आइए, राष्ट्र चेतना का अलख जगाएं…

youth.jpgभारत राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए क्या करना होगा? इसके लिए किस चीज की आवश्यकता है? क्या अधिक धन संग्रह करने से देश का उत्थान होगा? क्या बड़ी-बड़ी मिसाइल, शक्तिशाली बम और शस्त्रों से सज्ज सेना मात्र से देश का विकास होगा? क्या अनाथ बच्चों के लिए अधिकाधिक अनाथालय बनाने या असहाय-अभावग्रस्त वृद्धों के लिए अधिकाधिक वृद्धाश्रम बनाने से देश की समस्याओं का समाधान हो जाएगा? अथवा सभी देशवासियों को शिक्षित कर देने से देश का कल्याण हो जाएगा? अपने देश के प्रति एक देशभक्त नागरिक के मन में ऐसे अनेक प्रश्नों का उठना स्वाभाविक है, और यह अच्छी बात है। लेकिन अपने प्रश्नों का उत्तर यदि यथार्थ रूप में नहीं प्राप्त होता है तो मन में खिन्नता आ जाती है।

राष्ट्र के उत्थान के लिए सबसे बड़ी जिस साधन की आवश्यकता है उसका नाम है- ‘मनुष्य’। मनुष्य जब अपने परिवार, समाज, राष्ट्र व समष्टि के प्रति समर्पित होता है तो वह नैतिक आचरण से युक्त होता है। वह अच्छे-बुरे, सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म के अंतर को समझता है और जो कल्याणकारी है उसी मार्ग का चयन करता है। ऐसे ही विवेकी मनुष्यों से राष्ट्र बलवान बनता है। और जब भी ऐसे आदर्श व विवेकी मनुष्य की कमी देश में होती है तब अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम अथवा महिला सुरक्षा के लिए कड़े कानून बनाने की आवश्यकता पड़ती है। स्वामी विवेकानन्द ने भारत की प्रत्येक समस्या के समाधान के लिए गहन चिन्तन किया और उन्होंने पाया कि राष्ट्रीय चरित्र से युक्त मनुष्य से ही राष्ट्र का उत्थान हो सकता है। स्वामीजी ने जोर देकर कहा है कि “मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए! आवश्यकता है- वीर्यवान, शौर्यवान, श्रद्धासम्पन्न, दृढ़विश्वासी व निष्कपट नवयुवकों की…।”

स्वामी विवेकानन्दजी के “मनुष्य निर्माण और राष्ट्र पुनरुत्थान” के आदर्श को साध्य करने के लिए विवेकानन्द केन्द्र देशभर में अपनी कार्य प्रणाली और कार्य पद्धति के माध्यम से राष्ट्र चेतना का अलख जगा रहा है। इसलिए देशवासी इस कार्य पद्धति का अंग बनें, यह समय की आवश्यकता है। देश करवट बदल रहा है। आधुनिकता की लहर इस तरह समाज पर हावी है कि मानों उसने सबको अपने में समेट लिया है। मोबाइल, स्मार्टफोन, टैब, कम्प्यूटर, टीवी जैसे आकर्षक उपकरणों के हम आदी हो चले हैं। इन उपकरणों की उपयोगिता है और वह अपने लिए आवश्यक भी है, लेकिन जब उपकरणों के हम गुलाम हो जाते हैं तो वह हमारे लिए हानिकारक साबित होते हैं।

एक विद्यार्थी ने मुझसे कहा, “भैया! आज मैंने शतक बनाया। बारह छक्के मारा!” मैंने कहा, “वाह! क्या बात है, तुमने तो कमाल कर दिया।” तो दीदी बोली, “इसमें क्या कमाल है! इसने तो मोबाइल के क्रिकेट गेम में शतक बनाया है!”

बालक बोला, “इसमें भी तो दिमाग लगता है न!” मैंने बालक के इस कथन में हामी भरी, और फिर कहा, “भाई! जरा मैदान में भी खेला कर। मोबाइल में खेलने भर से क्या होगा?” वह हँसने लगा और कहा, “भैया! खेलने के लिए दोस्त तो चाहिए। सब अपने-अपने ट्यूशन्स-क्लासेस में बीजी रहते हैं।”

यह एक ऐसा प्रसंग है जो मजबूर करता है कि बचपन किस ओर जा रहा है। दूसरी ओर घर जितने बड़े होते जा रहे हैं आपसी सम्बन्ध उतने ही दूर होते जा रहे हैं। सब अपने काम में इतने व्यस्त हैं कि पड़ोस में रहनेवाले व्यक्ति की स्थिति का अंदाजा लगाना कठिन है। आज फेसबुक, वाट्सेप, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया में तो सबके बहुत से मित्र होते हैं, प्रत्यक्ष जीवन में मित्रों व शुभचिंतकों की कंगाली होती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बातें तो होतीं हैं पर परिवार, समाज और राष्ट्र को जोड़नेवाली ‘एकात्मता’ का आदर्श बहुत कम देखने को मिलता है। ऐसे में समाज के हर एक वर्ग को राष्ट्रीय चेतना के आयाम में जोड़ना ही होगा। विवेकानन्द केन्द्र की कार्य प्रणाली और कार्य पद्धति से यह सम्भव है।

rockmemorial.jpgकार्य प्रणाली

विवेकानन्द केन्द्र की कार्य प्रणाली के चार आयाम हैं, – लोक सम्पर्क, लोक संग्रह, लोक संस्कार तथा लोक व्यवस्था। यह एक ऐसी प्रणाली है जिसके माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों तथा आयुवालों को संगठित कर उन्हें एकात्मता के सूत्र में जोड़ा जा सकता है।

लोक सम्पर्क : समाज के प्रत्येक वर्ग से सम्पर्क करना “लोक सम्पर्क” कहलाता है। विभिन्न सम्मेलनों तथा उत्सवों के कार्यक्रम में सहभागिता के लिए सभी से सम्पर्क करना शामिल है। सम्पर्क सभी से किया जाता है, यथा- बालक-बालिका, स्त्री-पुरुष, युवा-प्रौढ़ तथा बुजुर्गों से।

लोक संग्रह : सम्पर्क किये गए सभी वर्गों में से उत्तम का चयन “लोक संग्रह” कहलाता है। इस प्रक्रिया में चयनित व्यक्ति के गुणों व क्षमताओं को समझना और उनको सतत अपने सम्पर्क में रखना। संक्षेप में कहा जाए तो सज्जनशक्ति को संग्रहित करना ही लोक संग्रह है।

लोक संस्कार : चयनित या संग्रहित उत्तम गुणों व क्षमता वाले श्रद्धावान व्यक्ति को प्रशिक्षित करना “लोक संस्कार” कहलाता है। इस दृष्टि से विवेकानन्द केन्द्र बालकों के लिए “संस्कार वर्ग प्रशिक्षण शिविर” तथा “व्यक्तित्व विकास शिविर”, युवाओं के लिए “युवा प्रेरणा शिविर”, कार्यकर्ताओं के लिए स्थानीय, प्रान्तीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर “कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर”, योग के माध्यम से समाज को संगठित करनेवाले व्यक्तियों के लिए “योग शिक्षा शिविर” तथा अध्यात्म में रूचि रखनेवालों के लिए “आध्यात्मिक शिविर” का आयोजन करता है। साथ ही शिक्षक, विद्यार्थी, नव-विवाहितों, मार्केटिंग अथवा अन्य प्रोफेशनल अधिकारियों के लिए विशेष “योग प्रतिमान” विवेकानन्द केन्द्र ने बनाया है, जिसके माध्यम से उन सभी आयुवर्ग तथा व्यावसायिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों को उनके कार्य क्षमता को बढ़ाने तथा उनमें व्याप्त राष्ट्रभाव को दृढ़ किया जाता है।

लोक व्यवस्था : प्रशिक्षित या संस्कारित व्यक्ति को विशेष “दायित्व” दिया जाता है जिसके माध्यम से वह सम्बंधित क्षेत्र में मनुष्य निर्माण का कार्य करता है।

कार्य पद्धति

विवेकानन्द केन्द्र की कार्य पद्धति के चार आयाम है- संस्कार वर्ग, योग वर्ग, स्वाध्याय वर्ग और केन्द्र वर्ग।

samskarvarga.jpgसंस्कार वर्ग : संस्कार वर्ग का संचालन करने के लिए वर्ग शिक्षक, गट प्रमुख और विस्तार प्रमुख ये तीन दायित्व वाले कार्यकर्ताओं का समावेश होता है। संस्कार वर्ग प्रति सप्ताह शनिवार/रविवार डेढ़ से दो घंटे की अवधि में होता है। जिस स्थान पर संस्कार वर्ग लगता है, वहां के प्रबुद्ध जन से सतत सम्पर्क तथा वर्ग में अपेक्षित बालक-बालिकाओं के परिवार में सम्पर्क करना होता है।

संस्कार वर्ग इतना रोचक और महत्वपूर्ण कार्य पद्धति है कि इसमें नियमित आनेवाले बच्चों के साथ ही वर्ग संचालन करनेवाले कार्यकर्ता के जीवन में अद्भुत परिवर्तन होता है। कहानी, खेल, गीत, सूर्यनमस्कार, स्तोत्र पठन आदि रोचक माध्यमों से आनंद मिलता है। आत्मविश्वास, अनुशासन, साहस, धैर्य, सामूहिकता, एकाग्रता, आपसी सहयोग, आत्मीयता जैसे व्यक्तित्व को निखारने वाले गुण विकसित होते हैं। वर्ग संचालक कोई सर या मैडम नहीं होते बल्कि दीदी या भैया होते हैं। वर्ग में समय-समय पर उत्सव मनाए जाते हैं, जिसके अंतर्गत बालक-बालिकाएं प्रसंग नाट्य, स्तोत्र पठन, सामूहिक गीत तथा कथाकथन प्रस्तुत करते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि संस्कार वर्ग बालकों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मिक विकास का शक्ति केन्द्र है।

yog-satra.jpgयोग वर्ग : योग को विवेकानन्द केन्द्र का “प्राण स्वर” कहा जाता है। विवेकानन्द केन्द्र ने योग शिविर तथा योग वर्ग के माध्यम से ही कार्यारम्भ किया था। अब देशभर में सैकड़ों स्थानों पर नियमित योग वर्ग चलता है। इसके साथ ही केन्द्र के विभिन्न शाखाओं के द्वारा समय-समय पर योग सत्र, प्राणायाम सत्र, आवर्ती ध्यान, ॐ कार ध्यान शिविर, योग शिक्षा शिविर तथा योग प्रशिक्षक शिविर का आयोजन किया जाता है। प्रार्थना शिथिलीकरण व्यायाम, सूर्यनमस्कार, आसन, प्राणायाम, चर्चा/मंथन/भजन/गीत, शान्तिमंत्र तथा केन्द्र प्रार्थना, इस तरह का क्रम होता है योग वर्ग का।

swadhyay-varga.jpgस्वाध्याय वर्ग : युवा वर्ग में चिंतन क्षमता और वैचारिक स्पष्टता को बढ़ाने के लिए विवेकानन्द केन्द्र द्वारा देशभर में स्वाध्याय वर्ग चलता है। यह वर्ग भी प्रति सप्ताह एक घंटे का होता है। किसी विशेष पुस्तक का सामूहिक अध्ययन, पढ़े गए विषय पर चर्चा, अपने विचार व्यक्त करना आदि इस प्रक्रिया का अंग है। स्वाध्याय वर्ग में नियमित आनेवाले व्यक्ति के बौद्धिक तथा वैचारिक क्षमता का विकास होता है। स्वाध्याय वर्ग में नियमित रूप से सहभागी होनेवाले युवा में एक अच्छे पत्रकार, लेखक, वक्ता आदि के गुण विकसित होते हैं। कालान्तर में वे इसे अपना करियर भी बना सकते हैं।

yogकेन्द्र वर्ग : विवेकानन्द केन्द्र की कार्य पद्धति का यह एक और विशेष आयाम है। केन्द्र वर्ग प्रति सप्ताह 1 घंटे का होता है। इस वर्ग में प्रार्थना, ऐक्य मंत्र, व्यायाम, खेल, गीत, स्वाध्याय, शांति मंत्र तथा केन्द्र प्रार्थना शामिल है। यह ऐसा वर्ग है जिसमें बाल, युवा, प्रौढ़ तथा बुजुर्ग भी शामिल हो सकते हैं।

इसके साथ ही विवेकानन्द केन्द्र केन्द्र द्वारा अनेक सेवा प्रकल्प हैं। केन्द्र द्वारा प्रकाशित साहित्य को खरीदकर, पत्र-पत्रिकाओं के सदस्य बनकर और बनाकर, सेवा प्रकल्पों के लिए आर्थिक सहयोग देकर अथवा अपने मित्रों को इस हेतु प्रेरित कर इस हम राष्ट्र कार्य में योगदान दे सकते हैं।

vivekananda-kendra-sahitya-seva.jpgविवेकानन्द केन्द्र की कार्य प्रणाली और कार्य पद्धति समाज के सभी आयु-वर्ग को जोड़ता है। अतः अपने परिवार के बालकों को संस्कार वर्ग में भेजिए। युवा हैं तो संस्कार वर्ग के संचालन के लिए अथवा स्वाध्याय वर्ग में शामिल होने के लिए आइए। विवेकानन्द केन्द्र योग वर्ग तथा केन्द्र वर्ग में सभी को सम्मिलित होने का आह्वान करता है ताकि हम सभी राष्ट्र चेतना का अंग बन सकें। आइए, विवेकानन्द केन्द्र की कार्य प्रणाली तथा कार्य पद्धति में प्रत्यक्ष सहभागी होकर ही नहीं तो दायित्व लेकर “मनुष्य निर्माण तथा राष्ट्र पुनरुत्थान” के महान ध्येय की साधना में योगदान दें।

बाट निहारती भारत माँ…

लखेश्वर चंद्रवंशी लखेश

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हमारे प्रेरणास्रोत हमारी शक्ति  

bharat-mata-picute5हम हताश, निराश और विचलित होते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि हमें इस संसार में कोई अपना दिखाई नहीं देता, और निराशा के गर्त में हम ऐसे डूबने लग जाते हैं जहां से उबरना हमारे लिए असम्भव सा हो जाता है। इस असम्भव को संभव कोई बना सकता है तो वह है- अपने अंतःकरण में विराजमान शक्ति। इस शक्ति को क्या कहें, इसके तो अनेक नाम हैं। कोई इसे आत्मा कहता है तो कोई परमात्मा, कोई ईश्वर कहता है तो कोई खुदा। पर एक बात तो निश्चित है कि अंतःकरण में कोई तो है जिसे हम विपतकाल में स्मरण करते हैं। वही हमारे प्रेरणा का स्रोत होता है, वही हमारा आदर्श भी होता है।

आजकल जब हम किसी बालक या युवा को पूछते हैं कि आपके आदर्श कौन हैं, तो सामान्यतः वे उत्तर में किसी फिल्म अभिनेता का अथवा किसी कलाकार का नाम बता देते हैं। अभिनेता आदि को अपना आइडियल बता देने का आजकल एक फैशन सा हो गया है। उन कलाकारों से युवाओं अथवा बालकों को किस तरह की प्रेरणा मिलती है, मिलती भी है या नहीं, यह एक बात है। पर हमारे आदर्श ऐसे हों, जिनसे हमें सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा मिल सके। इसलिए विवेकानन्द केन्द्र अपने उपक्रमों, प्रकल्पों और विशेषकर अपनी कार्यपद्धति- संस्कार वर्ग, योग वर्ग, स्वाध्याय वर्ग तथा केन्द्र वर्ग के माध्यम से उच्च आदर्शों को जनमानस में प्रस्थापित करने का कार्य करता हैं। बल उपासक, ज्ञान साधक, सेवाभावी, दृढ़ विश्वासी और पवित्र हृदयवाले मनुष्य का निर्माण करना ही यह इस राष्ट्र की परम्परा रही है। हमारे ऋषि-मुनियों और संतों ने मनुष्य निर्माण और मानवता की रक्षा के लिए आजीवन कार्य किया। जब-जब हमारे देश में “मनुष्य निर्माण” की परम्परा में शिथिलता आयी तब-तब हमारा समाज निष्क्रिय होता गया। समाज को स्वार्थ ने जकड़ लिया और हमारा देश विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमणों व षड्यंत्रों का शिकार हो गया।

हम जानते हैं कि विदेशी आक्रान्ताओं ने जब भी भारत पर आक्रमण किए तब उन्होंने हमारे समाज पर अमानवीय अत्याचार किए। निर्मम अत्याचारों से आहत होने के बावजूद हमारा समाज तबतक निष्क्रिय बना रहा जबतक किसी महापुरुष ने उन्हें जगाया नहीं। आचार्य चाणक्य, समर्थ रामदास, गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी विवेकानन्द आदि ऐसे प्रेरणा पुरुष हुए जिन्होंने अपने युग में अपनी नीति, योजना और आह्वानों से समाज को झकझोरा, और आक्रान्ताओं से लड़ने के लिए सामूहिक शक्ति का सूत्रपात किया। उनकी प्रेरणा आज भी नीति-नियंताओं और जवानों को शक्ति प्रदान करती है। असामाजिक तत्वों का प्रतिकार करने और समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों को दूर कर “आदर्श की स्थापना” के लिए संत कबीर, गुरु नानक, संत एकनाथ, नारायण गुरु जैसे अनगिनत संतों के कार्य उल्लेखनीय है।

अब अपनी बारी है

स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा है कि, “तुम्हें केवल पुराने ऋषियों के उपदेश को सीखने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वे ऋषि जा चुके हैं… अब तुम्हें स्वयं ऋषि बनना होगा। तुम भी उसी प्रकार मनुष्य हो, जिस प्रकार अब तक उत्पन्न हुए समस्त महापुरुष, यहां तक कि अवतार भी, मनुष्य थे।” स्वामीजी के इस कथन को हल्के में लेना ठीक नहीं होगा। स्वामीजी यहां सामान्य मनुष्य को प्रेरित कर रहे हैं कि अपने तपस्वी जीवन और उदात्त कर्मों से कोई भी मनुष्य ऋषि बन सकता है। इसलिए तपस्वी जीवन और उदात्त कर्म करने के लिए अपने समक्ष महान आदर्श अथवा प्रेरणास्रोत का होना आवश्यक है। इसलिए विवेकानन्द केन्द्र ने अपने सम्मुख पंच प्रेरणास्रोत का आदर्श रखा है- प्रणव मंत्र “ॐ”, भारतमाता, स्वामी विवेकानन्द, मा. एकनाथजी रानडे तथा केन्द्र प्रार्थना।

Om1) प्रणव मंत्र  :  हमारे शास्त्रों के अनुसार “ॐ” शब्द ब्रम्ह है और इसी से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। “ॐ” यह प्रणव मंत्र भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। यह ईश्वरीय शक्ति का भी प्रतीक है। इसलिए हमारे वैदिक मन्त्रों के प्रारंभ में “ॐ” का स्मरण किया जाता है। ॐ का उच्चारण सभी पंथों में होता है, केवल रूप अलग है। जैसे, – ईसाई और यहूदी संप्रदाय में “आमेन”, मुस्लिम मत में “आमीन”, बुद्ध धम्म में “ओं मणिपद्मे हूं” और सिख पंथ में “एक ओंकार” के रूप में होता है।

स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने एक व्याख्यान में “ॐ” के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा था, – “…ॐ हमारे सभी पंथों का प्रतीक है। यदि हिन्दुओं में कोई ऐसा सम्प्रदाय हो, जो ओंकार को न माने, तो समझ लीजिए कि वह हिन्दू कहलाने योग्य नहीं है।” स्वामीजी ने ॐ के मंदिर की कल्पना देश के सम्मुख रखी थी ताकि विभिन्न मत-सम्प्रदाय के लोग इस मंदिर में आकर सर्वमान्य ॐ के समक्ष एकात्मता के सूत्र में बंध जाएं। विवेकानन्द केन्द्र ॐ को गुरु मानता है। ईश्वर का प्रतीक यह प्रणव मंत्र हमारा प्रेरणास्रोत है। ईश्वर का कार्य ही है सज्जनों की रक्षा, सद्गुणों का संवर्धन और दुष्ट शक्तियों का विनाश। ॐ रूपी शब्द ब्रह्म के ही हम अंश होने के कारण हमारा भी दायित्व है कि हम सज्जनशक्ति का सृजन करें, उसका संवर्धन करें और दुष्ट शक्तियों की समाप्ति के लिए अपने समाज को तैयार करने में अपना योगदान दें।

bharat-mataWEBभारतमाता : हमारी दूसरी प्रेरणास्रोत है अपनी मातृभूमि भारतमाता। हमारी मातृभूमि की गोदी में भगवान ने भी अनेकों बार जन्म लिया, यहां लीलाएं की। भारतमाता ने ऋषियों, महर्षियों, महात्माओं, वीरों को जना है। वेद की रचना हमारी भूमि में हुआ है इसलिए हमारी मातृभूमि वेदभूमि है, धर्मभूमि है, वीरभूमि है, पुण्यभूमि है। यही कारण है कि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ने भारतभूमि को जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” कहकर प्रणाम किया। वहीं विष्णुपुराण में कहा गया है कि, –

गायन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद – मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।        

अर्थात देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मार्गभूत भारतभूमि के भाग में जन्में लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है –

हे शरणदायिनी देवितू करती सब का त्राण है।

हे मातृभूमि! सन्तान हमतू जननीतू प्राण है॥

ऐसी हमारी धर्मभूमि भारतमाता से प्रेरणा मिलती है कि हम अपने को इस योग्य बनाएं कि हमें भी ईश्वर का दर्शन हो सके। भारतमाता ने ज्ञान, योग, तप, कला, संस्कृति और वीरत्व को अपनी भूमि में जन्म दिया है। भारतमाता के इस महान देन को हम संवर्धित करें।

Swami-Vivekanandas-Rousing-Call-to-Hindu-Nationस्वामी विवेकानन्द : भारतमाता के महान सुपुत्र वीर संन्यासी स्वामी विवेकानन्द हम सभी के प्रेरणास्रोत हैं। स्वामीजी ने अपने ओजस्वी वचनों से भारत की महिमा को विश्वपटल पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने कोलम्बो से अल्मोड़ा तक भ्रमण करते हुए देशवासियों में राष्ट्रभक्ति का अलख जगाया। उन्होंने युवकों को राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए अर्पित हो जाने का आह्वान किया। स्वामीजी की पुकार सुनकर अनगिनत लोगों ने देश की स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनेआप को झोंक दिया। देशवासियों की पीड़ा को अपने हृदय में अनुभव करनेवाले, सुप्त समाज में चेतना का संचार करनेवाले स्वामीजी जीवनभर भारत के उत्थान के लिए अनथक प्रयत्न किए। स्वामी विवेकानन्दजी की यह भारतभक्ति हम सबकी प्रेरणा है।

माननीय एकनाथजी : विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक माननीय श्री एकनाथजी रानडे के जीवन का उद्देश्य बन गया था कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा बताए गये आदर्शों व ध्येय को साकार करना। एकनाथजी ने स्वामीजी के विचारों को समाज जीवन में चरितार्थ करने के लिए पूरा जीवन खपा दिया। एक कुशल संगठक के रूप में उनकी योजनाएं, गतिविधियां, अध्ययन, सम्पर्क और सभी प्रकार के प्रयत्न उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित था। p8कन्याकुमारी में विवेकानन्द शिलास्मारक की स्थापना के पूर्व से ही वे ‘स्वामीजी के सपनों के युवाओं’ की खोज में हमेशा लगे रहते थे। कार्यकर्ता की खोज में वे बेहद सकारात्मक दृष्टि रखते थे। वे कहते थे कि हमारी दृष्टि में अपने समाज में दो ही तरह के लोग हैं, 1) जो कार्यकर्ता हैं और 2) जो कार्यकर्ता होनेवाले हैं।

एकनाथजी का कहना था कि स्वामी विवेकानन्द पर मात्र श्रद्धा रखने से काम नहीं चलेगा, वरन स्वामीजी के द्वारा रखे गए महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना जीवन का हर क्षण न्योछावर करना होगा। वे देश के युवाओं से जब भी मिलते तो उनको आहवान करते थे कि स्वामीजी के स्वप्न के युवा बनों, राष्ट्र पुनरुत्थान के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दो। एकनाथजी के आह्वान से अनेक युवाओं ने अपना करियर, नौकरी और प्राप्त डिग्री के महत्त्व को एक ओर रखकर अपनाजीवन ‘जीवनव्रती’ के रूप में विवेकानन्द केन्द्र को समर्पित कर दिया। आज भी कार्यकर्ता एकनाथजी को अपना आदर्श मानकर स्वामी विवेकानन्दजी के बताए पथ पर चलकर राष्ट्र पुनरुत्थान के कार्य में सक्रिय हैं। ऐसे श्री एकनाथजी हमारे चौथे प्रेरणास्रोत हैं।

केन्द्र प्रार्थना : विवेकानन्द केन्द्र यह अध्यात्म प्रेरित सेवा संगठन है और केन्द्र प्रार्थना में संगठन का मूल भाव व बीजमंत्र निहित है। यह प्रार्थना केन्द्र के सभी शाखाओं में कार्यकर्ताओं द्वारा नित्य गायी जाती है। kendra prarthanaकेन्द्र संस्थापक श्री एकनाथजी के आग्रह पर नागपुर के संस्कृत विद्वान डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर ने इस प्रार्थना की रचना की थी। इस प्रार्थना में निहित भाव को समझने के लिए विवेकानन्द केन्द्र की उपाध्यक्षा मा. निवेदिता भिड़े द्वारा लिखित “ध्येय मार्ग” नामक पुस्तक का अध्ययन करना चाहिए। इस पुस्तक की प्रस्तावना में केन्द्र के अध्यक्ष मा. परमेश्वनजी ने कहा है कि केन्द्र प्रार्थना केन्द्र कार्यकर्ता के जीवन में “श्वांस” की तरह है। इसी प्रार्थना की प्रेरणा से कार्यकर्ता अपने ध्येय पथ से सतत जुड़ा रहता है।

ये पंच प्रेरणास्रोत ही वास्तव में अपने संगठन के प्रत्येक कार्यकर्ता की शक्ति है। संगठन की इस शक्ति को आइये, हम सर्वत्र प्रसारित करें।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘स्वतंत्रता’ का सन्देश देता ‘श्रीकृष्ण’ का जीवन

Krishna-birth2भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। पर स्वतंत्र होने तथा अपनों को दुःख की बेड़ियों से मुक्त करने की चाह देखिए, जन्म लेते ही माता देवकी तथा पिता वसुदेव को बेड़ियों से मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं तो नवजात शिशु कृष्ण की इच्छा से कारागार के द्वार स्वतः खुल गए। बेड़ी मुक्त होते ही कारागार से बाहर जाने का मार्ग सुलभ हो गया। पिता वसुदेव बालक कृष्ण को लेकर मथुरा से गोकुल की ओर निकल पड़े। Vasudev-Krishna

स्थिति देखिये, कारागार से मुक्त हुए पर यमुना नदी बालक कृष्ण के चरण छूने को लालायित है, पिता ने अपने पुत्र बालक कृष्ण को टोकरी में उठाकर अपने सिर पर रख लिया है। कृष्ण के चरण छूने को लालायित यमुना का जलस्तर बढ़ गया है। ऐसी स्थिति में पिता वसुदेव के लिए आगे बढ़ना कठिन हो गया। ऐसी विकट स्थिति में बालक कृष्ण ने टोकरी के बाहर अपने चरण रख दिए। दर्शन को लालायित यमुना ने कृष्ण के चरणों को छुआ और जलस्तर कम हो गया। इस समय भी कृष्ण ने यमुना को दर्शन की व्याकुलता के बंधन से और अपने पिता को यमुना के भयंकर जलस्तर के विकट परिस्थिति से मुक्त किया। वहां गोकुल पहुंचे तो अत्याचारी शासक कंस के आतंक से त्रस्त गोकुलवासियों को अपने मनोहारी अलौकिक छवि से आनंद विभोर कर दिया। कुपोषित गोधन को अपने दिव्य स्पर्श और प्रेम से पोषित कर उन्हें पुष्ट बनाया।

गोकुलवासियों को गोमाता का सारा दूध कंस के पास भेजना पड़ता था और उनके अपने बच्चे दूध से वंचित रहते। ऐसे में बालक कृष्ण ने मित्रों की टोलियां बनाईं, दूध,माखन से भरी मटकियां फोड़ीं और एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जिससे कि गोकुल का दूध तथा दुग्धजन्य पदार्थ मथुरा न जा सके। इससे गोकुल के बालकों को दूध मिलने लगा, गोकुलवासी पुष्ट होने लगे। अत्याचारी शासन के लगान से ग्रामवासियों को मुक्त करने का ऐसा था कृष्ण का अभियान।

आगे श्रीकृष्ण ने कंस के भेजे गए राक्षसों को समाप्त कर उन्हें यमपुर भेज दिया। वहीं गोकुल में जातिगत भेदभाव को मिटाने का प्रखर अभियान चलाया। सभी जातियों के बालकों को अपना मित्र बनाया, उनके साथ गइया चराने गए, सामूहिक भोजन किया। यमुना नदी को विषैला करनेवाले कालिया नाग  से युद्ध कर उसे यमुना छोड़ने के लिए बाध्य किया।

श्रीकृष्ण ने गोपियों के विरह को दूर करने के लिए उनके साथ महारास किया। हजारों गोपियों के बीच रहकर भी वे वासनामुक्त रहे, इसलिए वे योगेश्वर श्रीकृष्ण कहलाए। बाद में जब अत्याचारी कंस को समाप्त करने का निश्चय किया तो गोकुल, यशोदा मैया, पिता नन्द, मित्र-सखा ग्वाले, गोपियां सबको छोड़ा। किसी के प्रति आसक्ति नहीं रखी, कर्तव्य पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार से मोह का बंधन कृष्ण को न बांध सका। कंस का वध किया, माता देवकी, पिता वसुदेव और महाराज उग्रसेन सहित कंस के कैद में रहे जन सामान्य को कारागार से मुक्त किया। कंस को मारकर भी उन्होंने मथुरा पर राज नहीं किया, मथुरा का राज उन्होंने महाराज उग्रसेन को सौंप दिया।

उन्होंने वैभवशाली द्वारिका बसायी। दर-दर वनवास के बंधन में जकड़े पांडवों का मार्ग प्रशस्त किया। धर्मयुद्ध के दौरान पार्थ-अर्जुन को मोहपाश ने जकड़ लिया और वह अपने कर्मक्षेत्र से पलायन करना चाहता था। इस अनावश्यक विरक्ति से श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बाहर निकाला। अर्जुन के मन में उठे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया और दोनों के संवाद से श्रीमद्भगवद्गीता जैसा अलौकिक ज्ञान प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के उपदेश ने अर्जुन को कर्तव्यवान बनाया और इसके बाद पांडवों को विजय प्राप्त हुआ। हस्तिनापुर नरेश युद्धिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट बनें, वहीं गीता का ज्ञान आज संसार के लिए कर्तव्य पथ दर्शानेवाला, विकार मुक्त करने वाला तथा ईश्वर तक पहुंचने का महान ग्रन्थ है।

जन्म से ही अपने प्राण त्यागने तक जिन्होंने स्वतंत्रता से जीवन जिया ऐसे श्रीकृष्ण ने केवल धर्म के बंधन को ही स्वीकार किया। धर्म को प्राथमिकता दी, उसी को आदर्श माना। श्रीकृष्ण ने वचन दिया था कि महाभारत युद्ध में वे शस्त्र नहीं उठाएंगे, पर धर्मरक्षा के लिए उन्होंने अपने ही वचन को तोड़ा तथा शस्त्र उठाकर संसार को बता दिया कि धर्म ही सर्वोपरि है। धर्म की रक्षा के लिए व्यक्तिगत प्रण या वचन बाधक बने तो उसे तोड़ देना ही उचित है। श्रीकृष्ण जीवनभर धर्म को जिया और उन्होंने अपने महान जीवन तथा उपदेश से संसार को बताया है कि धर्म के आचरण से युक्त व्यक्ति हो स्वतंत्र हो सकता है। आज 15 अगस्त, 2017 को भारतीय स्वतंत्रता दिवस है और आज श्रीकृष्णजन्माष्टमी भी है। इस अद्भुत संयोग पर श्रीकृष्ण के जीवन व सन्देश से वास्तविक स्वतंत्रता के मर्म को समझें तथा शत्रु देशों के षड्यंत्रों पर भारत को विजय मिले यह श्रीकृष्ण चरण में प्रार्थना।
“हमें नहीं है चिन्ता अपनी, उनको चिन्ता हमारी है। हमारे जीवन रथ के सारथी, स्वयं सुदर्शन चक्रधारी है।।” 

श्रीकृष्ण प्रगट दिवस तथा भारतीय स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

– लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”

 

स्वाधीनता आन्दोलन और उसके मोल को क्या हम समझ पाए?

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(15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

स्वतंत्रता सबको प्रिय है। क्योंकि स्वतंत्रता मनुष्य का स्वभाव है। यही कारण है कि वह अपनी स्वतंत्रता के लिए छटपटाता है। हमारे देश में लगभग 1000 वर्षों तक विदेशी आक्रमण होते रहे। ग्रीक, हूण, शक, यवन और मुग़ल शासन की प्रताड़ना सहते हुए अपने सांस्कृतिक और अध्यात्मिक विरासत का जतन बड़ी सजगता के साथ हमारे पूर्वजों ने किया। तब जाकर हमारी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हो सकी। बाद में अंग्रेज आए और लगभग 200 वर्षों तक उन्होंने हमारे भारतवर्ष पर शासन किया। यह एक ऐसा शासन था जिसने वास्तव में हमारे देशवासियों के मन को गुलाम करने में सफलता पायी। देश अपना, भूमि अपनी, खेत अपने, इतिहास अपना, लोग अपने फिर भी सब पर शासन अंग्रेजों का ही चलता था। हम नहीं चाहते थे कि अपने भूमि, भवन, धर्म, संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था पर अंग्रेजों की अधीनता रहे। इसलिए तो हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, हजारों देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लाखों परिवारों इस स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। और अंततोगत्वा 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश “भारत” स्वतंत्र हुआ। पर क्या हम हमारे बलिदानी वीरों के ‘त्याग और सेवा’ प्राप्त स्वाधीनता के मोल को समझ पाए हैं, इस पर विचार होना चाहिए।

स्वतंत्रता का श्रेय केवल ‘एक’ को नहीं  

कई लोग कहते हैं कि देश को स्वतंत्रता अहिंसा से मिली, यह स्वतंत्रता महात्मा गांधी ने दिलाई। कई लोग कहते है कि अंग्रेजों ने भारत को लूटकर छोड़ दिया और हमें स्वतंत्रता मिल गई। स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के साथ युद्ध नहीं करना पड़ा। कई बुद्धिजीवी तो यहां तक कहते हैं कि अंग्रेज नहीं होते तो यहां लोकतंत्र नहीं होता और न ही देश में कोई विकास हो पाता। ये सही है कि महात्मा गांधी ने ‘स्वतंत्रता’ की इच्छा को जन मन में जगाया, उन्होंने इसे आन्दोलन का स्वरूप दिया। पर केवल अहिंसक आन्दोलन के प्रभाव से अंग्रेजों ने भारत को नहीं छोड़ा। भारत के अन्दर युवा क्रांतिकारियों के बलिदान के प्रति भारतवासियों के मन में अपार श्रद्धा थी, उनसे लाखों लोग देश के लिए मर मिटने के लिए प्रेरित हुए थे। एक तरफ सशस्त्र क्रांतिकारी, दूसरी ओर अहिंसक आन्दोलन (सत्याग्रह)। स्वतंत्रता आन्दोलन में जहां चंद्रशेखर आजाद ने क्रांतिकारियों के संगठन का नेतृत्व किया, वहीं महात्मा गांधी ने अहिंसक आन्दोलन की बागडोर सम्भाली। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने एक ओर आजाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व किया, वहीं दूसरी ओर स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने भारतीय युवाओं को सेना में शामिल होने का आह्वान किया। द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और अंग्रेजों को सैनिकों की आवश्यकता थी। अंग्रेज अपने स्वार्थ के लिए भारतीय युवाओं को सैनिक शिक्षा देने को तैयार थे। तब सावरकर ने इस अवसर का लाभ लेने के लिए युवाओं से कहा, “एकबार सैनिक शिक्षा ले लो और जब जरुरत पड़ेगी तो तय कर लेना कि बंदूक की गोली किस ओर चलाना है।” सावरकर की प्रेरणा काम कर गई और युवा भारत सैनिक प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए दौड़ पड़े। अंग्रेज डर गए कि जब सारे युवा सैनिक बन गए तो वे अंग्रेजों से लड़कर बूरी तरह समाप्त कर देंगे। अंग्रेजों का यह भय स्वाभाविक था क्योंकि लाखों युवा सैनिक प्रशिक्षण ले चुके थे।

स्वतंत्रता का श्रेय किसके नेतृत्व को है, इसको लेकर बहुत चर्चा होती है, विशेषकर सामान्य लोगों में। स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व अनेक धाराओं में स्वतंत्रता सेनानियों ने किया, लेकिन सारे देशभक्तों की प्रेरणास्रोत तो स्वामी विवेकानन्दजी के विचार ही रहे। चाहे गांधी हो या सुभाष, चाहे लोकमान्य तिलक हो या सावरकर, क्रांतिकारियों के ठिकानों पर कभी अंग्रेज छापे मारते तो उन्हें उन ठिकानों पर स्वामी विवेकानन्दजी के देशभक्ति जगानेवाले विचार की प्रतियां मिलती। यह भी एक विशेष बात है जिसका संज्ञान लेना आवश्यक है। वहीं देश के कवियों, गीतकारों और साहित्यकारों के देशभक्ति जगानेवाले साहित्यिक योगदान को भी कभी नहीं भूलाया जा सकता। लोकमान्य तिलक की पत्रकारिता और स्वतंत्रता आन्दोलन को मुखर बनाने की पहल, गांधीजी का अहिंसक आन्दोलन, सावरकर ने सेना में भर्ती होने का आह्वान किया, सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज बनाई और सशस्त्र क्रांति की मशाल तो 1857 से स्वतंत्रता तक जल ही रही थी। इसलिए केवल एक व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्ति का श्रेय देना लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, तप और बलिदान का अपमान हो होगा। लेकिन देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे यहां अंग्रेजों की चापलूसी करनेवाले लोग तब भी थे और उनका गुणगान करनेवाले लोग अब भी हैं।

स्वतंत्रता का दुरुपयोग

गुलामी मानसिकता के लोग स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान का महत्त्व न पहले समझते थे और न ही अब। इसलिए आज स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में इन्हें मजा आता है। इस श्रेणी में सामान्य मनुष्य कम ही हैं पर बड़े पदों पर बैठे लोग इस महान स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में कोई मौका नहीं छोड़ते। शिक्षा संस्थानों में शिक्षा की अव्यवस्था को देखिए, राजनीति में भ्रष्टाचार को देखिए, सिनेमा जगत में स्वैराचार को देखिए, सामाजिक क्षेत्रों में फैले जातिभेद और दुराचार को देखिए, कानून व्यवस्था में ईमानदारी की दुर्गति को देखिए, ये सारे दृश्य मानो हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का उपहास कर रहे हैं। दूसरी ओर स्वतंत्रता दिवस के उत्सव को मनाने का तरीका भी देखिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विभिन्न संस्थानों में तिरंगा फहराया जाता है। कुछ क्षण बलिदानियों को याद किया जाता है। वहीं देश की युवा पीढ़ी मोटरसाइकिल में सवार होकर, हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर डीजे की कर्कश आवाज के साथ इस उत्सव को मनमानी ढंग से सेलिब्रेट करते दिखाई देते हैं। ये ‘देशभक्ति’ भी आज की पीढ़ी के लिए बड़ी कमाल की चीज हो गई है। फेसबुक, ट्विटर और वाट्सएप प्रोफाइल या चेहरे, कपड़े अथवा ब्रेसलेट पर तिरंगा लगा लो तो आप देशभक्त बन जाते हैं। क्या यही देशभक्ति है? तिरंगा का आदर तो होना ही चाहिए क्योंकि वह हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज है। पर केवल तिरंगे का प्रोफाइल फोटो बना देने भर से क्या हमारी देशभक्ति साबित हो जाती है? क्यों क्रिकेट, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही जागती है हमारी लिमिटेड राष्ट्रभक्ति?

देशभक्ति की तीन सीढ़ियां 

‘देशभक्ति’ की परिभाषा समझने के लिए स्वामी विवेकानन्द के विचारों को समझना होगा। 09 फरवरी, 1897 को मद्रास (अब चेन्नई) के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में उन्होंने अपने भाषण में कहा था, – “लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं, और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो!

क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे ह्रदय के स्पंदन से  मिल गयी है? क्या उसने तुम्हें पागल-सा बना दिया है? क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहां तक कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है- हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!

अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई यथार्थ कर्त्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है। किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!

क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो? यदि सारी दुनिया हाथ में नंगी तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए, तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।

यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही ज़बर्दस्त शक्ति है।”

स्वामी विवेकानन्दजी के उक्त विचारों पर चिंतन करने पर हम अनुभव कर सकते हैं कि हम कितने देशभक्त हैं, हमारे हृदय में कितनी देशभक्ति है?

स्वतंत्र भारत में स्वार्थ की सियासत हावी

गुलामी मानसिकता में जीनेवाले और उसपर गर्व करनेवाले लोग सामान्य नागरिक नहीं हैं, बल्कि तथाकथित बुद्धिजीवी और नेता हैं। इसलिए अपनी सियासत के नशे में चूर ये लोग कई बार कह देते हैं कि “इससे अच्छे तो अंग्रेजों का शासन था।”  दो वर्ष पहले कथित “असहिष्णुता” के नाम पर पुरस्कार वापसी का नाटक चला था और प्रसार माध्यमों ने बढ़-चढ़कर इसमें रूचि दिखाई थी। वर्तमान शासन को अंग्रेजों के शासन से निम्न दर्जे का मानना सर्वथा अनुचित है। यदि अंग्रेजों का शासन उचित होता तो हमारे स्वतंत्रता सेनानी उनके विरूद्ध संघर्ष ही क्यों करते? यह चिंतन का विषय है।

अंग्रेजों के शासन से मुक्त भारत पर किसका शासन है? यदि यह सवाल किसी से पूछा जाए तो स्वाभाविक उत्तर होगा – मोदी सरकार का। पर यदि ऐसा पूछा जाए कि भारत के लोग किसके गुलाम हैं? तो लोग कहेंगे कि सवाल पूछनेवाला बौरा गया है क्या? स्वतंत्र भारत में भला कौन गुलाम हो सकता है?  शासन ‘प्रशासन’ से सम्बंधित है, यहां हमारी अपनी सरकार है। देश की जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाकर सरकार बनाया है और वे जी तोड़ देश के उत्थान के कार्य में लगे हैं। इसलिए हमारे देश में प्रशासनिक तौर पर निश्चित रूप से स्वतंत्रता है। हम स्वतंत्र हैं। पर गुलामी की मानसिकता अब भी हमारे देश से गई नहीं है।

आज अदालत, शिक्षा, तकनीकी, विज्ञान, कला आदि सभी क्षेत्रों में अंग्रेजों की भाषा है। सांस्कृतिक रूप से भारतीय ज्ञान की अवहेलना होती है। विश्व की प्राचीनतम भाषा ‘संस्कृत’ जो हमारे देश की भाषा है, को शालेय पाठ्यक्रम में अबतक अनिवार्य नहीं किया गया। गाय जिसे हम “गोमाता” कहते हैं, जिसपर हमारा जीवन निर्भर है। दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र मनुष्य जीवन को स्वस्थ्य और बलवान बनाते हैं। पर गौरक्षा की बात आती है तो सियासत फिर शुरू हो जाती है। सरकार द्वारा ‘गोमांस पर रोक’ लगाया जाता है तो ‘बीफ बैन’ का विरोध शुरू हो जाता है। महात्मा गांधी भगवद्गीता को “गीता माँ” कहते थे, पर जब इसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की बात होती है तो इसका भी विरोध होता है। यहां तक कि वन्दे मातरम् (राष्ट्रगीत) और जन गण मन (राष्ट्रगान) गाने की अनिवार्यता को मजहबी स्वतंत्रता का हनन करार दिया जाता है। हद तो तब हो जाती है जब कोई जन प्रतिनिधि “भारतमाता की जय” कहने में संकोच करता है।

इसलिए प्रतीत होता है कि स्वतंत्र भारत में राज चल रहा है- स्वार्थपूर्ण राजनीति का, जातिगत विद्वेष का, मजहबी कट्टरता का। जबतक स्वार्थ की राजनीति, जातिगत सियासत और मजहबी कट्टरता से देश मुक्त नहीं हो जाता, तबतक भारत ‘प्रशासनिक रूप से’ तो स्वतंत्र ही रहेगा, पर ‘मानसिक रूप से’ गुलामी की जंजीरों में जकड़ा ही रहेगा। आइए, स्वामी विवेकानन्द के बताए गए “देशभक्ति” के सिद्धांतों पर चलें और समाज के प्रति आत्मीयता को अपने हृदय में धारण कर “स्वतंत्र भारत” के गौरव को अखिल विश्व में फैलाएं।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

शक्तिशाली संघ के रहते ‘आपातकाल’ कैसे टिक सकता था?

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

25 जून, 1975 की काली रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘आपातकाल’ (Emergency) लगाकर देश को लगभग 21 माह के लिए अराजकता और अत्याचार के घोर अंधकार में धकेल दिया। 21 मार्च, 1977 तक भारतीय लोकतंत्र ‘इंदिरा निरंकुश तंत्र’ बनकर रह गया। उस समय जिन्होंने आपातकाल की यातनाओं को सहा, उनकी वेदनाओं और अनुभवों को जब हम पढ़ते हैं या सुनते हैं तो बड़ी हैरत होती है। आपातकाल के दौरान समाचार-पत्रों पर तालाबंदी, मनमानी ढंग से जिसे चाहें उसे कैद कर लेना और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देना, न्यायालयों पर नियंत्रण, ‘न वकील न दलील’ जैसी स्थिति लगभग 21 माह तक बनी रही। आज की पीढ़ी ‘आपातकाल की स्थिति’ से अनभिज्ञ है, वह ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकती। क्योंकि हम लोग जो 80 के दशक के बाद पैदा हुए, हमें ‘इंदिरा के निरंकुश शासन’ के तथ्यों से दूर रखा गया। यही कारण है कि हमारी पीढ़ी ‘आपातकाल’ की जानकारी से सरोकार नहीं रख सके।

हम तो बचपन से एक ही बात सुनते आए हैं कि इंदिरा गांधी बहुत सक्षम और सुदृढ़ प्रधानमंत्री थीं। वे बहुत गरीब हितैषी, राष्ट्रीय सुरक्षा और बल इच्छाशक्ति वाली नारी थीं। ऐसे अनेक प्रशंसा के बोल अक्सर सुनने को मिलते रहे हैं। पर आज देश में भाजपानीत ‘एनडीए’ की मोदी सरकार का शासन है। यही कारण है तथ्यों से परदा उठना शुरू हो गया है। अब पता चल रहा है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने किस तरह इंदिरा का महिमामंडन कर ‘आपातकाल’ के निरंकुश शासन के तथ्यों से देश को वंचित रखा।

आपातकाल लगाना जरुरी था या मज़बूरी?  

कांग्रेस के नेता यह दलील देते हैं कि उस समय ‘आपातकाल’ लगाना बहुत जरुरी था, इसके आभाव में शासन करना कठिन हो गया था। पर तथ्य कुछ और है? कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने भूराजस्व भी देना बंद कर दिया था। जनता ने अवैध सरकार के आदेशों की अवहेलना शुरू कर दी थी। पूरे देश में इन्दिरा सरकार इतनी अलोकप्रिय हो चुकी थी कि चारों ओर से बस एक ही आवाज़ आ रही थी – इन्दिरा गद्दी छोड़ो। इधर लोकनायक जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन अपने चरम पर था। बिहार में प्रत्येक कस्बे, तहसील, जिला और राजधानी में भी जनता सरकारों का गठन हो चुका था। जनता सरकार के प्रतिनिधियों की बात मानने के लिए ज़िला प्रशासन भी विवश था। ऐसे में इंदिरा गांधी के लिए शासन करना कठिन हो गया।

दूसरी ओर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जब इन्दिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव को अवैध ठहराने तथा उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया तो इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता से बेदखल होने का दर सताने लगा। न्यायालय के इस निर्णय के बाद नैतिकता के आधार पर इंदिरा गांधी को इस्तीफा देना चाहिए था, लेकिन सत्ता के मोह ने उन्हें जकड लिया। सभी को किसी अनहोनी की आशंका तो थी ही, लेकिन इंदिरा ऐसी निरंकुश हो जाएंगी, इसका किसी को अंदाजा नहीं था। उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया, बल्कि लोकतंत्र का गला घोंटना ही उचित समझा।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी से 25 जून, 1975 की रात को ‘आपातकाल (इमर्जेन्सी) की घोषणा कर दी और भोर होने से पूर्व ही सीपीआई को छोड़कर सभी विरोधी दलों के नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। इस अराजक कार्रवाई में न किसी की उम्र का लिहाज किया गया और न किसी के स्वास्थ्य की फ़िक्र ही की गई, बस जिसे चाहा उसे कारावास में डाल दिया गया। आपातकाल के दौरान लोकनायक जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जार्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस सहित हजारों स्वयंसेवकों को कैद कर लिया गया। देश के इन राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत अनजाने स्थान पर कैद कर रखा गया। मीसा वह काला कानून था जिसके तहत कैदी को कोर्ट में पेश करना आवश्यक नहीं था। इसमें ज़मानत का भी प्राविधान नहीं था। सरकार ने जिनपर थोड़ी रियायत की उन्हें डीआईआर (Defence of India Rule) के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह थोड़ा नरम कानून था। इसके तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया जाता था।

आपातकाल और मीडिया

उस समय शहरों को छोड़कर दूरदर्शन की सुविधा कहीं थी नहीं। समाचारों के लिए सभी को आकाशवाणी तथा समाचार पत्रों पर ही निर्भर रहना पड़ता था। 25 जून, 1975 को आकाशवाणी ने रात के अपने समाचार बुलेटिन में यह समाचार प्रसारित किया कि अनियंत्रित आन्तरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी है। बुलेटिन में कहा गया कि आपातकाल के दौरान जनता के मौलिक अधिकार स्थगित रहेंगे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। समाचार पत्र विशेष आचार संहिता का पालन करेंगे जिसके तहत प्रकाशन के पूर्व सभी समाचारों और लेखों को सरकारी सेन्सर से गुजरना होगा।

आपातकाल के दौरान 250 भारतीय पत्रकारों को बंदी बनाया गया, वहीं 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता ही रद्द कर दी गई। इंदिरा गांधी के इस तानाशाही के आगे अधिकांश पत्रकारों ने घुटने ही टेक दिए, इतना ही नहीं तो पत्रकारों ने ‘आप जैसा कहें, वैसा लिखेंगे’ की तर्ज पर काम करने को राजी हो गए। उस दौरान ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपना सम्पादकीय कॉलम कोरा प्रकाशित किया और ‘जनसत्ता’ ने प्रथम पृष्ठ पर कोई समाचार न छापकर पूरे पृष्ठ को काली स्याही से रंग कर ‘आपातकाल’ के खिलाफ अपना विरोध जताया था।

आपातकाल का उद्देश्य

– कांग्रेस विरोधी दलों को समाप्त करना।

– देश में भय का वातावरण निर्माण करना।

– प्रसार माध्यमों पर नियंत्रण रखना।

– ‘इंदिरा विरोधी शक्तियों को विदेशी शक्तियों के साथ सम्बन्ध’ की झूठी अफवाहों से जनता को भ्रमित करना, तथा इस आधार पर उन्हें कारागार में डालना।

– लोक लुभावन घोषणा देकर जनमत को अपनी ओर खींचना।

– राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समाप्त कर संगठित विरोध को पूरी तरह समाप्त करने का षड़यंत्र।

आपातकाल की समाप्ति में संघ की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने ‘आपातकाल’ के विरुद्ध देश में भूमिगत आन्दोलन, सत्याग्रह और सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए एक व्यापक योजना बनाई। संघ की प्रेरणा से चलाया गया भूमिगत आन्दोलन अहिंसक था। जिसका उद्देश्य देश में लोकतंत्र को बहाल करना था, जिसका आधार मानवीय सभ्यता की रक्षा, लोकतंत्र की विजय, पूंजीवाद व अधिनायकवाद का पराभव, गुलामी और शोषण का नाश, वैश्विक बंधुभाव जैसे उदात्त भाव समाहित था। आपातकाल के दौरान संघ ने भूमिगत संगठन और प्रचार की यंत्रणा स्थापित की, जिसके अंतर्गत सही जानकारी और समाचार गुप्त रूप से जनता तक पहुंचाने के लिए सम्पादन, प्रकाशन और वितरण की प्रभावी व्यवस्था बनाई गई। साथ ही जेलों में बंद व्यक्तियों के परिवारजनों की सहायता के लिए भी व्यवस्थाएं विकसित की। संघ ने जनता के मनोधैर्य बना रहे, इसके लिए व्यापक कार्य किया। इस दौरान आपातकाल की सही जानकारी विदेशों में प्रसारित करने की भी योजना बनाई गई, इस कार्य के लिए सुब्रह्मण्यम स्वामी, मकरंद देसाई जैसे सक्षम लोग प्रयासरत थे।

आपातकाल के विरुद्ध सत्याग्रह 

आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन आन्दोलन को सफल बनाने के लिए बहुत बहुत बड़ी भूमिका निभाई। 14 नवम्बर, 1975 से 14 जनवरी, 1976 तक पूरे देश में हजारों स्थानों पर सत्याग्रह हुए। तथ्यों के अनुसार देश में कुल 5349 स्थानों पर सत्याग्रह हुए, जिसमें 1,54,860 सत्याग्रही शामिल हुए। इन सत्याग्रहियों में 80 हजार संघ के स्वयंसेवकों का समावेश था। सत्याग्रह के दौरान कुल 44,965 संघ से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 35,310 स्वयंसेवक थे तथा 9,655 संघ प्रेरित अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं का समावेश था।

संघ ने सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए व्यापक अभियान चलाया। संघ समर्थक शक्तियों से सम्पर्क की यंत्रणा बनाई और सांकेतिक भाषा का उपयोग किया। देशभर में मनोधैर्य बनाए रखने तथा जागरूकता बहाल करने के लिए अनेक पत्रक बांटे गए। सारे देश में जन चेतना जाग्रत होने लगी। इसका ही परिणाम था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मन में जन विरोध का भय सताने लगा। अचानक तानाशाही बंद  हो गईं, गिरफ़्तारियां थम गईं। पर लोकतंत्र को कुचलने के वे काले दिन इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, पर ‘आपातकाल’ का इतिहास विद्यार्थियों तक पहुंच न सका। ऐसी आपातकाल देश में दुबारा न आए, पर पाठ्यक्रम में जरुर आना चाहिए जिससे इस पीढ़ी को जानकारी मिल सके।

राष्ट्र, राष्ट्रीयता और देशभक्ति की उदात्त संकल्पना

इन दिनों राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है। जबकि इन शब्दों के पीछे गहन चिंतन विद्यमान है। इसलिए ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग किस देश के लिए किया जाए इसपर भी चिंतन करना बहुत आवश्यक है। मीडिया, जिसकी पहुंच बड़े धनवानों से लेकर सामान्य जनता तक है, आज बहुत हद तक सत्ता परिवर्तन के लिए कारक है। मीडिया केवल खबरें नहीं दिखाती, वह समस्याओं के समाधान भी तलाशती हैं। पर कई बार सामान्य जनता को भ्रम में डालने का काम भी करती है, कभी जानबूझकर तो कभी अज्ञानता के कारण। इसलिए जब भारत राष्ट्र की बात हो तो मीडियाकर्मियों के लिए आवश्यक है कि वे अपनी भूमिका को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझें। हम लोग भारतीय हैं, एक अर्थ में “भारत” ही हैं। ऐसे में आवश्यक है कि ‘भारत का भारत से परिचय हो’।

दुनिया के सभी मत-सम्प्रदाय, यहां तक के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इस सृष्टि को कोई दैवीय शक्ति संचालित कर रही है। वह शक्ति कौन सी है, उसका स्वरूप कैसा है, इसपर ऋषियों ने बहुत अनुसंधान किये, तप किया। दैवीय शक्ति को जानने की जिज्ञासा अबतक शांत नहीं हुई और अनादि कल से यह अनुसंधान चलता आ रहा है।

राष्ट्र व देश की अवधारणा

हमारे यहां कहा जाता है कि सृष्टि यह दैवीय शक्ति से संचालित है, संसार की रचना ईश्वर ने की है। इसलिए कहा जाता है कि “देव निर्मितं देशं”। जिस भूमि विशेष का निर्धारण एक विशिष्ट सीमा तक सीमित हो, उसे देश कहते हैं। देश का एक शासक होता है, जिसके मार्गदर्शन में देश की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं। पहले उस शासक को राजा के रूप में सब जानते थे। युग बदला, और ‘राजा’ के स्थान पर प्रधानमंत्री अथवा प्रेसिडेंट रूपी शासक अस्तित्व में आया। हम कह सकते हैं कि ‘देश’ राजनीति के  आधार पर चलता है।

वहीं राष्ट्र (Nation) की अवधारणा व्यापक है। राष्ट्र किसी सीमा में नहीं बंधता, क्योंकि राष्ट्र यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मनोभाव से परिपूर्ण होता है। इसलिए कहा जाता है- “ऋषि निर्मितं राष्ट्रं”। ऋषिगण अपने तप, ज्ञान, शील और चरित्र से एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को समाज में प्रतिष्ठित करते हैं। ऋषियों के संदेश को जीवन का अंग बनाकर जीनेवाले मनुष्यों के समूह से एक आदर्श समाज की रचना होती है। आदर्श समाज वह, जहां के मनुष्य समष्टि के हित के लिए स्वयं का त्याग करने को तत्पर रहता है। उस समाज की संस्कृति आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित होती है। समाज में परस्पर सहयोग की भावना होती है, आपस में कोई विद्वेष नहीं होता। ऐसे समाज जहां भी हो वह ‘राष्ट्र’ है।

आदर्श समाज रचना की संकल्पना भारत की देन है। ईश्वर की खोज और विश्व के कल्याण के लिए अनुसंधान करनेवाले ऋषि-मुनि हमारे यहां ही हुए, इसलिए हमारे भारतवर्ष को युगों से राष्ट्र की संज्ञा दी गई है। लेकिन आज भारत राष्ट्र में आदर्श समाज के बीच में बहुत सारे रोड़े हैं। सामाजिक विषमता, भेदभाव, आपसी विद्वेष और राजनीतिक स्वार्थ ने भारत के ‘राष्ट्र गौरव’ को चोट पहुंचाने का काम किया है। स्वार्थ इतना हावी है कि अपनी जाति, राजनीति और विद्वेष के चलते भारतीय जीवन मूल्यों को समाज जीवन से मिटाने का षड्यंत्र चल रहा है। भारत के इतिहास, संस्कृति और शिक्षा को लेकर आपस में कोई सहमति दिखाई नहीं देती।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने ‘राष्ट्र’ की संकल्पना को बहुत स्पष्टता से व्यक्त किया है। वे कहते हैं, “हम ऐसे लोगों के समूह को ‘राष्ट्र’ नहीं कह सकते जो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों वाले, भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाले हों तथा जिनके इतिहास भिन्न हों, हिताहित कल्पनाएं परस्पर विरोधी हों, परस्पर शत्रुभाव मानते हों, जिनके आपसी सम्बन्ध भक्ष्य-भक्षक के रहे हों और जिनके रहने के मूल कारण भी एक से न हो।”

संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी गोलवलकर के अनुसार, “राष्ट्र सांस्कृतिक ईकाई होती है। जब किसी जनसमूह की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों, तब तक वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” वहीं अन्त्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा है, “जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक मिशन, विचार या आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” दीनदयालजी ने यह भी कहा कि, “‘राष्ट्र’ एक स्थायी सत्य है। राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए ‘राज्य’ पैदा होता है।”

इस तरह सामान इतिहासबोध, समान सांस्कृतिक जीवन, सामान विचारधारा, परस्पर मैत्रीभाव और किसी उदात्त ध्येय के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देनेवाले लोगों का समूह जिस स्थान पर हो, जिस देश में हो वह ‘राष्ट्र’ ही कहलायेगा। वहीं स्वामी विवेकानन्दजी ने राष्ट्र के ध्येय के सम्बन्ध में कहा है, “प्रत्येक राष्ट्र का लक्ष्य विधाता द्वारा निर्धारित है। प्रत्येक राष्ट्र के पास संसार को देने के लिए कोई न कोई संदेश है। प्रत्येक राष्ट्र को किसी विशेष संकल्प की पूर्ति करनी है।” स्वामीजी ने आगे कहा, “व्यक्ति को मुक्तिमार्ग पर बढ़ने के लिए पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता, यही है हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य। तुम चाहे वैदिक, जैन या बौद्ध, चाहे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत अथवा द्वैत, किसी भी ‘मत’ को टटोल लो, ये सभी इस उद्देश्य पर एक हैं।” स्वामीजी ने कहा है, “हमारा ‘धर्म’ ही हमारे तेज, हमारे बल, इतना ही नहीं तो हमारे राष्ट्रीय जीवन का भी मूलाधार है।” स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, धर्म ही भारत का प्राण है, हमें इसे ही पुष्ट करना होगा। इस दृष्टि से कहा जाए तो धर्म ही “राष्ट्र” का प्राण होता है।

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता 

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता इन दोनों शब्दों का प्रयोग आजकल सामान्य हो चले हैं। हिंदी शब्दकोष में भी इसके लगभग सामान अर्थ हैं। शब्दकोश के अनुसार, ‘राष्ट्रवाद’ वह सिद्धांत है जिसमें अपने राष्ट्र के हितों को सबसे अधिक प्रधानता दी जाती है, जबकि ‘राष्ट्रवादी’ वह है जो अपने राष्ट्र या देश के कल्याण का पक्षपाती हो। राष्ट्रीयता का तात्पर्य है अपने राष्ट्र के विशेष गुण अथवा अपने राष्ट्र के प्रति उत्कट प्रेम।

आजकल राजनीतिक दल और मीडिया के लोग किसी व्यक्ति के पद विशेष पर “राष्ट्रीय” शब्द का प्रयोग करते दिखाई देते हैं। जैसे राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव आदि। कांग्रेस जो भारत की स्वतंत्रता के लिए बनी थी, आजकल “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” के नाम से जानी जाती है। वर्तमान कांग्रेस में ‘राष्ट्रीयता’ कितनी है, सब जानते हैं। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या महासचिव के हृदय में ‘राष्ट्रीयता’ हो न हो उसके पद और नाम के आगे ‘राष्ट्रीय’ लगा दिया जाता है। ‘राष्ट्रीय’ का अर्थ ‘अखिल भारतीय’ नहीं है, इसलिए किसी व्यक्ति या संगठन के नाम के पहले ‘राष्ट्रीय’ तभी लगाना चाहिए जब वह राष्ट्र के लिए समर्पित हो, अन्यथा ‘अखिल भारतीय’ ही कहना ही उचित होगा।

‘राष्ट्रीयता’ के मर्म को स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी, डॉ. हेडगेवार, डॉ. आंबेडकर, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारीसिंह दिनकर आदि महापुरुष समझते थे। इसलिए उनके संवाद, उनके संदेश, उनकी कविताएं “राष्ट्रीयता” के परिचायक थे। इसलिए राष्ट्र को समर्पित संगठन के रूप में डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नामक संगठन की स्थापना की।

जब राष्ट्रीयता शब्द अपनेआप में पूर्ण है तो राष्ट्रवादी शब्द आया कहां से? मार्क्सवाद की तर्ज पर समाजवाद, मनुवाद जैसे शब्द तो मार्क्सवादियों ने गढ़े। बाद में हमारे हिंदी के प्रगतिवादी लेखकों और मीडिया ने राष्ट्रीयता की भावना जो प्रत्येक देशवासी के लिए ऊर्जा, प्रेरणा और समर्पण के संस्कार जगाती है, के स्थान पर ‘राष्ट्रवादी” शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया। राष्ट्र के प्रति प्रेम व समर्पण की भावना वाले को “राष्ट्र का पक्षपाती” के रूप में ‘राष्ट्रवादी’ बना दिया गया। यह शब्द इतना अधिक प्रचलित हो गया कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के रूप में राजनीतिक दल भी बन गया। ‘राष्ट्रीयता’ यह अपने राष्ट्र के प्रति भक्तिभाव को प्रगट करता है, जबकि ‘राष्ट्रवाद’ शब्द प्रगतिवादी लेखकों की देन है।

देशप्रेम और देशभक्ति

मानवीय जीवन में प्रेम को सबसे अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ है। महापुरुषों ने प्रेम की महिमा गाई है। सद्गुरु कबीर साहब ने प्रेमरहित मनुष्य हृदय के सम्बन्ध में कहा है,

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान

जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।।

स्वामी विवेकानन्द जब साढ़े तीन वर्षों के बाद अमेरिका से भारत लौट रहे थे, तब उनके एक  विदेशी मित्र ने पूछा, “स्वामीजी, आप तीन वर्षों तक वैभवशाली देश में रहकर अपने गरीब देश भारत में लौट रहे हैं। अब अपने देश के प्रति आपकी कैसी भावना है?”

स्वामीजी ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया जिससे प्रेम और भक्ति की अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी। स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा, “पहले तो मैं अपनी मातृभूमि से प्रेम ही करता था अब तो इसका कण–कण मेरे लिए तीर्थ हो गया है।”  अर्थात प्रेम से ऊपर का भाव भक्ति है। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास” के लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने निबंध “श्रद्धा-भक्ति” में कहा है, “प्रेम का कारण बहुत कुछ अनिर्दिष्ट और अज्ञात होता है; पर श्रद्धा का कारण निर्दिष्ट और ज्ञात होता है।” आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि, “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।” इससे स्पष्ट होता है कि समर्पण की भावना का पहला आयाम प्रेम है, उसके बाद श्रद्धा और फिर भक्ति। भक्ति यह समर्पण की सर्वोच्च स्थिति है। इसलिए प्रेम, श्रद्धा और भक्ति की अवधारणा को समझे बिना देशप्रेम और देशभक्ति की संकल्पना को नहीं समझा जा सकता।

यूं तो हमारे मीडिया जगत में देशभक्ति और देशप्रेम की गाथा को बहुत बार दोहराया जाता है। विशेषकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 15 अगस्त और 26 जनवरी, क्रिकेट या युद्ध के दौरान देशभक्तों का गुणगान करने और देशभक्ति जगाने के लिए सिनेमा के गीतों को दिखाने की परम्परा रही है। पर मीडिया में देशभक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाता। देशभक्ति के प्रगटीकरण के भी कुछ आयाम होते हैं। क्या इस बात पर मीडिया ने कभी अनुसंधान किया है? नहीं। यदि ऐसा होता तो क्रिकेट में जीत के बाद अथवा 15 अगस्त और 26 जनवरी को सड़कों पर डीजे की धुन में हो-हल्ला मचाते, थिरकते युवाओं के असभ्य और अनुशासनहीन कृत्यों को अनुशासित कृति में परिवर्तित करने के लिए कोई अभियान चलाया जाता।

हमारे देश में तो क्रिकेट, युद्ध, 15 अगस्त और 26 जनवरी के दौरान ही देशवासियों की लिमिटेड देशभक्ति सड़कों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि देशप्रेम अथवा देशभक्ति हमारे नागरिकों में है ही नहीं। निश्चित रूप से देशभक्त, देशप्रेमी अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय निराश्रित बालकों के पोषण, स्वस्थ्य और शिक्षा के लिए लगाते हैं। सीमा पर जवान, देश में किसान, समाज में विद्वान् यहां तक कि सफाई कर्मचारी अपने कर्मों के द्वारा भारतमाता की पूजा करते हैं। पर ऐसे समर्पित लोग कभी हो-हल्ला नहीं मचाते। इसलिए  देशभक्ति के आयाम को भी हमें समझना होगा।

9 फरवरी, 1897 को मद्रास (चेन्नई) के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में “मेरी क्रांतिकारी योजना” नामक अपने व्याख्यान में स्वामी विवेकानन्द ने ‘देशभक्ति’ की तीन सीढ़ियां बतलाई।

स्वामीजी ने कहा, “लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं, और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो!

क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे हृदय के स्पंदन से मिल गयी है? क्या उसने तुम्हें पागल-सा बना दिया है? क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहां तक  कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है- हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!”

स्वामी विवेकानन्द ने आगे कहा, “अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई यथार्थ कर्त्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है। किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!”

उन्होंने कहा, “क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो? यदि सारी दुनिया हाथ में नंगी तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए, तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।” स्वामी विवेकानन्द ने जोर देकर आगे कहा, “यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही ज़बर्दस्त शक्ति है।”

स्वामी विवेकानन्द के उपर्युक्त कथन से स्पष्ट होता है कि देशप्रेम और देशभक्ति की बातें करना जितना आसान है, उस पथ पर चलना उतना ही कठिन।

राष्ट्र है तो व्यक्ति है

व्यक्ति का जीवन, उसका ध्येय सबकुछ देश पर निर्भर करता है। जिस राष्ट्र में वह रहता है, उस राष्ट्र की संस्कृति, धर्म, उसका इतिहासबोध उसके जीवन की उन्नति के लिए प्रेरणादायी होता है। यदि हम सीरिया, ईराक या पाकिस्तान में पैदा होते तो हमारा जीवन कुछ और होता। हम भारत में जन्में हैं इसलिए हमारे जीवन का उद्देश्य उनसे अलग है। हमारी सोच, विचार और व्यवहार अन्य देश के नागरिकों से अलग है। क्योंकि हमारे राष्ट्र की संस्कृति, समाज की व्यवस्था और परिवार के संस्कारों में हमारा पोषण होता है। राष्ट्र के कारण राज्य हैं, राज्य के अन्दर समाज है, समाज के अन्दर परिवार है और परिवार में व्यक्ति पोषित होता है। इसलिए कहा जाता है, “देश हमें देता है सबकुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।”

बड़ी ईकाई राष्ट्र है और राष्ट्र की सबसे छोटी ईकाई व्यक्ति है। सबसे छोटी ईकाई व्यक्ति ही समाज और राष्ट्र की शक्ति होती है। इसलिए मनुष्य के चरित्र निर्माण पर जोर दिया जाता है। हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि राष्ट्र शाश्वत है जबकि मनुष्य मरता है। इसलिए राष्ट्र का महत्त्व मनुष्य से अधिक है। यही कारण है कि देशभक्तों ने महान राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।

पश्चिमी राष्ट्रवाद और भारत का राष्ट्रीय उद्देश्य  

यह सत्य नहीं है कि यूरोप, अफ्रीका, लतीनी अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में राष्ट्रवाद समाप्त हो रहा है। बल्कि पश्चिम में अपने राष्ट्र के हित के लिए वहां की जनता अधिक सजग और मुखर दिखाई देते हैं। पश्चिम जगत में तो अपने देश के हित के लिए दूसरे देश को समाप्त कर देने की तो होड़ लगी है। तेल संग्रह करने, व्यापार को बढ़ाने या फिर परमाणु शक्ति को बढ़ाने के लिए पश्चिमी देश सदैव आगे रहते हैं। जबकि भारत के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। हमारे यहां राजनीतिक दल आपसी जीत-हार के लिए अधिक उत्सुक और प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरा, अपने हित के लिए अन्य देशों को हानी पहुंचाना यह कभी भारत का उद्देश्य रहा ही नहीं। इतिहास साक्षी है कि भारत ने कभी भी दूसरे देशों में आक्रमण नहीं किया, न ही किसी देश की भूभाग को कब्जा करने की कभी चेष्टा की।

पश्चिम का राष्ट्रवाद भोग, व्यापार और विस्तारवाद पर आधारित है, जबकि भारत का राष्ट्रीय उद्देश्य अध्यात्म केन्द्रित है। भारत विश्व के कल्याण की कामना करता है। इसलिए भारत के इतिहास, धर्म, संस्कृति, शिक्षा और जीवन मूल्यों पर अध्ययन करना आज की आवश्यकता है। इसलिए मीडिया भारत की जनमानस को बदलने की क्षमता रखता है, उसके कर्ता-धर्ता, सम्पादकों और पत्रकारों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि वह भारत को समझें, भारत को जानें और देश की जनता को भ्रम के मकड़जाल से निकालें। ‘भारत राष्ट्र’ को कभी भी ‘वाद’ का विषय न बनाएं, समस्यायों का समाधान तलाशें। इसी में राष्ट्र का हित है, सबका हित है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”

नोटबंदी पर जनमत : संसद को बाधित करनेवालों पर हो सख्त कार्रवाई

lok-sabhaलोकसभा और राज्यसभा में हंगामा और विरोध का सिलसिला जारी है। ऐसा लग रहा है कि सदन हंगामा करनेवालों के लिए ही बना है। लोकसभा की माननीय अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन के तमाम समझाइश का असर मोदी सरकार के विपक्षी दलों पर दिखाई नहीं देता। पहले ‘भूमि अधिग्रहण विधेयक’, फिर कथित ‘असहिष्णुता के नाम पर’ और फिर ‘जेएनयू प्रकरण’ के नाम पर सदन की कार्यवाही को कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों बाधित किया। लोकसभा और राज्यसभा देशहित में विमर्श, चर्चा और निर्णय लेने का स्थान है। लेकिन सदन में हंगामा और विरोध बदस्तूर जारी है। इस माहौल पर देश की जनता खामोश नहीं है। जनता सोच रही है, समझ रही है और अपनी राय गली, मोहल्ला और चौपालों में अपने मित्रों के बीच जाहिर भी कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोच-समझकर और बड़ी योजनाबद्ध तरीके से 8 नवम्बर को 500 और 1000 के नोट पर बंदी की घोषणा की। इसके तुरंत बाद कांग्रेस ने भी सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया था। आम आदमी पार्टी (आआपा) भी दो दिन तक खामोश रही। फिर सभी मोदी विरोधी एक हो गए। सबसे पहले तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और पश्चिम बंगाल की मुखिया ममता बनर्जी ने इसका विरोध किया। और इसके बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद और आआपा के केजरीवाल के साथ शिवसेना ने भी अपना विरोध जताना शुरू किया। हालांकि, बाद में शिवसेना के रुख में बदलाव आया और अब वह सरकार के निर्णय के साथ खड़ी दिखाई दे रही है।

विरोध किसलिए?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिए गए ‘नोटबंदी’ के निर्णय से जनता खुश है। सामान्य नागरिक सरकार के इस निर्णय की प्रशंसा कर रहे हैं। हां, कुछ राजनीतिक दल 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट को अचानक बंद कर देने के निर्णय का विरोध कर रहे हैं। यहां विपक्षी दल नोटबंदी का विरोध करने का कारण क्या बता रहे हैं, यह भी सोचनेवाली बात है।

राहुल गांधी, केजरीवाल सहित सभी विपक्षी दलों का कहना है कि नोटबंदी की वजह से जनता को परेशानी हो रही है, क्योंकि सरकार ने नोटबंदी का फैसला तो ले लिया लेकिन सरकार ने फैसले से पूर्व कोई तैयारी नहीं की थी। तैयारी पूरी नहीं होने के कारण नोटबंदी के बाद लोगों की शादी और इलाज के लिए आवश्यक रुपये उन्हें नहीं मिल पा रहे हैं। नोटबंदी की वजह से कई लोग बैंकों में कतार लगाने से मर गए। यह सही है कि नागपुर में एक बैंक में कार्यरत व्यक्ति का  हार्टअटैक की वजह से निधन हो गया। खबर ऐसी भी आयी कि अधिक काम की वजह से कई बैंक कर्मी परेशान हैं। एक-दो बैंककर्मियों के बेहोश हो जाने की भी खबर चली। वहीं कतार में खड़े एक व्यक्ति या बैंक से घर जाने के बाद कुछ लोगों के निधन हो जाने पर कुछ टीवी चैनलों ने हो हल्ला मचाया कि नोटबंदी ने उन लोगों की जान ले ली। इस खबर के बाद सभी विपक्षी दल बार-बार बोलने लगे और मीडिया भी उनकी बातों को भुनाने में लग गई कि 50, फिर 55 और अब 75 लोग नोटबंदी की वजह से मर गए।

उल्लेखनीय है कि जनता की सुविधा के लिए बैंककर्मी भी खूब मेहनत कर रहे हैं। वहीं सरकार ने शादी का कार्ड दिखाकर बैंकों से 2.50 लाख रुपये निकालने की अनुमति दी। यही नहीं तो सरकारी व निजी अस्पतालों में 500 और 1000 के नोट का उपयोग करने की अनुमति दी, जिसकी वजह से दिनों-दिन बैंकों और एटीएम के बाहर भीड़ कम होती जा रही है। इसके बावजूद तमाम विपक्षी दल लोकसभा और राज्यसभा में सदन की कार्यवाही को चलने नहीं दे रहे हैं। जबकि बैंकों और एटीएम पर अपने पैसे के लिए कतार में खड़े नागरिकों की परेशानियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। क्यों?

विरोधियों की असली पीड़ा

नोटबंदी के विरोधी दल कांग्रेस, आआपा, तृणमूल और सीपीएम के नेता जोर देकर कह रहे हैं, “मोदीजी ने अपने मित्रों और भाजपा के लोगों को पहले ही नोटबंदी की जानकारी दी थी।” लेकिन विरोधियों की यह बात सही नहीं है। ऐसा कहकर विरोधी इस बात को साबित कर रहे हैं कि उनको अपने धन का जुगाड़ करने में समय नहीं मिला। ऐसा लगता है कि यही उनकी असली पीड़ा है कि उनको समय नहीं मिला। संभवतः इसलिए 25 नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “भारत का संविधान” पुस्तक के विमोचन में कह दिया, “पिछले 70 साल में कानूनों और संविधान का दुरुपयोग करने वालों ने देश को भ्रष्टाचार में डुबो दिया है। इन दिनों देश भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ रहा है और इस लड़ाई में आम नागरिक एक ‘सैनिक’ है। लेकिन कुछ लोग अब भी आलोचना कर रहे हैं कि सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की। मेरा मानना है कि मुद्दा यह नहीं है कि सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की थी। बल्कि मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को इस बात की पीड़ा है कि सरकार ने उन्हें किसी तैयारी का मौका नहीं दिया।” प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा, “अगर इन लोगों को तैयारी करने के लिए 72 घंटे मिल जाते तो वे तारीफ करते कि मोदी जैसा कोई नहीं है।”

कुछ लोगों की पीड़ा यह है कि सरकार ने उनको “तैयारी” करने का समय नहीं दिया।

जबरदस्त जनसमर्थन

मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले को जनता का जबरदस्त समर्थन है। ऑटो चालक, चायवाला, सब्जीवाला आदि छोटे व्यवसायी कह रहे हैं कि ‘उनका व्यवसाय थोड़ा मंद हो गया था लेकिन अब वह ठीक से चल रहा है। हम सरकार के इस फैसले के साथ खड़े हैं।’ देश के ईमानदार लोग घर में संग्रहित धन को बैंकों में जमा कर रहे हैं, इससे देश का राजकोष निरंतर समृद्ध हो रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, नोटबंदी के फैसले के सिर्फ 13 दिनों के बाद ही जनधन खाता में लोगों ने 21,000 करोड़ जमा कराए हैं। वहीं नोटबंदी के चलते आतंकियों व नक्सलियों की मदद करनेवाले देशद्रोहियों और विदेशी शत्रुओं के षड्यंत्रों पर निश्चित रूप से लगाम लगा है। यह स्पष्ट है कि वो लोग इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं जिनके पास कालाधन है। सरकार को इन विरोधियों के धन की तलाशी करनी चाहिए। सीमा पर हमारे जवान देश व हमारी सुरक्षा के लिए दिन-रात खड़े हैं। इसी तरह देशहित में लिए गए सरकार के इस निर्णय के साथ जनता खड़ी है।

ऐसे में जनता पूछ रही है कि विपक्षी दल सदन की कार्यवाही क्यों चलने नहीं दे रहे हैं। चाय के ठेले, गांव के चौपाल और शहरों बस स्टैंड से लेकर किराने के दुकान सहित ट्रेन की जनरल और स्लीपर कोच में सफ़र कर रहे यात्री कहते हैं कि सदन नहीं चलने देनेवाले विपक्षी दलों पर सदन में कार्रवाई क्यों नहीं होती? लोग पूछ रहे हैं कि सांसदों को वेतन कितना मिलता है? संसदीय कार्य में भाग लेने पर कितना रूपया मिलता है?

जनता के इस सवाल पर हमने कुछ खोज की तो पाया कि इस समय संसद सदस्‍य को 50,000/- रु. प्रतिमाह वेतन, 45,000/रु. प्रतिमाह नि‍र्वाचन क्षेत्र भत्ते के रूप में मि‍लते हैं और 45,000/रु. प्रति‍माह कार्यालयीन व्‍यय के रूप में मि‍लते हैं जि‍समें 15,000/रु.लेखन-सामग्री व पत्राचार और 30,000 वैयक्तिक सहायक के लि‍ए सम्मिलित हैं। सदस्य को सभा अथवा समि‍ति‍यों की बैठक अथवा अन्‍य संसदीय कार्य में भाग लेने के लि‍ए 2000/- का दैनि‍क भत्ता भी मि‍लता है।

जब हमने सासदों के वेतन और संसदीय कार्य में भाग लेने के लिए मिलनेवाले दैनिक भत्ते के बारे में पूछनेवालों को बताया तो जनता की प्रतिक्रिया बहुत बढ़िया लगी। एक ने कहा कि संसदीय कार्य में रूकावट डालनेवालों को सदन से उठाकर बाहर कर देना चाहिए। दूसरे ने कहा कि हंगामा करनेवाले सांसदों के दैनिक भत्ते को बंद कर देना चाहिए। तीसरे ने तो ऐसा सवाल किया, “भैया! सदन में हंगामा और विरोध तो सांसद करते हैं तो लोकसभा अध्यक्ष बार-बार “आई एम सॉरी” क्यों कहती है?”

हमने कहा, “सांसदों का मान रखने के लिए।” मेरी बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए वह बोला, “जो लोकसभा स्पीकर की बात न माने, उनकी समझाइशों की अवमानना करे उसका क्या मान रखना। स्पीकर को “आई एम सॉरी” के बदले उनपर सख्त कार्रवाई करना चाहिए।”

जन-मन की बात को प्रस्तुत करने का मन हुआ और यह लेख लिखा। लोकसभा अध्यक्ष एक शिक्षक की तरह सांसदों की उद्दंडताओं या शोर-शराबे को संयमित करते हैं। तथापि एक शिक्षक के रूप में उद्दंडता करनेवाले को दंडित भी करते हैं। ऐसे में देखना होगा कि लोकसभा व राज्यसभा में सरकारी रुपयों व समय का अपव्यय करनेवाले सांसदों पर स्पीकर कौन-सा रुख अपनाते हैं? या फिर हंगामा ऐसा ही चलता रहेगा या फिर सदन की कार्यवाही इसी तरह बाधित होती रहेगी?

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’