इस विपद काल में हमारी आस्था ना डगमगाए

Shiv-pooja
यह वही भारत है जहां मनचाहा वरदान प्राप्ति के लिए करोड़ों लोग नाना प्रकार के यज्ञ, अनुष्ठान और पूजा-पाठ करते हैं। और आश्चर्य की बात यह है कि आपदा आते ही लोग ईश्वर को कोसना शुरू कर देते हैं। यही बात आज उत्तराखंड की आपदा के सम्बन्ध में कही जा रही है। समझ में नहीं आता कि मानवीय संवेदना ईश्वर और प्रकृति के प्रति इतनी उदासीन क्यों हो जाती है !
त्तराखंड में प्रलयंकारी जलप्रवाह से मची भयंकर तबाही का दृश्य सभी को भयभीत करनेवाला है। समाचार चैनलों और अखबारों में चित्रित दृश्य प्रकृति के क्षोभ को अभिव्यक्त कर रहे हैं। दैवी कृपा से इस भयंकर तबाही से हजारों लोग बच निकले हैं। उनसे बात की जा रही है, यह अच्छी बात है। पर मीडिया द्वारा दिखाए जा रहे संवाद में आपदा पीड़ितों की प्रतिक्रिया भारतीय आस्था को धक्का पहुंचानेवाले हैं।
संवाददाताओं ने केदारनाथ धाम से लौट रहे यात्रियों से पूछा, ”इस प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित लौटने के बाद आप अपने पास-पड़ोसियों को क्या बताएँगे ?
जवाब मिला, ‘अब हम दोबारा यहां नहीं आयेंगे, और जो यहां यात्रा करने के लिए हमसे सुझाव लेंगे तो हम उन्हें यहां की प्राकृतिक असुरक्षितता की बात कहेंगे।’
एक ने कहा, यहां हम भगवान का दर्शन करने आए थे और हम ही फंस गए। भगवान के धाम में भक्त ही सुरक्षित नहीं तो तीरथ करने का क्या फायदा ?
केदारनाथ मंदिर
केदारनाथ मंदिर

यात्रियों के ऐसे जवाब आस्था को चोंट पहुंचानेवाले हैं। यह वही भारत है जहां मनचाहा वरदान प्राप्ति के लिए करोड़ों लोग नाना प्रकार के यज्ञ, अनुष्ठान और पूजा-पाठ करते हैं। और आश्चर्य की बात यह है कि आपदा आते ही लोग ईश्वर को कोसना शुरू कर देते हैं। यही बात आज उत्तराखंड की आपदा के सम्बन्ध में कही जा रही है। समझ में नहीं आता कि मानवीय संवेदना ईश्वर और प्रकृति के प्रति इतनी उदासीन क्यों हो जाती है !

अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए प्रकृति के सारे नियमों को ताक पर रखकर उसका दोहन करने में समाज को तनिक भी संकोच नहीं होता। यहां तक, इस दोहन प्रक्रिया में सबसे आगे रहने में वह गर्व का अनुभव करता है। ऐसे में मनुष्य का विवेक खो जाता है और वह गलत कार्यों में लग जाता है। वनों की कटाई, पत्थरों का अवैध खनन, नदी के तटवर्ती सीमा पर अवैध निर्माण, क्षमता से अधिक पहाड़ों पर कांक्रिट के बड़े-बड़े मकान और विकास के नाम पर पहाड़ों को मनचाहे स्थान पर काटकर सड़कों का निर्माण, इन सभी कारणों से ऐसी प्रलयंकारी घटनाएं घटित होती हैं। इसके लिए नेता और प्रशासन के साथ ही सामान्य जनता भी जिम्मेदार है।
अपनी गलतियों पर पर्दा डालकर ऐसी घटनाओं के लिए ईश्वर और प्रकृति को जिम्मेदार ठहराना कहां तक उचित है ? तीर्थस्थलों को रमणीय बनाने के नाम पर अवैध तरीकों से होटल मालिकों के लिए स्थान उपलब्ध करना क्या सही है ? तीर्थ क्षेत्रों में नशाघरों तक को पनाह देना क्या पाप नहीं है ? निश्चित रूप से समाज को अंतर्मुख होकर इन प्रश्नों पर विचार करना होगा।
उत्तराखंड, आपद काल में संघ द्वारा सेवाकार्य
उत्तराखंड, आपद काल में संघ द्वारा सेवाकार्य

आज भी भारत के प्रत्येक राज्य में अनगिनत तीर्थस्थल हैं। भारत के विभिन्न स्थानों से असंख्य तीर्थयात्री अपने भावसुमन अर्पित करने के लिए इन स्थानों पर आते हैं। ऐसे में प्रशासन, नेता, स्थानीय समाज और धर्म के संरक्षकों को मिलकर इन तीर्थस्थलों की पवित्रता को बनाये रखने तथा प्राकृतिक दृष्टि से उन स्थानों की सुन्दरता और सतर्कता के लिए उपाय योजना करनी होगी। इसके लिए समाज के सज्जनों को संगठित कर उन्हें शक्तिशाली बनाना होगा। साथ ही अवैध खनन और निर्माण करनेवालों पर कड़ी  कार्यवाही करते हुए उन्हें सद्कार्य के लिए प्रवृत्त करने की दिशा में पहल करनी होगी। यही इसके लिए एकमात्र उपाय है। यदि ऐसा न हुआ तो देश के अनेक स्थानों पर ऐसी विपद स्थिति का सामना करने  के लिए हमें तैयार रहना होगा।

उत्तराखंड में एक बालिका को जल पिलाते संघ के स्वयंसेवक
उत्तराखंड में एक बालिका को जल पिलाते संघ के स्वयंसेवक

भारत की सेना, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अनेक धार्मिक एवं सामाजिक संस्था आपदा प्रबंधन के लिए तन, मन, धन से राहत और बचाव कार्य में दिन-रात जुटे हैं। अभी उत्तराखंड में महामारी फ़ैलाने की आशंका जतायी जा रही है। बच्चे अनाथ, महिलाएं आधारहीन, पुरुषों के सम्मुख नया जीवन गढ़ने की चुनौती और बड़े-बुजुर्गों की पीड़ा देख किसी का भी मन पसीज जाएगा। पर देशभर में संघ के आह्वान पर सहयोग राशि और जीवनावश्यक सामग्री की सहायता के लिए करोड़ों हाथ उठ रहे हैं। हर तबके के लोग बड़ी आत्मीयता से इस राहत कार्य से जुड़े हैं। हम भी कुछ सार्थक योगदान कर सकें तो अच्छी बात होगी। ईश्वररूपी जनता जनार्दन आपदा पीड़ितों के उत्थान के लिए इस तरह जाग्रत हो जाएं कि भारत की आस्था ईश्वर के प्रति कभी कम न हो।

लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’
सम्पादक : भारत वाणी 
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