वहां के जीवन में सहजता देखा है।
ऐसा अभिषिक्त अरुणाचल देखा है।।

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गांव बूढा का आदेश, आज्ञापालन यहां विशेष
भोले-भले लोग यहां, स्नेहमय बातें करते बयां
सारा गांव मिलकर त्योहार मनाता, नृत्य गीत में भी ऐक्य दर्शाता।
ऐसा अदभुत संगठन देखा है, ऐसा रमणीक अरुणाचल देखा है।।

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संस्कृति प्रथम बाद में स्वारथ, मिलकर सभी करते परमारथ
धर्मान्तरण का यहां घोर अत्याचार, बंदूक के बल पर करते प्रचार
जीवन दुस्सार बना हुआ, हृदय रक्त से सना हुआ।
इस दुःखद परिस्थिति में भी, उन्हें निश्चल मुस्काते देखा है।
ऐसा अदभुत अरुणाचल देखा है।।
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सैंकड़ों कार्यकर्ता अपना जीवन दिए हुए, विजिगीषु वृत्ति लिए हुए।
शिक्षा, संस्कृति का फूल खिलाते, राष्ट्रप्रेम का अलख जगाते।
आतंकवाद, धर्मान्तरण और व्याप्त शिक्षा का अंधकार
इन सब चुनौतियों के उत्तर में,
फैलाएं ‘अरुण-ज्योति’ का प्रकाश।

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दें सहयोग तन मन धन से, हम सब आत्मीय जन बनकर।
राष्ट्र के इस अनुपम वृक्ष को, सींचे अमृत बूंद बनकर।।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘आप’ की जीत में हरा रंग छाया…

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‘आप’ की जीत में हरा रंग छाया है।

केजरीवाल को बधाई देने,

सारा सेकुलर दल आगे आया है।

केसरिया रंग को देखते ही,

सेकुलरवादी खीजते हैं, चिल्लाते हैं।

पर हरा रंग देख कर न जाने क्यों मुस्कुराते हैं?

केजरीवाल के विजय क्षण पर तिरंगे का केसरिया गायब रहा,

रंग केसरी स्वच्छ राजनीति के लोगों के न लायक रहा।

छोटी सी दिल्ली में भाजपा की हार

मोदी विरोधियों के मन में खूब छाया है,

पर यह भी सोचो देशबंधुओं कि,

“आप” पार्टी को जीत की बधाई देने,

पाकिस्तान, चीन और दुबई से क्यों फोन आया है?

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

हे भारत ! ये क्या हो रहा है ?

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हे भारत !

ये क्या हो रहा है ?

शक्ति के अपमान से देश रो रहा है।

संसार तुझे पूजता है

तेरी महिमामंडित इतिहास के लिए।

जगभर के दुखों को तू हर लेता है

इस विश्वास के लिए।

पर न जाने क्यों तेरे लाल

आज अपने ही देश में सुरक्षित नहीं हैं।

किसी भी अप्रिय घटना को रोकने

तेरे भाग्यविधाता उपस्थित नहीं हैं।

 

तू तो धर्मभूमि कहलाता है

फिर यहां अधर्म का राज क्यों है ?

दुराचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार से त्रस्त

तेरा ये समाज क्यों है ?

 

क्या इतने पतित हो चले हैं कि

हम किसी के आंसू भी न पोंछ पाए।

क्या इतनी भी संवेदना नहीं बची हममें कि

अपनों के हित कुछ सोच नहीं पाए।

 

आप सभी सोच रहे होंगे कि

मैं देश को बोल रहा हूं।

भाग्यविधाता श्रीकृष्ण के प्रति

अपने विश्वासों को तौल रहा हूं।

पर,

सच तो यह है कि भारत

आप हैं, मैं हूं, और प्रत्येक भारतवासी है।

अमृतस्य पुत्र कहलाते

हम ईश्वरमय अविनाशी हैं।

फिर हम सबके रहते

अनैतिकता, अपराध, अधर्म का

डंका क्यों बज रहा है ?

कर भारत तू आत्ममंथन

चहूंओर राक्षसी प्रवृत्ति का

संग्राम मच रहा है। 

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश

नागपुर

09975055437   

कटघरे में हिन्दी !!

यॉर ऑनर !
ये जो व्यक्ति मेरे सामने
कटघरे में खड़ा है।
पांच वर्षों से मेरे पीछे पड़ा है। 
जहाँ भी जाता हूँ, मेरे पीछे लग जाता है।
बार-बार, एक ही बात दोहराता है।
हिन्दी बोलना सीख जा…
नमस्ते बोलना सीख जा…
इसकी हरकतों से हम अपना सिर पीट रहे हैं।
हम तो खुद बैल हैं, यॉर ऑनर।
जो इस आधुनिकता की मजबूरी में
अंग्रेजी की गाड़ी खींच रहे हैं।
लोग कहते हैं –
अंग्रेजी सीख जाओ
इसमें बहुत फायदा है।
हिन्दी में कौन-सा कद है,
कौन-सा कायदा है ?
और ये कहता है –
 तुम बड़े बेवकूफ हो
एम.ए. कर चुके हो।
नमस्ते कहना आता नहीं
हैलो, हाय कर रहे हो।।
अब भी समय है, सुधर जाओ।
अपने अंग्रेजी के पागलपन से 
जरा बाहर आओ।
और क्या कहूँ यॉर ऑनर,
इसकी हरकतों से कॉलेज के 
मित्रों का खून खौल रहा है।
विद्यार्थियों का क्या कहें,
शिक्षकों का भी बचा-कूचा
अंग्रेजी सिंहासन डोल रहा है।
कानून इसे सख्त से सख्त सजा सुनाये। 
इस आधुनिक युग में अंग्रेजी की
परिभाषा बतलाये।
आय ऑप्जेक्शन मिलॉड,
मेरे काबिल दोस्त मेरे मुवक्किल
पर बेवजह आरोप लगा रहे हैं।
कानून क्या किसी साधु का भभूत है
हिन्दी अच्छी भाषा नहीं है
इसका इनके पास क्या सबूत है?
विश्व का हर विद्वान,
हिन्दी भाषा की उच्चता को 
अच्छे से जानता है।
जब संसार हिन्दी को जानता है
तो कानून हिन्दी को मानता है…
ऑर्डर-ऑर्डर
हिंदी के अपार समर्थक जी आप अपने
सफाई में कुछ कहेंगे ।
या इस अंग्रेज के औलाद के लगाये 
आरोपों को चुपचाप सहेंगे ।
जज साहब, 
सभी आरोपों को सुनकर 
मैं अपना मुँह खोलता हूँ ।
हिन्दी और अंग्रेजी की वर्तमान स्थिति
को बराबर तौलता हूँ।
हिन्दी भाषा भारत के लिए उज्ज्वल किताब है।
जिसमें विद्यमान 
हमारे पूर्वजों की गौरवगाथा,
वीरता और त्याग है। 
हमारे पूर्वज बड़े ही विवेकशील व बुद्धिमानी थे।
संस्कृत व हिन्दी के महाज्ञानी थे। 
हम हिन्दुस्तानी अब उन आदर्शों को भूल रहे हैं।
राष्ट्रभाषा भूलकर 
हम आत्मिक शांति ढूंढ रहे हैं।
लेकिन इस कानून की दहलीज पर मेरा एक सवाल है ?
जिसका हमारे मन में मचता रोज बवाल है।
कि, स्वदेशी कहाँ है ? जज साहब, 
आज स्वदेशी कहां है ?
अब क्या बात है कि स्वदेशीमन के लोग
कहीं पर नजर आते नहीं है ?
स्वदेशी तो बापू अपनाते थे
हम लोग अपनाते नहीं है ।।
हमारी सदियों से आदत है कि
हर मोड़ पर हम परायों को अपनाते हैं,
इसलिए हम हिन्दू सहिष्णु कहलाते हैं।
यह माना कि दूसरों को अपनाना चाहिए,
पर इसका मतलब यह तो नहीं,
कि खुद के भाई को भूल जाना चाहिए।
कई ऐसे लोग हैं जो
अंग्रेजी सीखकर केवल खुद को
बड़े होशियार समझते हैं।
हिन्दी को तुच्छ जानकर
बड़े अहंकार से जीते हैं।
मैं तो कहता हूँ कि 
तुमसे अच्छे तो वे शराबी हैं
जो रोज देशी पीते हैं,
मर-मर कर जीते हैं…
फिर ऐसा जीना भी क्या जीना है ?
इस पीने की होड़ ने ही
वास्तव में, समाज का सुख छीना है।
गर्व करना है तो अपनी  भाषा पर,
अपनी संस्कृति पर गर्व करें ।
अपने सुमधुर वाणी से सबकी पीड़ा हरें।
हिन्दी तो हमें भी आती है, पर क्या करें ?
विश्व में अंग्रेजी का ही ज्यादा चलन है।
उनको ही दुनिया करती नमन है।
जो पिछड़े हैं, जो कम होशियार हैं
उनके द्वारा ही हिन्दी बोली जाती है ।
हम विद्वान हैं, हमारा मान घट जाएगा
इसलिए हमें हिन्दी बोलने में शर्म आती है।।
ऐसी हमारी धारणा बन गई है ।
अंग्रेज हमारे देश से तो चले गए
पर मन में हमारे अपनी अंग्रेजियत जोड़ गए।
अब हमने उसे अपने दिल में बसा लिया। 
अपनी निज भाषा को दिल से भगा दिया।
हमारे कपडे, वस्तु, विचार सब कुछ विदेशी हो रहे हैं।
स्वतंत्र भारत के वासी हम फिर से गुलाम हो रहे हैं।
ये कैसा देश है जज साहब !
जहाँ अंग्रेजी हर मोड़ पर हिन्दी को अंगूठा दिखाती है। 
यहाँ दुर्वासा के श्राप से अहिल्या पत्थर हो जाती है। 
फिर राम आते हैं, अहिल्या को 
पत्थर से पुन: नारी बनते हैं। 
लेकिन इस हिन्दी रूपी अहिल्या के लिए 
अब राम नहीं है।
हमें लगता है कि, व्यवहार में हिन्दी का काम नहीं है।
आज खेल, मंत्रालय, अदालत, चर्चा, स्कूल-कॉलेज, सभा
सभी में अंग्रेजों की भाषा है।
फिर इस राष्ट्र में हिन्दी की क्या परिभाषा है ?
हमें लगता है कि हिन्दी के अस्तित्व को
नकारना हमारा अधिकार है।
तो फिर इसमें हिन्दी का कौन-सा कद है,
कौन-सा आकार है ?
ये कैसा कानून है जज साहब !
जहाँ हमारी राष्ट्रभाषा, हमारे ही कारण 
खतरे में पड़े।
और कानून एक बेकसूर हिन्दुस्तानी
को कटघरे में लाकर खड़ा करे।
केवल अपने व्यावासिक लाभ के लिए 
हिन्दी के सरलीकरण के नाम पर
आज भाषा को विकृत बना दिया गया है ।
अब हिन्दी का हिन्ग्लिशिकरण करना फैशन बन गया है।
न जाने भारत के बुद्धिजीवी पत्रकारों की बुद्धि 
कहाँ गुम गया है ?
हमारी बेबसी और दिखावेपन ने हिन्दी 
की दुर्दशा कर दी है। 
इसलिए मैं फैसला चाहता हूँ,यॉर ऑनर !
मैं फैसला चाहता हूँ…
आर्डर-आर्डर 
तमाम बातें और मौका-ए-वारदात को 
मद्देनजर रखते हुए अदालत ये फैसला सुनाती है।
रुक जाइये, यॉर ऑनर।
एक बात और सुन लीजिए !
फिर अपना फैसला दीजिए !
यदि आप अंग्रेजी के पक्ष में  
फैसला सुनाएंगे। 
तो भारत माँ को आप 
अपना कौन-सा मुँह दिखायेंगे ?
मैं ये जो भी कह रहा हूँ
ये मेरी सफाई नहीं 
राष्ट्रभाषा के अस्तित्व की कहानी है।
एक ग्लास पानी है,
मैं पीना चाहता हूँ।
बोल-बोल कर थक गया हूँ
एक बार फिर ताकत से जीना चाहता हूँ।
अंत में, मैं यही कहूँगा,यॉर ऑनर !
कि, हमारे पूर्वज हजारों वर्षों तक
हमारी भाषा और हमारी संस्कृति की रक्षा करें।
और हम कुछ ही वर्षों में विदेशी भाषा का सहारा लेकर
निज संस्कृति का ह्रास करें।
ये कैसा न्याय है ?
हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी आज इस
आधुनिक और दिखावे के युग में
खुद को कैसे संभाले ?
कानून पहले इसका हल निकाले।
जब तक इस केस का फैसला हमारे पक्ष में नहीं हो जाएगा।
जब तक समुचा भारत भाषा के प्रकाश से
आलोकित नहीं हो जाएगा।
तब तक ये ‘लखेश्वर चंद्रवन्शी’ 
आप के अदालत में बार-बार आएगा।
बार-बार आएगा… ||
बार-बार आएगा… ||
– लखेश्वर चंद्रवन्शी ‘लखेश’          

तेजस्विता

जिसके मुखमंडल पर आभा,
ललाट पर सूरज की लाली है ।
है जिसके कजरारे नैना,
जिसमें सूरा-सी प्याली है ।।

काली घटा सम केश हैं जिसके,
जहां श्रृंगार के तारे झलकते हैं ।
अधर लगे जैसे लाल गुलाब,
और पल्कें मयूर पाँख सम फबते हैं ।।

उठाये जब वह पल्कें अपनी,
तो चेहरे का तेज दुगुना हो जाता है ।
है तेज आखों में पवित्रता की,
उसे देख मन निर्मल हो जाता है ।।

दृढ़ निश्चयी है वह,
भय से दूर है उसका अडिग मन ।
हाल चाल से लगे वीरांगना,
स्वस्थ सुगठित है उसका तन ।।

लेश मात्र भी नहीं अहंकार उसमें,
निज संस्कृति की वह अर्पिता ।
अगणित गुणों से युक्त,
ऐसी है मेरी तेजस्विता ।।

– लखेश्वर चंद्रवन्शी

 

 

 

तू याद आती है…

 

सतत परिश्रम से जब मैं थक जाता हूँ |
स्वयं की उलझनों से जब ऊब जाता हूँ |
अनायास मन विकल हो उठता है |
धैर्य हृदय का जब छूटता है |
आशाओं पर जब निराशा 
अधिकार ज़माने लगती है |
आत्मविश्वास पर जब संदेह 
परदा चढ़ाने लगती है |
तब  तू मुझे याद आती है 
संवेदना बनकर मुझे जगाती है |
अकेलेपन में मेरी संगिनी बनकर 
साथ निभाती है |
तू गुरु का आशीर्वाद है 
जो प्रेरणा बनकर आती है |
तू सूर्य का प्रकाश है,
तेजस्विता बनकर जगाती हो |
सागर में समानेवाली तू ही सरिता है |
हृदय से निकालने वाली तू वास्तव में कविता है |

                                                                                               – लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’