आइए, राष्ट्र चेतना का अलख जगाएं…

youth.jpgभारत राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए क्या करना होगा? इसके लिए किस चीज की आवश्यकता है? क्या अधिक धन संग्रह करने से देश का उत्थान होगा? क्या बड़ी-बड़ी मिसाइल, शक्तिशाली बम और शस्त्रों से सज्ज सेना मात्र से देश का विकास होगा? क्या अनाथ बच्चों के लिए अधिकाधिक अनाथालय बनाने या असहाय-अभावग्रस्त वृद्धों के लिए अधिकाधिक वृद्धाश्रम बनाने से देश की समस्याओं का समाधान हो जाएगा? अथवा सभी देशवासियों को शिक्षित कर देने से देश का कल्याण हो जाएगा? अपने देश के प्रति एक देशभक्त नागरिक के मन में ऐसे अनेक प्रश्नों का उठना स्वाभाविक है, और यह अच्छी बात है। लेकिन अपने प्रश्नों का उत्तर यदि यथार्थ रूप में नहीं प्राप्त होता है तो मन में खिन्नता आ जाती है।

राष्ट्र के उत्थान के लिए सबसे बड़ी जिस साधन की आवश्यकता है उसका नाम है- ‘मनुष्य’। मनुष्य जब अपने परिवार, समाज, राष्ट्र व समष्टि के प्रति समर्पित होता है तो वह नैतिक आचरण से युक्त होता है। वह अच्छे-बुरे, सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म के अंतर को समझता है और जो कल्याणकारी है उसी मार्ग का चयन करता है। ऐसे ही विवेकी मनुष्यों से राष्ट्र बलवान बनता है। और जब भी ऐसे आदर्श व विवेकी मनुष्य की कमी देश में होती है तब अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम अथवा महिला सुरक्षा के लिए कड़े कानून बनाने की आवश्यकता पड़ती है। स्वामी विवेकानन्द ने भारत की प्रत्येक समस्या के समाधान के लिए गहन चिन्तन किया और उन्होंने पाया कि राष्ट्रीय चरित्र से युक्त मनुष्य से ही राष्ट्र का उत्थान हो सकता है। स्वामीजी ने जोर देकर कहा है कि “मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए! आवश्यकता है- वीर्यवान, शौर्यवान, श्रद्धासम्पन्न, दृढ़विश्वासी व निष्कपट नवयुवकों की…।”

स्वामी विवेकानन्दजी के “मनुष्य निर्माण और राष्ट्र पुनरुत्थान” के आदर्श को साध्य करने के लिए विवेकानन्द केन्द्र देशभर में अपनी कार्य प्रणाली और कार्य पद्धति के माध्यम से राष्ट्र चेतना का अलख जगा रहा है। इसलिए देशवासी इस कार्य पद्धति का अंग बनें, यह समय की आवश्यकता है। देश करवट बदल रहा है। आधुनिकता की लहर इस तरह समाज पर हावी है कि मानों उसने सबको अपने में समेट लिया है। मोबाइल, स्मार्टफोन, टैब, कम्प्यूटर, टीवी जैसे आकर्षक उपकरणों के हम आदी हो चले हैं। इन उपकरणों की उपयोगिता है और वह अपने लिए आवश्यक भी है, लेकिन जब उपकरणों के हम गुलाम हो जाते हैं तो वह हमारे लिए हानिकारक साबित होते हैं।

एक विद्यार्थी ने मुझसे कहा, “भैया! आज मैंने शतक बनाया। बारह छक्के मारा!” मैंने कहा, “वाह! क्या बात है, तुमने तो कमाल कर दिया।” तो दीदी बोली, “इसमें क्या कमाल है! इसने तो मोबाइल के क्रिकेट गेम में शतक बनाया है!”

बालक बोला, “इसमें भी तो दिमाग लगता है न!” मैंने बालक के इस कथन में हामी भरी, और फिर कहा, “भाई! जरा मैदान में भी खेला कर। मोबाइल में खेलने भर से क्या होगा?” वह हँसने लगा और कहा, “भैया! खेलने के लिए दोस्त तो चाहिए। सब अपने-अपने ट्यूशन्स-क्लासेस में बीजी रहते हैं।”

यह एक ऐसा प्रसंग है जो मजबूर करता है कि बचपन किस ओर जा रहा है। दूसरी ओर घर जितने बड़े होते जा रहे हैं आपसी सम्बन्ध उतने ही दूर होते जा रहे हैं। सब अपने काम में इतने व्यस्त हैं कि पड़ोस में रहनेवाले व्यक्ति की स्थिति का अंदाजा लगाना कठिन है। आज फेसबुक, वाट्सेप, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया में तो सबके बहुत से मित्र होते हैं, प्रत्यक्ष जीवन में मित्रों व शुभचिंतकों की कंगाली होती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बातें तो होतीं हैं पर परिवार, समाज और राष्ट्र को जोड़नेवाली ‘एकात्मता’ का आदर्श बहुत कम देखने को मिलता है। ऐसे में समाज के हर एक वर्ग को राष्ट्रीय चेतना के आयाम में जोड़ना ही होगा। विवेकानन्द केन्द्र की कार्य प्रणाली और कार्य पद्धति से यह सम्भव है।

rockmemorial.jpgकार्य प्रणाली

विवेकानन्द केन्द्र की कार्य प्रणाली के चार आयाम हैं, – लोक सम्पर्क, लोक संग्रह, लोक संस्कार तथा लोक व्यवस्था। यह एक ऐसी प्रणाली है जिसके माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों तथा आयुवालों को संगठित कर उन्हें एकात्मता के सूत्र में जोड़ा जा सकता है।

लोक सम्पर्क : समाज के प्रत्येक वर्ग से सम्पर्क करना “लोक सम्पर्क” कहलाता है। विभिन्न सम्मेलनों तथा उत्सवों के कार्यक्रम में सहभागिता के लिए सभी से सम्पर्क करना शामिल है। सम्पर्क सभी से किया जाता है, यथा- बालक-बालिका, स्त्री-पुरुष, युवा-प्रौढ़ तथा बुजुर्गों से।

लोक संग्रह : सम्पर्क किये गए सभी वर्गों में से उत्तम का चयन “लोक संग्रह” कहलाता है। इस प्रक्रिया में चयनित व्यक्ति के गुणों व क्षमताओं को समझना और उनको सतत अपने सम्पर्क में रखना। संक्षेप में कहा जाए तो सज्जनशक्ति को संग्रहित करना ही लोक संग्रह है।

लोक संस्कार : चयनित या संग्रहित उत्तम गुणों व क्षमता वाले श्रद्धावान व्यक्ति को प्रशिक्षित करना “लोक संस्कार” कहलाता है। इस दृष्टि से विवेकानन्द केन्द्र बालकों के लिए “संस्कार वर्ग प्रशिक्षण शिविर” तथा “व्यक्तित्व विकास शिविर”, युवाओं के लिए “युवा प्रेरणा शिविर”, कार्यकर्ताओं के लिए स्थानीय, प्रान्तीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर “कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर”, योग के माध्यम से समाज को संगठित करनेवाले व्यक्तियों के लिए “योग शिक्षा शिविर” तथा अध्यात्म में रूचि रखनेवालों के लिए “आध्यात्मिक शिविर” का आयोजन करता है। साथ ही शिक्षक, विद्यार्थी, नव-विवाहितों, मार्केटिंग अथवा अन्य प्रोफेशनल अधिकारियों के लिए विशेष “योग प्रतिमान” विवेकानन्द केन्द्र ने बनाया है, जिसके माध्यम से उन सभी आयुवर्ग तथा व्यावसायिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों को उनके कार्य क्षमता को बढ़ाने तथा उनमें व्याप्त राष्ट्रभाव को दृढ़ किया जाता है।

लोक व्यवस्था : प्रशिक्षित या संस्कारित व्यक्ति को विशेष “दायित्व” दिया जाता है जिसके माध्यम से वह सम्बंधित क्षेत्र में मनुष्य निर्माण का कार्य करता है।

कार्य पद्धति

विवेकानन्द केन्द्र की कार्य पद्धति के चार आयाम है- संस्कार वर्ग, योग वर्ग, स्वाध्याय वर्ग और केन्द्र वर्ग।

samskarvarga.jpgसंस्कार वर्ग : संस्कार वर्ग का संचालन करने के लिए वर्ग शिक्षक, गट प्रमुख और विस्तार प्रमुख ये तीन दायित्व वाले कार्यकर्ताओं का समावेश होता है। संस्कार वर्ग प्रति सप्ताह शनिवार/रविवार डेढ़ से दो घंटे की अवधि में होता है। जिस स्थान पर संस्कार वर्ग लगता है, वहां के प्रबुद्ध जन से सतत सम्पर्क तथा वर्ग में अपेक्षित बालक-बालिकाओं के परिवार में सम्पर्क करना होता है।

संस्कार वर्ग इतना रोचक और महत्वपूर्ण कार्य पद्धति है कि इसमें नियमित आनेवाले बच्चों के साथ ही वर्ग संचालन करनेवाले कार्यकर्ता के जीवन में अद्भुत परिवर्तन होता है। कहानी, खेल, गीत, सूर्यनमस्कार, स्तोत्र पठन आदि रोचक माध्यमों से आनंद मिलता है। आत्मविश्वास, अनुशासन, साहस, धैर्य, सामूहिकता, एकाग्रता, आपसी सहयोग, आत्मीयता जैसे व्यक्तित्व को निखारने वाले गुण विकसित होते हैं। वर्ग संचालक कोई सर या मैडम नहीं होते बल्कि दीदी या भैया होते हैं। वर्ग में समय-समय पर उत्सव मनाए जाते हैं, जिसके अंतर्गत बालक-बालिकाएं प्रसंग नाट्य, स्तोत्र पठन, सामूहिक गीत तथा कथाकथन प्रस्तुत करते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि संस्कार वर्ग बालकों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मिक विकास का शक्ति केन्द्र है।

yog-satra.jpgयोग वर्ग : योग को विवेकानन्द केन्द्र का “प्राण स्वर” कहा जाता है। विवेकानन्द केन्द्र ने योग शिविर तथा योग वर्ग के माध्यम से ही कार्यारम्भ किया था। अब देशभर में सैकड़ों स्थानों पर नियमित योग वर्ग चलता है। इसके साथ ही केन्द्र के विभिन्न शाखाओं के द्वारा समय-समय पर योग सत्र, प्राणायाम सत्र, आवर्ती ध्यान, ॐ कार ध्यान शिविर, योग शिक्षा शिविर तथा योग प्रशिक्षक शिविर का आयोजन किया जाता है। प्रार्थना शिथिलीकरण व्यायाम, सूर्यनमस्कार, आसन, प्राणायाम, चर्चा/मंथन/भजन/गीत, शान्तिमंत्र तथा केन्द्र प्रार्थना, इस तरह का क्रम होता है योग वर्ग का।

swadhyay-varga.jpgस्वाध्याय वर्ग : युवा वर्ग में चिंतन क्षमता और वैचारिक स्पष्टता को बढ़ाने के लिए विवेकानन्द केन्द्र द्वारा देशभर में स्वाध्याय वर्ग चलता है। यह वर्ग भी प्रति सप्ताह एक घंटे का होता है। किसी विशेष पुस्तक का सामूहिक अध्ययन, पढ़े गए विषय पर चर्चा, अपने विचार व्यक्त करना आदि इस प्रक्रिया का अंग है। स्वाध्याय वर्ग में नियमित आनेवाले व्यक्ति के बौद्धिक तथा वैचारिक क्षमता का विकास होता है। स्वाध्याय वर्ग में नियमित रूप से सहभागी होनेवाले युवा में एक अच्छे पत्रकार, लेखक, वक्ता आदि के गुण विकसित होते हैं। कालान्तर में वे इसे अपना करियर भी बना सकते हैं।

yogकेन्द्र वर्ग : विवेकानन्द केन्द्र की कार्य पद्धति का यह एक और विशेष आयाम है। केन्द्र वर्ग प्रति सप्ताह 1 घंटे का होता है। इस वर्ग में प्रार्थना, ऐक्य मंत्र, व्यायाम, खेल, गीत, स्वाध्याय, शांति मंत्र तथा केन्द्र प्रार्थना शामिल है। यह ऐसा वर्ग है जिसमें बाल, युवा, प्रौढ़ तथा बुजुर्ग भी शामिल हो सकते हैं।

इसके साथ ही विवेकानन्द केन्द्र केन्द्र द्वारा अनेक सेवा प्रकल्प हैं। केन्द्र द्वारा प्रकाशित साहित्य को खरीदकर, पत्र-पत्रिकाओं के सदस्य बनकर और बनाकर, सेवा प्रकल्पों के लिए आर्थिक सहयोग देकर अथवा अपने मित्रों को इस हेतु प्रेरित कर इस हम राष्ट्र कार्य में योगदान दे सकते हैं।

vivekananda-kendra-sahitya-seva.jpgविवेकानन्द केन्द्र की कार्य प्रणाली और कार्य पद्धति समाज के सभी आयु-वर्ग को जोड़ता है। अतः अपने परिवार के बालकों को संस्कार वर्ग में भेजिए। युवा हैं तो संस्कार वर्ग के संचालन के लिए अथवा स्वाध्याय वर्ग में शामिल होने के लिए आइए। विवेकानन्द केन्द्र योग वर्ग तथा केन्द्र वर्ग में सभी को सम्मिलित होने का आह्वान करता है ताकि हम सभी राष्ट्र चेतना का अंग बन सकें। आइए, विवेकानन्द केन्द्र की कार्य प्रणाली तथा कार्य पद्धति में प्रत्यक्ष सहभागी होकर ही नहीं तो दायित्व लेकर “मनुष्य निर्माण तथा राष्ट्र पुनरुत्थान” के महान ध्येय की साधना में योगदान दें।

बाट निहारती भारत माँ…

लखेश्वर चंद्रवंशी लखेश

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हमारे प्रेरणास्रोत हमारी शक्ति  

bharat-mata-picute5हम हताश, निराश और विचलित होते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि हमें इस संसार में कोई अपना दिखाई नहीं देता, और निराशा के गर्त में हम ऐसे डूबने लग जाते हैं जहां से उबरना हमारे लिए असम्भव सा हो जाता है। इस असम्भव को संभव कोई बना सकता है तो वह है- अपने अंतःकरण में विराजमान शक्ति। इस शक्ति को क्या कहें, इसके तो अनेक नाम हैं। कोई इसे आत्मा कहता है तो कोई परमात्मा, कोई ईश्वर कहता है तो कोई खुदा। पर एक बात तो निश्चित है कि अंतःकरण में कोई तो है जिसे हम विपतकाल में स्मरण करते हैं। वही हमारे प्रेरणा का स्रोत होता है, वही हमारा आदर्श भी होता है।

आजकल जब हम किसी बालक या युवा को पूछते हैं कि आपके आदर्श कौन हैं, तो सामान्यतः वे उत्तर में किसी फिल्म अभिनेता का अथवा किसी कलाकार का नाम बता देते हैं। अभिनेता आदि को अपना आइडियल बता देने का आजकल एक फैशन सा हो गया है। उन कलाकारों से युवाओं अथवा बालकों को किस तरह की प्रेरणा मिलती है, मिलती भी है या नहीं, यह एक बात है। पर हमारे आदर्श ऐसे हों, जिनसे हमें सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा मिल सके। इसलिए विवेकानन्द केन्द्र अपने उपक्रमों, प्रकल्पों और विशेषकर अपनी कार्यपद्धति- संस्कार वर्ग, योग वर्ग, स्वाध्याय वर्ग तथा केन्द्र वर्ग के माध्यम से उच्च आदर्शों को जनमानस में प्रस्थापित करने का कार्य करता हैं। बल उपासक, ज्ञान साधक, सेवाभावी, दृढ़ विश्वासी और पवित्र हृदयवाले मनुष्य का निर्माण करना ही यह इस राष्ट्र की परम्परा रही है। हमारे ऋषि-मुनियों और संतों ने मनुष्य निर्माण और मानवता की रक्षा के लिए आजीवन कार्य किया। जब-जब हमारे देश में “मनुष्य निर्माण” की परम्परा में शिथिलता आयी तब-तब हमारा समाज निष्क्रिय होता गया। समाज को स्वार्थ ने जकड़ लिया और हमारा देश विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमणों व षड्यंत्रों का शिकार हो गया।

हम जानते हैं कि विदेशी आक्रान्ताओं ने जब भी भारत पर आक्रमण किए तब उन्होंने हमारे समाज पर अमानवीय अत्याचार किए। निर्मम अत्याचारों से आहत होने के बावजूद हमारा समाज तबतक निष्क्रिय बना रहा जबतक किसी महापुरुष ने उन्हें जगाया नहीं। आचार्य चाणक्य, समर्थ रामदास, गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी विवेकानन्द आदि ऐसे प्रेरणा पुरुष हुए जिन्होंने अपने युग में अपनी नीति, योजना और आह्वानों से समाज को झकझोरा, और आक्रान्ताओं से लड़ने के लिए सामूहिक शक्ति का सूत्रपात किया। उनकी प्रेरणा आज भी नीति-नियंताओं और जवानों को शक्ति प्रदान करती है। असामाजिक तत्वों का प्रतिकार करने और समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों को दूर कर “आदर्श की स्थापना” के लिए संत कबीर, गुरु नानक, संत एकनाथ, नारायण गुरु जैसे अनगिनत संतों के कार्य उल्लेखनीय है।

अब अपनी बारी है

स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा है कि, “तुम्हें केवल पुराने ऋषियों के उपदेश को सीखने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वे ऋषि जा चुके हैं… अब तुम्हें स्वयं ऋषि बनना होगा। तुम भी उसी प्रकार मनुष्य हो, जिस प्रकार अब तक उत्पन्न हुए समस्त महापुरुष, यहां तक कि अवतार भी, मनुष्य थे।” स्वामीजी के इस कथन को हल्के में लेना ठीक नहीं होगा। स्वामीजी यहां सामान्य मनुष्य को प्रेरित कर रहे हैं कि अपने तपस्वी जीवन और उदात्त कर्मों से कोई भी मनुष्य ऋषि बन सकता है। इसलिए तपस्वी जीवन और उदात्त कर्म करने के लिए अपने समक्ष महान आदर्श अथवा प्रेरणास्रोत का होना आवश्यक है। इसलिए विवेकानन्द केन्द्र ने अपने सम्मुख पंच प्रेरणास्रोत का आदर्श रखा है- प्रणव मंत्र “ॐ”, भारतमाता, स्वामी विवेकानन्द, मा. एकनाथजी रानडे तथा केन्द्र प्रार्थना।

Om1) प्रणव मंत्र  :  हमारे शास्त्रों के अनुसार “ॐ” शब्द ब्रम्ह है और इसी से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। “ॐ” यह प्रणव मंत्र भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। यह ईश्वरीय शक्ति का भी प्रतीक है। इसलिए हमारे वैदिक मन्त्रों के प्रारंभ में “ॐ” का स्मरण किया जाता है। ॐ का उच्चारण सभी पंथों में होता है, केवल रूप अलग है। जैसे, – ईसाई और यहूदी संप्रदाय में “आमेन”, मुस्लिम मत में “आमीन”, बुद्ध धम्म में “ओं मणिपद्मे हूं” और सिख पंथ में “एक ओंकार” के रूप में होता है।

स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने एक व्याख्यान में “ॐ” के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा था, – “…ॐ हमारे सभी पंथों का प्रतीक है। यदि हिन्दुओं में कोई ऐसा सम्प्रदाय हो, जो ओंकार को न माने, तो समझ लीजिए कि वह हिन्दू कहलाने योग्य नहीं है।” स्वामीजी ने ॐ के मंदिर की कल्पना देश के सम्मुख रखी थी ताकि विभिन्न मत-सम्प्रदाय के लोग इस मंदिर में आकर सर्वमान्य ॐ के समक्ष एकात्मता के सूत्र में बंध जाएं। विवेकानन्द केन्द्र ॐ को गुरु मानता है। ईश्वर का प्रतीक यह प्रणव मंत्र हमारा प्रेरणास्रोत है। ईश्वर का कार्य ही है सज्जनों की रक्षा, सद्गुणों का संवर्धन और दुष्ट शक्तियों का विनाश। ॐ रूपी शब्द ब्रह्म के ही हम अंश होने के कारण हमारा भी दायित्व है कि हम सज्जनशक्ति का सृजन करें, उसका संवर्धन करें और दुष्ट शक्तियों की समाप्ति के लिए अपने समाज को तैयार करने में अपना योगदान दें।

bharat-mataWEBभारतमाता : हमारी दूसरी प्रेरणास्रोत है अपनी मातृभूमि भारतमाता। हमारी मातृभूमि की गोदी में भगवान ने भी अनेकों बार जन्म लिया, यहां लीलाएं की। भारतमाता ने ऋषियों, महर्षियों, महात्माओं, वीरों को जना है। वेद की रचना हमारी भूमि में हुआ है इसलिए हमारी मातृभूमि वेदभूमि है, धर्मभूमि है, वीरभूमि है, पुण्यभूमि है। यही कारण है कि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ने भारतभूमि को जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” कहकर प्रणाम किया। वहीं विष्णुपुराण में कहा गया है कि, –

गायन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद – मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।        

अर्थात देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मार्गभूत भारतभूमि के भाग में जन्में लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है –

हे शरणदायिनी देवितू करती सब का त्राण है।

हे मातृभूमि! सन्तान हमतू जननीतू प्राण है॥

ऐसी हमारी धर्मभूमि भारतमाता से प्रेरणा मिलती है कि हम अपने को इस योग्य बनाएं कि हमें भी ईश्वर का दर्शन हो सके। भारतमाता ने ज्ञान, योग, तप, कला, संस्कृति और वीरत्व को अपनी भूमि में जन्म दिया है। भारतमाता के इस महान देन को हम संवर्धित करें।

Swami-Vivekanandas-Rousing-Call-to-Hindu-Nationस्वामी विवेकानन्द : भारतमाता के महान सुपुत्र वीर संन्यासी स्वामी विवेकानन्द हम सभी के प्रेरणास्रोत हैं। स्वामीजी ने अपने ओजस्वी वचनों से भारत की महिमा को विश्वपटल पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने कोलम्बो से अल्मोड़ा तक भ्रमण करते हुए देशवासियों में राष्ट्रभक्ति का अलख जगाया। उन्होंने युवकों को राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए अर्पित हो जाने का आह्वान किया। स्वामीजी की पुकार सुनकर अनगिनत लोगों ने देश की स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनेआप को झोंक दिया। देशवासियों की पीड़ा को अपने हृदय में अनुभव करनेवाले, सुप्त समाज में चेतना का संचार करनेवाले स्वामीजी जीवनभर भारत के उत्थान के लिए अनथक प्रयत्न किए। स्वामी विवेकानन्दजी की यह भारतभक्ति हम सबकी प्रेरणा है।

माननीय एकनाथजी : विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक माननीय श्री एकनाथजी रानडे के जीवन का उद्देश्य बन गया था कि स्वामी विवेकानन्द द्वारा बताए गये आदर्शों व ध्येय को साकार करना। एकनाथजी ने स्वामीजी के विचारों को समाज जीवन में चरितार्थ करने के लिए पूरा जीवन खपा दिया। एक कुशल संगठक के रूप में उनकी योजनाएं, गतिविधियां, अध्ययन, सम्पर्क और सभी प्रकार के प्रयत्न उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित था। p8कन्याकुमारी में विवेकानन्द शिलास्मारक की स्थापना के पूर्व से ही वे ‘स्वामीजी के सपनों के युवाओं’ की खोज में हमेशा लगे रहते थे। कार्यकर्ता की खोज में वे बेहद सकारात्मक दृष्टि रखते थे। वे कहते थे कि हमारी दृष्टि में अपने समाज में दो ही तरह के लोग हैं, 1) जो कार्यकर्ता हैं और 2) जो कार्यकर्ता होनेवाले हैं।

एकनाथजी का कहना था कि स्वामी विवेकानन्द पर मात्र श्रद्धा रखने से काम नहीं चलेगा, वरन स्वामीजी के द्वारा रखे गए महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना जीवन का हर क्षण न्योछावर करना होगा। वे देश के युवाओं से जब भी मिलते तो उनको आहवान करते थे कि स्वामीजी के स्वप्न के युवा बनों, राष्ट्र पुनरुत्थान के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दो। एकनाथजी के आह्वान से अनेक युवाओं ने अपना करियर, नौकरी और प्राप्त डिग्री के महत्त्व को एक ओर रखकर अपनाजीवन ‘जीवनव्रती’ के रूप में विवेकानन्द केन्द्र को समर्पित कर दिया। आज भी कार्यकर्ता एकनाथजी को अपना आदर्श मानकर स्वामी विवेकानन्दजी के बताए पथ पर चलकर राष्ट्र पुनरुत्थान के कार्य में सक्रिय हैं। ऐसे श्री एकनाथजी हमारे चौथे प्रेरणास्रोत हैं।

केन्द्र प्रार्थना : विवेकानन्द केन्द्र यह अध्यात्म प्रेरित सेवा संगठन है और केन्द्र प्रार्थना में संगठन का मूल भाव व बीजमंत्र निहित है। यह प्रार्थना केन्द्र के सभी शाखाओं में कार्यकर्ताओं द्वारा नित्य गायी जाती है। kendra prarthanaकेन्द्र संस्थापक श्री एकनाथजी के आग्रह पर नागपुर के संस्कृत विद्वान डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर ने इस प्रार्थना की रचना की थी। इस प्रार्थना में निहित भाव को समझने के लिए विवेकानन्द केन्द्र की उपाध्यक्षा मा. निवेदिता भिड़े द्वारा लिखित “ध्येय मार्ग” नामक पुस्तक का अध्ययन करना चाहिए। इस पुस्तक की प्रस्तावना में केन्द्र के अध्यक्ष मा. परमेश्वनजी ने कहा है कि केन्द्र प्रार्थना केन्द्र कार्यकर्ता के जीवन में “श्वांस” की तरह है। इसी प्रार्थना की प्रेरणा से कार्यकर्ता अपने ध्येय पथ से सतत जुड़ा रहता है।

ये पंच प्रेरणास्रोत ही वास्तव में अपने संगठन के प्रत्येक कार्यकर्ता की शक्ति है। संगठन की इस शक्ति को आइये, हम सर्वत्र प्रसारित करें।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

‘स्वतंत्रता’ का सन्देश देता ‘श्रीकृष्ण’ का जीवन

Krishna-birth2भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। पर स्वतंत्र होने तथा अपनों को दुःख की बेड़ियों से मुक्त करने की चाह देखिए, जन्म लेते ही माता देवकी तथा पिता वसुदेव को बेड़ियों से मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं तो नवजात शिशु कृष्ण की इच्छा से कारागार के द्वार स्वतः खुल गए। बेड़ी मुक्त होते ही कारागार से बाहर जाने का मार्ग सुलभ हो गया। पिता वसुदेव बालक कृष्ण को लेकर मथुरा से गोकुल की ओर निकल पड़े। Vasudev-Krishna

स्थिति देखिये, कारागार से मुक्त हुए पर यमुना नदी बालक कृष्ण के चरण छूने को लालायित है, पिता ने अपने पुत्र बालक कृष्ण को टोकरी में उठाकर अपने सिर पर रख लिया है। कृष्ण के चरण छूने को लालायित यमुना का जलस्तर बढ़ गया है। ऐसी स्थिति में पिता वसुदेव के लिए आगे बढ़ना कठिन हो गया। ऐसी विकट स्थिति में बालक कृष्ण ने टोकरी के बाहर अपने चरण रख दिए। दर्शन को लालायित यमुना ने कृष्ण के चरणों को छुआ और जलस्तर कम हो गया। इस समय भी कृष्ण ने यमुना को दर्शन की व्याकुलता के बंधन से और अपने पिता को यमुना के भयंकर जलस्तर के विकट परिस्थिति से मुक्त किया। वहां गोकुल पहुंचे तो अत्याचारी शासक कंस के आतंक से त्रस्त गोकुलवासियों को अपने मनोहारी अलौकिक छवि से आनंद विभोर कर दिया। कुपोषित गोधन को अपने दिव्य स्पर्श और प्रेम से पोषित कर उन्हें पुष्ट बनाया।

गोकुलवासियों को गोमाता का सारा दूध कंस के पास भेजना पड़ता था और उनके अपने बच्चे दूध से वंचित रहते। ऐसे में बालक कृष्ण ने मित्रों की टोलियां बनाईं, दूध,माखन से भरी मटकियां फोड़ीं और एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जिससे कि गोकुल का दूध तथा दुग्धजन्य पदार्थ मथुरा न जा सके। इससे गोकुल के बालकों को दूध मिलने लगा, गोकुलवासी पुष्ट होने लगे। अत्याचारी शासन के लगान से ग्रामवासियों को मुक्त करने का ऐसा था कृष्ण का अभियान।

आगे श्रीकृष्ण ने कंस के भेजे गए राक्षसों को समाप्त कर उन्हें यमपुर भेज दिया। वहीं गोकुल में जातिगत भेदभाव को मिटाने का प्रखर अभियान चलाया। सभी जातियों के बालकों को अपना मित्र बनाया, उनके साथ गइया चराने गए, सामूहिक भोजन किया। यमुना नदी को विषैला करनेवाले कालिया नाग  से युद्ध कर उसे यमुना छोड़ने के लिए बाध्य किया।

श्रीकृष्ण ने गोपियों के विरह को दूर करने के लिए उनके साथ महारास किया। हजारों गोपियों के बीच रहकर भी वे वासनामुक्त रहे, इसलिए वे योगेश्वर श्रीकृष्ण कहलाए। बाद में जब अत्याचारी कंस को समाप्त करने का निश्चय किया तो गोकुल, यशोदा मैया, पिता नन्द, मित्र-सखा ग्वाले, गोपियां सबको छोड़ा। किसी के प्रति आसक्ति नहीं रखी, कर्तव्य पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार से मोह का बंधन कृष्ण को न बांध सका। कंस का वध किया, माता देवकी, पिता वसुदेव और महाराज उग्रसेन सहित कंस के कैद में रहे जन सामान्य को कारागार से मुक्त किया। कंस को मारकर भी उन्होंने मथुरा पर राज नहीं किया, मथुरा का राज उन्होंने महाराज उग्रसेन को सौंप दिया।

उन्होंने वैभवशाली द्वारिका बसायी। दर-दर वनवास के बंधन में जकड़े पांडवों का मार्ग प्रशस्त किया। धर्मयुद्ध के दौरान पार्थ-अर्जुन को मोहपाश ने जकड़ लिया और वह अपने कर्मक्षेत्र से पलायन करना चाहता था। इस अनावश्यक विरक्ति से श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बाहर निकाला। अर्जुन के मन में उठे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया और दोनों के संवाद से श्रीमद्भगवद्गीता जैसा अलौकिक ज्ञान प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के उपदेश ने अर्जुन को कर्तव्यवान बनाया और इसके बाद पांडवों को विजय प्राप्त हुआ। हस्तिनापुर नरेश युद्धिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट बनें, वहीं गीता का ज्ञान आज संसार के लिए कर्तव्य पथ दर्शानेवाला, विकार मुक्त करने वाला तथा ईश्वर तक पहुंचने का महान ग्रन्थ है।

जन्म से ही अपने प्राण त्यागने तक जिन्होंने स्वतंत्रता से जीवन जिया ऐसे श्रीकृष्ण ने केवल धर्म के बंधन को ही स्वीकार किया। धर्म को प्राथमिकता दी, उसी को आदर्श माना। श्रीकृष्ण ने वचन दिया था कि महाभारत युद्ध में वे शस्त्र नहीं उठाएंगे, पर धर्मरक्षा के लिए उन्होंने अपने ही वचन को तोड़ा तथा शस्त्र उठाकर संसार को बता दिया कि धर्म ही सर्वोपरि है। धर्म की रक्षा के लिए व्यक्तिगत प्रण या वचन बाधक बने तो उसे तोड़ देना ही उचित है। श्रीकृष्ण जीवनभर धर्म को जिया और उन्होंने अपने महान जीवन तथा उपदेश से संसार को बताया है कि धर्म के आचरण से युक्त व्यक्ति हो स्वतंत्र हो सकता है। आज 15 अगस्त, 2017 को भारतीय स्वतंत्रता दिवस है और आज श्रीकृष्णजन्माष्टमी भी है। इस अद्भुत संयोग पर श्रीकृष्ण के जीवन व सन्देश से वास्तविक स्वतंत्रता के मर्म को समझें तथा शत्रु देशों के षड्यंत्रों पर भारत को विजय मिले यह श्रीकृष्ण चरण में प्रार्थना।
“हमें नहीं है चिन्ता अपनी, उनको चिन्ता हमारी है। हमारे जीवन रथ के सारथी, स्वयं सुदर्शन चक्रधारी है।।” 

श्रीकृष्ण प्रगट दिवस तथा भारतीय स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

– लखेश्वर चंद्रवंशी “लखेश”

 

स्वाधीनता आन्दोलन और उसके मोल को क्या हम समझ पाए?

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(15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

स्वतंत्रता सबको प्रिय है। क्योंकि स्वतंत्रता मनुष्य का स्वभाव है। यही कारण है कि वह अपनी स्वतंत्रता के लिए छटपटाता है। हमारे देश में लगभग 1000 वर्षों तक विदेशी आक्रमण होते रहे। ग्रीक, हूण, शक, यवन और मुग़ल शासन की प्रताड़ना सहते हुए अपने सांस्कृतिक और अध्यात्मिक विरासत का जतन बड़ी सजगता के साथ हमारे पूर्वजों ने किया। तब जाकर हमारी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हो सकी। बाद में अंग्रेज आए और लगभग 200 वर्षों तक उन्होंने हमारे भारतवर्ष पर शासन किया। यह एक ऐसा शासन था जिसने वास्तव में हमारे देशवासियों के मन को गुलाम करने में सफलता पायी। देश अपना, भूमि अपनी, खेत अपने, इतिहास अपना, लोग अपने फिर भी सब पर शासन अंग्रेजों का ही चलता था। हम नहीं चाहते थे कि अपने भूमि, भवन, धर्म, संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था पर अंग्रेजों की अधीनता रहे। इसलिए तो हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, हजारों देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लाखों परिवारों इस स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। और अंततोगत्वा 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश “भारत” स्वतंत्र हुआ। पर क्या हम हमारे बलिदानी वीरों के ‘त्याग और सेवा’ प्राप्त स्वाधीनता के मोल को समझ पाए हैं, इस पर विचार होना चाहिए।

स्वतंत्रता का श्रेय केवल ‘एक’ को नहीं  

कई लोग कहते हैं कि देश को स्वतंत्रता अहिंसा से मिली, यह स्वतंत्रता महात्मा गांधी ने दिलाई। कई लोग कहते है कि अंग्रेजों ने भारत को लूटकर छोड़ दिया और हमें स्वतंत्रता मिल गई। स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के साथ युद्ध नहीं करना पड़ा। कई बुद्धिजीवी तो यहां तक कहते हैं कि अंग्रेज नहीं होते तो यहां लोकतंत्र नहीं होता और न ही देश में कोई विकास हो पाता। ये सही है कि महात्मा गांधी ने ‘स्वतंत्रता’ की इच्छा को जन मन में जगाया, उन्होंने इसे आन्दोलन का स्वरूप दिया। पर केवल अहिंसक आन्दोलन के प्रभाव से अंग्रेजों ने भारत को नहीं छोड़ा। भारत के अन्दर युवा क्रांतिकारियों के बलिदान के प्रति भारतवासियों के मन में अपार श्रद्धा थी, उनसे लाखों लोग देश के लिए मर मिटने के लिए प्रेरित हुए थे। एक तरफ सशस्त्र क्रांतिकारी, दूसरी ओर अहिंसक आन्दोलन (सत्याग्रह)। स्वतंत्रता आन्दोलन में जहां चंद्रशेखर आजाद ने क्रांतिकारियों के संगठन का नेतृत्व किया, वहीं महात्मा गांधी ने अहिंसक आन्दोलन की बागडोर सम्भाली। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने एक ओर आजाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व किया, वहीं दूसरी ओर स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने भारतीय युवाओं को सेना में शामिल होने का आह्वान किया। द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और अंग्रेजों को सैनिकों की आवश्यकता थी। अंग्रेज अपने स्वार्थ के लिए भारतीय युवाओं को सैनिक शिक्षा देने को तैयार थे। तब सावरकर ने इस अवसर का लाभ लेने के लिए युवाओं से कहा, “एकबार सैनिक शिक्षा ले लो और जब जरुरत पड़ेगी तो तय कर लेना कि बंदूक की गोली किस ओर चलाना है।” सावरकर की प्रेरणा काम कर गई और युवा भारत सैनिक प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए दौड़ पड़े। अंग्रेज डर गए कि जब सारे युवा सैनिक बन गए तो वे अंग्रेजों से लड़कर बूरी तरह समाप्त कर देंगे। अंग्रेजों का यह भय स्वाभाविक था क्योंकि लाखों युवा सैनिक प्रशिक्षण ले चुके थे।

स्वतंत्रता का श्रेय किसके नेतृत्व को है, इसको लेकर बहुत चर्चा होती है, विशेषकर सामान्य लोगों में। स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व अनेक धाराओं में स्वतंत्रता सेनानियों ने किया, लेकिन सारे देशभक्तों की प्रेरणास्रोत तो स्वामी विवेकानन्दजी के विचार ही रहे। चाहे गांधी हो या सुभाष, चाहे लोकमान्य तिलक हो या सावरकर, क्रांतिकारियों के ठिकानों पर कभी अंग्रेज छापे मारते तो उन्हें उन ठिकानों पर स्वामी विवेकानन्दजी के देशभक्ति जगानेवाले विचार की प्रतियां मिलती। यह भी एक विशेष बात है जिसका संज्ञान लेना आवश्यक है। वहीं देश के कवियों, गीतकारों और साहित्यकारों के देशभक्ति जगानेवाले साहित्यिक योगदान को भी कभी नहीं भूलाया जा सकता। लोकमान्य तिलक की पत्रकारिता और स्वतंत्रता आन्दोलन को मुखर बनाने की पहल, गांधीजी का अहिंसक आन्दोलन, सावरकर ने सेना में भर्ती होने का आह्वान किया, सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज बनाई और सशस्त्र क्रांति की मशाल तो 1857 से स्वतंत्रता तक जल ही रही थी। इसलिए केवल एक व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्ति का श्रेय देना लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, तप और बलिदान का अपमान हो होगा। लेकिन देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे यहां अंग्रेजों की चापलूसी करनेवाले लोग तब भी थे और उनका गुणगान करनेवाले लोग अब भी हैं।

स्वतंत्रता का दुरुपयोग

गुलामी मानसिकता के लोग स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान का महत्त्व न पहले समझते थे और न ही अब। इसलिए आज स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में इन्हें मजा आता है। इस श्रेणी में सामान्य मनुष्य कम ही हैं पर बड़े पदों पर बैठे लोग इस महान स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में कोई मौका नहीं छोड़ते। शिक्षा संस्थानों में शिक्षा की अव्यवस्था को देखिए, राजनीति में भ्रष्टाचार को देखिए, सिनेमा जगत में स्वैराचार को देखिए, सामाजिक क्षेत्रों में फैले जातिभेद और दुराचार को देखिए, कानून व्यवस्था में ईमानदारी की दुर्गति को देखिए, ये सारे दृश्य मानो हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का उपहास कर रहे हैं। दूसरी ओर स्वतंत्रता दिवस के उत्सव को मनाने का तरीका भी देखिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विभिन्न संस्थानों में तिरंगा फहराया जाता है। कुछ क्षण बलिदानियों को याद किया जाता है। वहीं देश की युवा पीढ़ी मोटरसाइकिल में सवार होकर, हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर डीजे की कर्कश आवाज के साथ इस उत्सव को मनमानी ढंग से सेलिब्रेट करते दिखाई देते हैं। ये ‘देशभक्ति’ भी आज की पीढ़ी के लिए बड़ी कमाल की चीज हो गई है। फेसबुक, ट्विटर और वाट्सएप प्रोफाइल या चेहरे, कपड़े अथवा ब्रेसलेट पर तिरंगा लगा लो तो आप देशभक्त बन जाते हैं। क्या यही देशभक्ति है? तिरंगा का आदर तो होना ही चाहिए क्योंकि वह हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज है। पर केवल तिरंगे का प्रोफाइल फोटो बना देने भर से क्या हमारी देशभक्ति साबित हो जाती है? क्यों क्रिकेट, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही जागती है हमारी लिमिटेड राष्ट्रभक्ति?

देशभक्ति की तीन सीढ़ियां 

‘देशभक्ति’ की परिभाषा समझने के लिए स्वामी विवेकानन्द के विचारों को समझना होगा। 09 फरवरी, 1897 को मद्रास (अब चेन्नई) के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में उन्होंने अपने भाषण में कहा था, – “लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं, और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो!

क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे ह्रदय के स्पंदन से  मिल गयी है? क्या उसने तुम्हें पागल-सा बना दिया है? क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहां तक कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है- हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!

अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई यथार्थ कर्त्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है। किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!

क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो? यदि सारी दुनिया हाथ में नंगी तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए, तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।

यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही ज़बर्दस्त शक्ति है।”

स्वामी विवेकानन्दजी के उक्त विचारों पर चिंतन करने पर हम अनुभव कर सकते हैं कि हम कितने देशभक्त हैं, हमारे हृदय में कितनी देशभक्ति है?

स्वतंत्र भारत में स्वार्थ की सियासत हावी

गुलामी मानसिकता में जीनेवाले और उसपर गर्व करनेवाले लोग सामान्य नागरिक नहीं हैं, बल्कि तथाकथित बुद्धिजीवी और नेता हैं। इसलिए अपनी सियासत के नशे में चूर ये लोग कई बार कह देते हैं कि “इससे अच्छे तो अंग्रेजों का शासन था।”  दो वर्ष पहले कथित “असहिष्णुता” के नाम पर पुरस्कार वापसी का नाटक चला था और प्रसार माध्यमों ने बढ़-चढ़कर इसमें रूचि दिखाई थी। वर्तमान शासन को अंग्रेजों के शासन से निम्न दर्जे का मानना सर्वथा अनुचित है। यदि अंग्रेजों का शासन उचित होता तो हमारे स्वतंत्रता सेनानी उनके विरूद्ध संघर्ष ही क्यों करते? यह चिंतन का विषय है।

अंग्रेजों के शासन से मुक्त भारत पर किसका शासन है? यदि यह सवाल किसी से पूछा जाए तो स्वाभाविक उत्तर होगा – मोदी सरकार का। पर यदि ऐसा पूछा जाए कि भारत के लोग किसके गुलाम हैं? तो लोग कहेंगे कि सवाल पूछनेवाला बौरा गया है क्या? स्वतंत्र भारत में भला कौन गुलाम हो सकता है?  शासन ‘प्रशासन’ से सम्बंधित है, यहां हमारी अपनी सरकार है। देश की जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाकर सरकार बनाया है और वे जी तोड़ देश के उत्थान के कार्य में लगे हैं। इसलिए हमारे देश में प्रशासनिक तौर पर निश्चित रूप से स्वतंत्रता है। हम स्वतंत्र हैं। पर गुलामी की मानसिकता अब भी हमारे देश से गई नहीं है।

आज अदालत, शिक्षा, तकनीकी, विज्ञान, कला आदि सभी क्षेत्रों में अंग्रेजों की भाषा है। सांस्कृतिक रूप से भारतीय ज्ञान की अवहेलना होती है। विश्व की प्राचीनतम भाषा ‘संस्कृत’ जो हमारे देश की भाषा है, को शालेय पाठ्यक्रम में अबतक अनिवार्य नहीं किया गया। गाय जिसे हम “गोमाता” कहते हैं, जिसपर हमारा जीवन निर्भर है। दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र मनुष्य जीवन को स्वस्थ्य और बलवान बनाते हैं। पर गौरक्षा की बात आती है तो सियासत फिर शुरू हो जाती है। सरकार द्वारा ‘गोमांस पर रोक’ लगाया जाता है तो ‘बीफ बैन’ का विरोध शुरू हो जाता है। महात्मा गांधी भगवद्गीता को “गीता माँ” कहते थे, पर जब इसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की बात होती है तो इसका भी विरोध होता है। यहां तक कि वन्दे मातरम् (राष्ट्रगीत) और जन गण मन (राष्ट्रगान) गाने की अनिवार्यता को मजहबी स्वतंत्रता का हनन करार दिया जाता है। हद तो तब हो जाती है जब कोई जन प्रतिनिधि “भारतमाता की जय” कहने में संकोच करता है।

इसलिए प्रतीत होता है कि स्वतंत्र भारत में राज चल रहा है- स्वार्थपूर्ण राजनीति का, जातिगत विद्वेष का, मजहबी कट्टरता का। जबतक स्वार्थ की राजनीति, जातिगत सियासत और मजहबी कट्टरता से देश मुक्त नहीं हो जाता, तबतक भारत ‘प्रशासनिक रूप से’ तो स्वतंत्र ही रहेगा, पर ‘मानसिक रूप से’ गुलामी की जंजीरों में जकड़ा ही रहेगा। आइए, स्वामी विवेकानन्द के बताए गए “देशभक्ति” के सिद्धांतों पर चलें और समाज के प्रति आत्मीयता को अपने हृदय में धारण कर “स्वतंत्र भारत” के गौरव को अखिल विश्व में फैलाएं।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

राष्ट्र व संस्कृति की रक्षा का संकल्प

Bharat Mata Picute

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी गोलवलकर के अनुसार, “राष्ट्र सांस्कृतिक ईकाई होती है। जब किसी जनसमूह की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों, तब तक वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” वहीं अन्त्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इस बात और स्पष्ट करते हुए कहा है, “जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक मिशन, विचार या आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” स्वामी विवेकानन्दजी के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र का अपना उद्देश्य है। स्वामीजी ने राष्ट्र के ध्येय के सम्बन्ध में कहा है, “व्यक्ति को मुक्तिमार्ग पर बढ़ने के लिए पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता, यही है हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य। तुम चाहे वैदिक, जैन या बौद्ध, चाहे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत अथवा द्वैत, किसी भी ‘मत’ को टटोल लो, ये सभी इस उद्देश्य पर एक हैं।” स्वामीजी ने कहा है“हमारा ‘धर्म’ ही हमारे तेज, हमारे बल,इतना ही नहीं तो हमारे राष्ट्रीय जीवन का भी मूलाधार है।”

संसार को अध्यात्म व योग का उपहार देनेवाला हमारा भारत देश ‘राष्ट्र’ ही है। हम भारतमाता कहकर अपने राष्ट्र की वंदना करते हैं। अपने राष्ट्र की वंदना करने के अनेक तरीके हैं। कोई भारतमाता की जय कहता है तो कोई अपने परिसर को स्वच्छ रखने में भूमिका निभाता है, कोई खेत में हल चलाता है तो कोई अनुसन्धान करता है, कोई गीत लिखकर तो कोई गीत गाकर मातृभूमि की अर्चना करता है। इसी तरह शिक्षक विद्यार्थियों को शिक्षित कर और सीमा पर जवान शत्रुओं से लड़कर राष्ट्र की वंदना करते हैं। सैनिक, शिक्षक, किसान, मजदूर, वैज्ञानिक और समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन न्योछावर करनेवाले समाजसेवी सब मिलकर राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा करते हैं। सेना की सुरक्षा, शिक्षकों के अध्यापन, किसान तथा मजदूरों के परिश्रम तथा वैज्ञानिकों के अनुसन्धान से प्राप्त सुविधाओं का लाभ लेनेवाला समाज यदि राष्ट्र की रक्षा का संकल्प लेता है तो राष्ट्र पूरी तरह सुरक्षित हो सकता है।  

रक्षाबंधन का पर्व हमें रक्षक होने का स्मरण दिलाता है। हिन्दी की महान कवयित्री महादेवी वर्मा ने खंडवा में अपने एक व्याख्यान में कहा था, “राखी सूत की है। लेकिन हम सबको कलाई वज्र की बनानी होगी। अगर कलाई वज्र की न हो तो इसे सम्भाल नहीं सकेंगे।” महादेवी वर्मा के इस कथन की आज प्रासंगिकता बढ़ गई है। एक तरफ पाकिस्तान पोषित आतंकवाद कश्मीर को लहूलुहान किए बैठा है, वहीं छत्तीसगढ़, झारखण्ड आदि राज्यों में नक्सलवाद अपनी जड़ें जमाये बैठा है। इसी तरह अपने समाज में अपने करिअर की चिन्ता में चूर युवा दिखाई देता है तो दूसरी ओर धनार्जन के लिए किसी भी हद को पार करनेवाले लोग दिखाई देते हैं। ऐसे में राष्ट्र की रक्षा के लिए स्वयं की कलाई को वज्र की तरह शक्तिशाली बनाने का व्रत कौन लेगा, यह हम सभी के समक्ष एक बड़ा प्रश्न है। इस प्रश्न के उत्तर की खोज में यह रक्षा विशेषांक है। वज्र की तरह शक्तिशाली वीर सैनिकों के पराक्रम के बल पर ही यह राष्ट्र सुरक्षित है। राष्ट्र के अंतर्बाह्य चुनौतियों का बड़ी प्रखरता से उत्तर देनेवाले हमारे राष्ट्रप्रहरी सैनिकों को शत-शत नमन।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

मन वाचा कर्म से सदैव एक रूप हो : मा.भानुदासजी

BHANUDAS-DHAKRAS-VIVEKANAND-KENDRAमन वाचा कर्म से सदैव एक रूप हो : मा.भानुदासजी

मैं कौन हूं? मेरे इस जीवन में मेरी क्या भूमिका है और मैं इस समय क्या कर रहा हूं? इस पर हमें विचार करना होगा। हम सभी सेवारत कार्यकर्ता की भूमिका में हैं। और जैसा कि इस शिविर का थीम है“सेवारत व्यक्ति-व्यक्ति राष्ट्र का ही प्राण है।” हम विद्यार्थी हैं अथवा शिक्षक, व्यवसायी हैं या कर्मचारी, पर हम यह समझ लें कि सेवारत व्यक्ति के रूप में मैं भारत का प्राण हूं। कार्य जितना महान है हमें उतना ही महान बनना होगा। महान कार्य के लिए उदात्त चरित्र की आवश्यकता होती है। यह तभी संभव है जब हम देहात्म बोध से देशात्म बोध की ओर उन्मुख होंगे। राष्ट्र का प्राण होने के लिए हमें आवश्यक गुण अर्जित करने होंगे। यह गुण है मन, वचन और कर्म से सदैव एकरूप होना।

स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने गुरु ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस देव से अपने लिए निर्विकल्प समाधि का आशीर्वाद मांगा था। पर माँ के कार्य के लिए उन्होंने अपने घर-परिवार और गुरुभाइयों से दूर जाकर भारत को जानने के लिए देशभर परिव्राजक बनकर भ्रमण किया। पाश्चात्य विद्वानों के बीच भारत माता को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वामीजी अकेले ही निकल पड़े। सारी विपदाओं को सहकर, सारी चुनौतियों को पार कर उन्होंने भारत की प्रतिष्ठा को विश्वपटल पर स्थापित किया। स्वामीजी की निर्विकल्प समाधि की आस देहात्म बोध से प्रेरित था, पर माँ का कार्य करने का संकल्प देशात्म बोध का परिचायक है। स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने एक पत्र में इन दोनों ही मनःस्थिति का वर्णन किया है। देहात्म बोध से देशात्म बोध का मार्ग कौन-सा है? वह मार्ग है – मन-वाचा-कर्म से सदैव एक रूप हो। जब ऐसा हो जाए तो देशात्म बोध प्रगट होगा, परन्तु यह आसान नहीं है।

मन-वाचा-कर्म के लिए रामायण में 2 महत्वपूर्ण प्रसंगों का उल्लेख मिलता है। 1) एक बार महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ से मिलने आए। महर्षि के दर्शन से गदगद दशरथ ने कहा दिया, “महर्षि आप आज जो मांगेंगे, मैं उसे श्रद्धापूर्वक आपको दान कर दूंगा।” उस समय दशरथ मन से वचन दे चुके थे। परन्तु जब महर्षि विश्वामित्र ने कहा कि,“दंडकारण्य में असुरों का आतंक फैला है और यज्ञ संस्कृति खतरे में है। इस विषम परिस्थिति में ऋषियों व यज्ञ संस्कृति की सुरक्षा के लिए आपके दो पुत्र राम और लक्ष्मण की आवश्यकता है। आप मुझे ये दोनों पुत्रों को मुझे कुछ समय के लिए सौंप दीजिए।” महर्षि की इस आग्रह को यह कहकर टालने का प्रयत्न किया कि मेरे दोनों पुत्र अभी बालक हैं। ये असुरों का सामना नहीं कर पाएंगे। आप चाहें तो मेरी सारी सेना ले जाइए, स्वयं मुझे ले जाइए पर मेरे पुत्रों को यहीं रहने दीजिए। मन और वचन से संकल्प लेनेवाले राजा दशरथ पुत्र मोह में अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं। उनका कर्म बदल जाता है। तब उनको याद दिलाना पड़ता है कि रघुकुल रीति सदा चली आई,प्राण जाए पर वचन न जाई। दशरथ ने मन से कहा था, वचन से कहा था कि जो मांगोगे, दे दूंगा। पर जब कृति की बारी आई तो पीछे हट गए। हमारा भी ऐसा ही होता होगा।

श्रीराम जी के वनवास का दूसरा प्रसंग था। कैकेयी गुस्से थी तो दशरथ ने बोल तो दिया कि आप जो कहोगी मैं करूंगा। तथापि राम को 14 वर्ष का वनवास की बात सुनते ही दशरथ गिर गए। जबकि राम उनके लिए जो छत्र-चंवर आदि आए थे उन सब को लौटाते हुए वनवास जाने की तैयारी करते हैं। मन-वाचा और कर्म से सदैव एकरूप होने का महान आदर्श हैं- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। मन ही सबकुछ करता है। मन की सहायता से ही हम आगे बढ़ सकते हैं। मन हमें आगे बढ़ा सकता है और वह हमें गिरा भी सकता है। इसलिए मन को साधना होगा ताकि मन सही दिशा में गतिमान हो। इस क्रम में वाणी का संयम महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए वाणी का तप जरुरी है।

सीता सुधि और लंका दहन के पश्चात् जब महावीर हनुमान वापस लौटे तो वे चिंतन करने लगे कि श्रीराम को माता जानकी का सन्देश किन शब्दों में देना चाहिए। लंका दहन का प्रसंग पहले कहूं या सीतामाता की धैर्य का वर्णन? पर ‘बुद्धिमतां वरिष्ठं’ ऐसे महावीर ने वाणी के संयम और तप का महान आदर्श प्रस्तुत किया। हनुमान ने श्रीराम से कहा, “दृष्टवा-देखि”, यानी मैंने माता सीता के दर्शन किए। हनुमान के मुख से निकले इस पहले वाक्य को सुनते ही श्रीराम की विरह वेदना समाप्त हो गई, उनके अंतःकरण में मची खलबली समाप्त हो गई।

एक और उदाहरण है। स्वामी विवेकानन्दजी ने अपने जीवन के अंतिम समय में भगिनी निवेदिता के भोजन करने के उपरांत पानी लेकर उनका हाथ धुलवाया था। तब भगिनी निवेदिता ने स्वामीजी को इसके लिए रोकना चाहा। पर स्वामी विवेकानन्द ने यह कहकर हाथ धोने के लिए जल डाला कि ऐसा तो ईसा मसीह ने भी किया था। भगिनी निवेदिता एकाएक स्तब्ध रह गई। उन्हें याद आया कि जिस दिन ईसा ने भक्तों का हाथ धुलाया था वह उनके जीवन का आखरी दिन था। पर भगिनी निवेदिता ने वाणी का संयम बरतते हुए अपने मन के भावों को बाहर नहीं आने दिया। उन्होंने अपने मनोभाव को अपने मन में धारण किया पर उसे अन्य गुरुभाइयों के आगे व्यक्त नहीं किया। यह वाणी के संयम का बड़ा उदाहरण है।

वाणी की तपस्या और संयम से ही कार्य आगे बढ़ेगा। कर्म ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों से व्यक्त होता है। मन में उदात्त भाव है, वह वचनों में व्यक्त भी होता है, पर वह कृति में प्रगट नहीं होता तो यह बहुत चिंता की बात है। यदि ऐसा है तो “अन्दर कुछ और बहार कुछ” वाली बात रह जाएगी। द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों को एकबार “सत्यं वद” पाठ याद करने के लिए कहा था। अगले ही दिन युधिष्ठिर को छोड़कर सभी शिष्यों ने कहा कि हमें ‘सत्यं वद’ याद हो गया। कुछ दिनों के बाद युधिष्ठिर ने कहा कि अब मुझे याद हो गया। जब उनसे पूछा गया कि ‘सत्यं वद’ के पाठ को याद करने के लिए इतने दिन कैसे लगे? तब धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा, “मेरे मन के विचार मेरे कृति में जबतक नहीं आया, तबतक मैं कैसे कह सकता हूं कि मैंने ‘सत्यं वद’ को जान लिया। अब जब मेरे मन के विचार मेरे कृति में प्रगट होने लगा है, तब ही मैं कह रहा हूं कि मुझे ‘सत्यं वद’ याद हो गया।

एक महिला अपने बालक के अधिक गुड खाने की आदत से परेशान थी। उन्होंने ठाकुर से निवेदन किया कि आप इस बालक को गुड न खाने की सलाह दीजिए। आपके कहने से यह गुड खाना छोड़ देगा। महिला 15 दिनों तक रोज ठाकुर के पास यही निवेदन करती रही पर ठाकुर ने उस बालक को गुड खाने के लिए नहीं रोका। ठाकुर रामकृष्ण परमहंस देव ने जब अपनी गुड खाने की आदत का त्याग किया, तब जाकर वे उस बालक को कह सके कि अधिक गुड नहीं खाना चाहिए।

मन, वाचा, कर्म से जीवन में सातत्यता आती है। यदि हम अपने को बदलने के लिए तैयार हैं तो अपने त्रुटियों को सुधारना होगा, अपनी गलत आदतों को छोड़ना होगा। त्रुटियां दिखानेवाले निंदकों की सूचनाओं पर विचार कर अपने में सुधार करना चाहिए। जब माननीय एकनाथजी को अन्यों से ज्ञात हुआ कि उनके स्वभाव में कठोरता है, वे गुसैल हैं। तब उन्होंने अपने स्वभाव को मृदुल बनाने के लिए भरसक प्रयत्न किया और वे इसमें सफल भी रहे। एकनाथजी के सानिध्य में रहे कार्यकर्ता उनके मातृत्व हृदय से परिचित हैं। हम अपने मित्रों के साथ वाणी के तप को बनाएं रखें। भगवद्गीता मन को साधने का उपाय बताती है। गीता के अनुसार, हम अभ्यास और वैराग्य से मन को साध सकेंगे।

स्वामी विवेकानन्द ने हमें स्वदेश मंत्र दिया, जिसमें उन्होंने कहा, “हे भारत! तुम मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियों का आदर्श- सीता, सावित्री और दमयन्ती है। मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य- सर्वत्यागी उमानाथ शंकर हैं। मत भूलना कि तेरा विवाह, तेरी धन-सम्पत्ति, तेरा जीवन केवल इन्द्रिय-सुख के लिए, अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है। मत भूलना कि तुम जन्म से ही माता के लिए बलिस्वरूप रखे गए हो। मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया कि छाया मात्र है। मत भूलना कि नीच, अज्ञानी, दरिद्र, अनपढ़, चमार, मेहतर सब तुम्हारे रक्त मांस हैं; तुम्हारे भाई हैं।

हे वीर! साहस का आश्रय लो, निर्भीक बनो और गर्व से बोलो कि मैं भारतवासी हूं, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। तुम गर्व से कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र और पीड़ित भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी,चांडाल भारतवासी सभी मेरे भाई हैं! तुम भी एक चिथड़े से अपने तन की लज्जा को ढंक लो और गर्वपूर्वक उच्च-स्वर से उद्घोष कर, “प्रत्येक भारतवासी मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के सभी देवी-देवता मेरे ईश्वर हैं। भारत का समाज मेरे बचपन का झूला,मेरे जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है।”

मेरे भाई! बोलों कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है। भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है। और रात-दिन जपते रहो कि, “हे गौरीनाथ! हे जदम्बे! मुझे मनुष्यत्व दो! हे शक्तिमयी माँ! मेरी दुर्बलता को हर लो,मेरी कापुरुषता को दूर कर दो और मुझे मनुष्य बना दो, माँ।”

स्वामीजी के इस स्वदेश मंत्र के अनुरूप क्या मेरा जीवन है? हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि मेरे ध्येय के अनुरूप मेरे मित्र हैं क्या? मेरे ध्येय के अनुरूप मैं गीत गुनगुनाता हूं क्या? एकनाथजी ने कहा ही है कि हम समाज को दो आंखों से देखते हैं, समाज हमको हजार आंखों से देखता है। एकनाथजी को उनके एक मित्र वर्ष में एकबार सिल्क का कुर्ता दिया करते थे और वे उसे पहनते थे। जब लोग कहने लगे कि एकनाथजी सिल्क कुर्ते वाले हैं, तो उन्होंने सिल्क के कुर्ते पहनना बंद कर दिया। कहने का तात्पर्य है कि कोई हमारे कृति या पहनावे पर उंगली न उठाएं। हमें इसका ख़याल रखना चाहिए। हम केन्द्र प्रार्थना में गाते हैं – “प्रभो! देहि देहे बलं धैर्य मन्तः।” बलार्जन करते हुए उदात्त विचारों को अंगीकृत कर, धैर्य के साथ हम अपने आदर्श के अनुरूप जिएं। तब आध्यात्मिक शक्तियों का एकत्रीकरण होगा और राष्ट्र पुनरुत्थान का कार्य निरंतर आगे बढ़ेगा।

प्रस्तुति : लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’  

शिव सुंदर नव समाज विश्ववंद्य हम गढ़ें : मा.निवेदिता दीदी

B-NIVEDITA-VIVEKANAND-KENDRAशिव सुंदर नव समाज विश्ववंद्य हम गढ़ें : मा.निवेदिता दीदी

123 वर्ष पूर्व तीन दिन-तीन रात ध्यानस्थ रहकर स्वामी विवेकानन्दजी ने भारत के उत्थान पर गहन चिंतन किया था। देशवासियों के प्रति अगाध आत्मीयता रखनेवाले स्वामीजी ने देश के सामने त्याग और सेवा का महान आदर्श रखा। कोई भी सेवाकार्य हो उसके पीछे दो प्रकार की प्रेरणा कार्य करती है, – 1) आत्मीयता और 2) सजगता। आत्मीयता ऐसी कि यह मेरा देश है, यह मेरा समाज है, इसके उन्नयन में मेरा भी योगदान होना चाहिए। यह समाज मेरा ही अंग है। जब अंगूठे में दर्द होता है तो हम अंगूठे को काटकर नहीं फेंक देते, वरन उस दर्द को दूर करने का प्रयास करते हैं। अंगूठे का दर्द मेरा दर्द है। समाज की पीड़ा मेरी पीड़ा है, इसी भाव को आत्मीयता कहते हैं। हाल ही में चेन्नई में बाढ़ की आपदा में एक युवक ने लगभग 300 लोगों की जान बचाई थी। एक महिला जो दूध का व्यवसाय करती थीं, उसने यह सोचकर बाढ़ के दौरान घर-घर दूध पहुंचाया कि भूख से किसी बालक को परेशान न होना पड़े, भूख की वजह से किसी बालक के जान न जाए। यह संवेदन्शीलता ही है आत्मीयता। इसी तरह समाज की वस्तुस्थिति के प्रति भी हमें सजग रहना चाहिए। समाज के गरीब, अभावग्रस्त लोगों का ख़याल रखना, उनके उत्थान के लिए प्रयत्न करना, यह हमारे सजग होने का लक्षण है। सजगता में एक और महत्वपूर्ण आयाम है विपन्न (भ्रमित/भटके हुए) लोगों को सही राह दिखाना।

सेवा के तीन प्रकार बताए गए हैं। महाभारत में भी इसका उल्लेख है।

1) रोटी, कपड़ा और घर जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना।

2) मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना।

3) आत्मबोध के ज्ञान से मनुष्य के आत्मीयता का दायरा बढ़ाना।

अर्थात समाज के प्रति व्यक्ति की संवेदनशीलता को बढ़ाना। माननीय एकनाथजी ने इन तीन सेवाओं से आगे विचार रखते हुए एक चौथी प्रकार की सेवा का आदर्श हमारे सम्मुख रखा, -ऐसे समाज का निर्माण करना जहां आत्मीयता और सजगता के कारण सभी की आकांक्षाओं की पूर्ति हो और सेवा की आवश्यकता ही न रहे। ऐसे आदर्श समाज की रचना करना ही विवेकानन्द केन्द्र का कार्य है।

आजकल सेवा की अवधारणा ही बदल गई है। लोग अनाथालय, वृद्धाश्रम बनाने जैसे कार्य को ही सेवा कहने लगे हैं। केन्द्र की सेवा की अवधारणा यही है कि ऐसे आदर्श समाज की रचना करना जहां अनाथाश्रम अथवा वृद्धाश्रम की आवश्यकता ही न रहे। तात्पर्य है कि प्रत्येक घर में बड़ों का सम्मान हो और किसी को अनाथ न बनना पड़े। हमारे सामने गोस्वामी तुलसीदास के जीवन का उदाहरण है। उनका जन्म कहीं हुआ था, उनका पोषण,उनकी शिक्षा-दीक्षा किसी अन्य स्थान पर। समाज ने ही उनके पोषण व शिक्षा का दायित्व लिया था। असहाय, अभावग्रस्त तथा वंचितों के उत्थान को अपना दायित्व माननेवाला समाज हमें गढ़ना है। ऐसा समाज जो अपने सामाजिक कर्तव्य के प्रति आश्वस्त हो। विवेकानन्द केन्द्र की मूलभूत सेवा का आदर्श यही है।

हम देखते हैं कि आईएसआईएस के आतंकी अपने जीवन को आतंकी गतिविधियों के लिए झोंक देते हैं। इस्लाम मतावलम्बी विश्व की परिकल्पना का स्वप्न लिए आतंकी अपने हिंसक गतिविधियों को अंजाम देते हैं। ईसाई मिशनरियों को भी लगता है कि सिर्फ बाइबल ही सही है। कम्युनिस्ट गरीबों के लिए कथित सहानुभूति और धनवान लोगों के लिए बैर का भाव रखते हैं। कम्युनिस्टों के आदर्श माओ की किताब अब चीन में नामशेष बनकर रह गई है। रद्दी बनकर रह गई है। कोई पाठक जब पुस्तक खरीदने जाता है तो चीन के पुस्तक विक्रेता कहते हैं कि माओ को पढ़ना है तो उन दुकानों में जाओ जहां रद्दी बिकती है अथवा पुरानी किताबें मिलती हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि माओ के विचारों को माननेवाले लोगों ने चीन और रूस में करोड़ों लोगों को कथित समानता की आड़ में मौत के घाट उतार दिया था। कम्युनिस्टों के जीवन का आधार भौतिकता है। कम्युनिस्टों ने मानवीय मन की स्वतंत्रता का हनन किया। दूसरी ओर पूंजीपतियों का आधार केवल पैसा कमाना है। चाहे वह जिस मार्ग से आए उन्हें तो बस, केवल धन चाहिए। इसलिए ये विचार टिक नहीं सके, उनकी स्वीकारोक्ति धीरे-धीरे समाप्त होती गई। इसलिए हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि जहां अतिवाद है वहां आदर्श नहीं। तुम्हारा कार्य ऐसा न हो जिससे समाज टूटे। भारतीय समाज ने कभी नहीं कहा कि मेरा ही भगवान सर्वश्रेष्ठ है, वरन सभी के आराध्य के प्रति श्रद्धा का भाव रखा।

अनेक आक्रमणों के बावजूद हमारा राष्ट्र अविचल है क्योंकि हमारी सांस्कृतिक नींव पक्की है। हमें उसे केवल गढ़ना है। शिव सुंदर नव समाज हमें गढ़ना है। शिव जो सदैव कल्याण करनेवाला है, वह मंगलकारी है। और सुंदर यानी समृद्धशाली व आत्मनिर्भर।

इतिहास में हमारे राष्ट्र का उल्लेख बहुत गौरवशाली है। कल्पनातीत धन व प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर राष्ट्र के रूप में अपनी ख्याति रही है। सन 1823 में अंग्रेजों ने जब भारत का शैक्षणिक सर्वे किया तब उन्होंने पाया था कि भारत के 72 प्रतिशत जनता शिक्षित हैं। अंग्रेजों ने अपने शोषणपूर्ण नीति द्वारा आर्थिक आधार पर भारत को खूब लूटा। इसके बाद भारत में शैक्षिक पतन शुरू हो गया। इसके बाद शिक्षा के क्षेत्र में हम 72 से 17 प्रतिशत पर पहुंच गए। हमें याद रखना चाहिए कि राकेट (प्रक्षेपास्त्र) अनुसंधान, प्लास्टिक सर्जरी तथा शैल्य चिकित्सा भारत की देन है। गुलामी के काल में भी हमने अपनी अस्मिता, अपना स्वाभिमान नहीं खोया। इस देश में वीरता की भी कोई कमी नहीं है। तुकाराम उम्बले ने मुम्बई के 26/11 के आतंकी हमले के दौरान वीरतापूर्वक आतंकी अजमल कसाब को पकड़ा था। निःशस्त्र होते हुए अपने शरीर पर आतंकी के 54 गोलियों को झेलकर तुकाराम ने आतंकी को पकड़ा, यह उसकी वीरता और देशभक्ति का प्रतीक है। तुकाराम का परिवार इसपर गौरवान्वित है। उनकी बेटी कहती है कि उनके पिता ने कर्तव्यभाव से अपना बलिदान दिया।

हमें आज समय के साथ चलनेवाला, समयानुकूल शिवसुंदर नवसमाज गढ़ना है। इस नवसमाज की संकल्पना को हमें समझना होगा। जब दलितों को न्याय दिलाना था तो डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर ने पहल की। उन्होंने उनके न्याय के लिए संघर्ष का रास्ता अपनाया। संघर्ष का मार्ग अपनाना उस समय के लिए आवश्यक था। पर क्या इस समय संघर्ष का मार्ग उचित है, इस पर विचार करना चाहिए। आज बाबा साहेब के नाम से संघर्ष का वातावरण समाज में बनाया जाता है। लेकिन इस समय संघर्ष की नहीं, सौहार्द्र की आवश्यकता है। इसे सबको समझना होगा।

मुगलों ने भारत पर आक्रमण किया, तब उन्होंने देखा भारत में मूर्तिकला और स्थापत्यकला चरमोत्कर्ष पर है। आक्रान्ताओं ने जन सामान्य पर नानाविध अत्याचार किए, पर कलाविदों के प्राण नहीं लिए। कलाविदों को कैद कर आक्रान्ताओं ने अपने देश और भारत में मस्जिदें बनवाईं, उनसे कलाएं सीखीं। भारत को नष्ट करने आए आक्रान्ता भी यहां से सीख कर जाते हैं, ऐसा गुणसम्पन्न रहा है हमारा देश। अतीत में हमारा भारत जैसा गौरवशाली और वैभवशाली था, उसे उसी तरह गौरवशाली और वैभव संपन्न बनाना, इस संकल्पना को कहते हैं राष्ट्र पुनरुत्थान। हमारी सेवा निरुद्देश्य नहीं है। विश्व कल्याण के लिए भारत का उत्थान यही हमारा लक्ष्य है। लेकिन हैरत की बात है कि आजकल मूल्य लेकर भी उचित सेवा नहीं की जाती। सरकार सैलरी देती है, कर्मचारी उसके अनुरूप सेवा नहीं देता।

प्रवास के दौरान कई लोग पूछते हैं कि आप क्या करतीं हैं।

मैं कहती हूं, “मैं विवेकानन्द केन्द्र का काम करती हूं।”

यानी क्या करते हैं?

मैं कहती हूं, – “सेवाकार्य।”

फिर वे पूछते हैं – केन्द्र के कितने अनाथाश्रम और वृद्धाश्रम हैं?

मैं कहती हूं- एक भी नहीं।

वे कहते हैं – फिर सेवा कैसी?

मैं कहती हूं – हम ऐसे समाज की रचना के सेवाकार्य में लगे हैं जहां वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम की आवश्यकता ही नहीं रहे।

हमें सेवा के इस भ्रामक अवधारणा को बदलना होगा और निःस्वार्थ सेवा की संकल्पना को समाजजीवन में प्रतिष्ठित करना होगा। हमें किसी के द्वारा सेवा का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। केन्द्र की सेवा की अवधारणा उदात्त है। यह सही है कि बाढ़, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा के दौरान आत्मीयता से सारा देश सहयोग के लिए आगे आता है। ऐसे कठिन काल में निश्चित रूप से ऐसा होना चाहिए, पर आत्मीयता केवल कठिन काल में ही प्रगट न हो। समाज के प्रति आत्मीयता यह सदैव होना चाहिए। सेवा यह योजनाबद्ध होनी चाहिए। घर पर एक-दो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना यह व्यक्तिगत सेवा का उदाहरण है। पर हम संगठित होकर सामूहिक रूप से सेवा करेंगे, – संस्कार वर्ग, आनंदालय, स्वाध्याय वर्ग, योग वर्ग के माध्यम से। एक-दो नहीं, अनेकों की सेवा संगठित रूप से करना यह हमारा मार्ग है। हम अपनी क्षमताएं बढ़ाएं, हमारा स्वभाव आदर्श होना चाहिए। अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर, उत्तम चरित्र और सदाचार से हम विश्व कल्याण के लिए ‘शिव सुंदर नव समाज’ हम खड़ा करें।

प्रस्तुति : लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’